
Lucknow: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और आरती का विशेष महत्व है। मंदिरों से लेकर घरों तक, देवी-देवताओं की आरती के बाद अक्सर ‘कर्पूरगौरं करुणावतारं’ मंत्र का उच्चारण किया जाता है। भगवान शिव को समर्पित इस स्तुति में उनकी दिव्यता, करुणा और संसार के प्रति उनके व्यापक स्वरूप का वर्णन मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंत्र के माध्यम से भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करते हुए उन्हें अपने हृदय में स्थान देने की प्रार्थना की जाती है
क्या है ‘कर्पूरगौरं करुणावतारं’ मंत्र?
कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानीसहितं नमामि॥

इस मंत्र में भगवान शिव के स्वरूप और गुणों की सुंदर व्याख्या की गई है। ‘कर्पूरगौरं’ का अर्थ है कपूर के समान उज्ज्वल वर्ण वाले, जबकि ‘करुणावतारं’ का अर्थ है करुणा के साक्षात् स्वरूप। ‘संसारसारं’ भगवान शिव को संसार के मूल तत्व के रूप में संबोधित करता है और ‘भुजगेन्द्रहारम्’ का अर्थ है सर्प को आभूषण या हार के रूप में धारण करने वाले।
मंत्र की अगली पंक्ति में भक्त प्रार्थना करता है कि माता भवानी के साथ भगवान शिव सदैव उसके हृदय रूपी कमल में निवास करें। इस प्रकार, पूरा मंत्र भगवान शिव और माता पार्वती के प्रति श्रद्धा, समर्पण और आत्मिक निकटता की अभिव्यक्ति है।
आरती के बाद यही मंत्र क्यों बोला जाता है?
धार्मिक परंपराओं में आरती के बाद इस मंत्र का पाठ भगवान शिव के स्मरण और कल्याण की कामना से जोड़ा जाता है। हालांकि, यह मंत्र शिव-स्तुति है और प्रत्येक देवी-देवता की आरती के बाद इसे बोलना कोई सार्वभौमिक अनिवार्यता नहीं है। अनेक परिवारों और मंदिरों में यह परंपरा के अनुसार बोला जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव का स्वरूप केवल संहारक या श्मशानवासी देवता तक सीमित नहीं है। वे करुणा, वैराग्य, त्याग और कल्याण के प्रतीक भी हैं। उन्हें पशुपतिनाथ कहा जाता है, जिसका भाव समस्त जीवों के स्वामी और रक्षक से जुड़ा है। शिव का स्मरण जीवन और मृत्यु से जुड़े भय को समझने तथा मन में शांति और निर्भयता का भाव जगाने की प्रेरणा देता है।
मंत्र में छिपा है आस्था और समर्पण का भाव
इस स्तुति का सबसे महत्वपूर्ण भाव भगवान शिव को माता पार्वती सहित अपने हृदय में विराजमान करने की प्रार्थना है। कपूर की तरह उज्ज्वल स्वरूप और करुणा से परिपूर्ण भगवान शिव का स्मरण भक्त को विनम्रता, दया और सकारात्मकता की प्रेरणा देता है। इस तरह आरती के बाद ‘कर्पूरगौरं करुणावतारं’ मंत्र का उच्चारण केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और मन को आध्यात्मिक भाव से जोड़ने का माध्यम भी माना जाता है।
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