
New Delhi: UPI के जरिए होने वाले कुछ बड़े मर्चेंट पेमेंट पर प्रस्तावित शुल्क को लेकर मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। केंद्र सरकार के नए UPI फ्रेमवर्क के खिलाफ याचिका दायर कर इसे चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि 2,000 रुपये से अधिक के कुछ मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू किए जाने से भविष्य में इसका अप्रत्यक्ष असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
वित्त मंत्रालय के नोटिफिकेशन को चुनौती
रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता अंजन दत्ता ने वित्त मंत्रालय की ओर से सितंबर में जारी किए गए दो नोटिफिकेशन को चुनौती दी है। याचिका में केंद्र सरकार के अलावा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और UPI से जुड़े पक्षों को भी प्रतिवादी बनाया गया है।
याचिका में नए शुल्क ढांचे को लेकर आपत्ति जताते हुए अदालत से इस व्यवस्था की समीक्षा करने और संबंधित नोटिफिकेशन पर हस्तक्षेप की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह के शुल्क का असर भुगतान व्यवस्था से जुड़े व्यापारियों पर पड़ सकता है और इसका बोझ आगे चलकर ग्राहकों तक पहुंचने की आशंका है।
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क्या है MDR और किन लेनदेन पर लागू होगा?
MDR यानी Merchant Discount Rate वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले मर्चेंट से भुगतान व्यवस्था के तहत लिया जाता है। नए फ्रेमवर्क के तहत 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा Person-to-Merchant (P2M) UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू किया जाना है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होने की घोषणा की गई है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर UPI भुगतान पर शुल्क लगेगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि Person-to-Person (P2P) लेनदेन पहले की तरह मुफ्त रहेंगे। इसके अलावा 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतान और कुछ छोटे व्यापारियों से जुड़े लेनदेन भी शून्य-MDR व्यवस्था के तहत मुफ्त रहेंगे। वित्त मंत्रालय के अनुसार करीब 96 प्रतिशत P2M लेनदेन इस बदलाव से प्रभावित नहीं होंगे।
सरकार ने शुल्क व्यवस्था को लेकर क्या कहा?
केंद्र सरकार का कहना है कि MDR कोई सरकारी टैक्स नहीं है। यह भुगतान व्यवस्था से जुड़े अलग-अलग भागीदारों के बीच वितरित किया जाता है, जिसमें बैंक और पेमेंट ऐप उपलब्ध कराने वाली कंपनियां शामिल हैं। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य UPI सिस्टम के संचालन, तकनीकी ढांचे और भविष्य के विस्तार को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी कहा है कि शुल्क के उचित बंटवारे से डिजिटल भुगतान के तकनीकी ढांचे और स्वीकार्यता तंत्र में निवेश को बढ़ावा मिल सकता है।
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आम यूजर्स के लिए क्या बदलेगा?
मौजूदा व्यवस्था के अनुसार आम व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले UPI भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगाया गया है। इसी तरह 2,000 रुपये तक के कई मर्चेंट भुगतान भी शुल्क मुक्त रहेंगे। प्रस्तावित MDR मुख्य रूप से निर्धारित बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन से संबंधित है।
याचिकाकर्ता की चिंता यह है कि भले ही शुल्क सीधे ग्राहक से न लिया जाए, लेकिन व्यापारी पर आने वाली लागत भविष्य में कीमतों या भुगतान के तरीके को प्रभावित कर सकती है। दूसरी ओर सरकार ने स्पष्ट किया है कि बैंकों और संबंधित संस्थाओं को इस शुल्क का बोझ उपभोक्ताओं पर डालने की अनुमति नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट में आगे की सुनवाई पर नजर
UPI भारत में डिजिटल भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है। ऐसे में शुल्क व्यवस्था में बदलाव से जुड़े इस मामले पर कारोबारियों, भुगतान कंपनियों और आम यूजर्स की नजर बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के बाद अब इस मामले में अदालत की आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।
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