नेताजी की अस्थियों को जापान से भारत में वापस लाने की मांग  

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नई दिल्ली। देश 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती मनाने की तैयारी कर रहा है, इस बीच उनकी पुत्री अनीता बोस फाफ ने जापान के रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियों को वापस लाने की मांग की है। वह और उनके परिवार के कई सदस्य इन अस्थियों को नेताजी के अवशेष मानते हैं। सुश्री फाफ ने कहा कि बेहद दुखद है कि भारत की आजादी के लिए लड़ते हुए अपने जीवन को न्यौछावर करने वाले नेताजी की मृत्यु के 80 साल बाद और देश की आजादी के 78 साल बाद भी उनके अवशेष मातृभूमि से बाहर रखे हुए हैं। सुश्री फाफ ने ‘यूनीवार्ता’ को भेजे एक बयान में कहा, ” मैं नेताजी का सम्मान करने वाले भारतीयों को आमंत्रित करती हूं कि वे उनके अवशेषों को अंतिम और उचित संस्कार के लिए भारत लाये जाने का समर्थन करें।

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नेताजी के भाई शरत बोस की पोती माधुरी बोस ने कहा कि परिवार अस्थियों की वापसी और उनके डीएनए परीक्षण की मांग कर रहा है ताकि उनके इस विश्वास की पुष्टि हो सके कि ये महान स्वतंत्रता सेनानी के ही अवशेष हैं। सुश्री माधुरी बोस ने ‘यूनीवार्ता’ से कहा, ” हम नेताजी के परिवार के सदस्य महान नेता के अवशेषों की सम्मानजनक वापसी की मांग कर रहे हैं और मुझे आशा है कि यह जल्द ही होगा। आजाद हिंद फौज के कर्नल हबीबुर रहमान सहित कई प्रत्यक्षदर्शियों ने नेताजी की मृत्यु के संबंध गठित आयोग के समक्ष गवाही दी थी कि अगस्त 1945 में ताइपे में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी थी। उनके जीवित बचने या उस विशेष विमान में उड़ान न भरने की धारणाएं प्रचलित रही हैं। कुछ धारणाओं के अनुसार नेताजी किसी तरह भारत लौट आये थे और देश में भेष बदलकर रह रहे थे। किसी रूसी गुलाग (जेल) में उनकी मौत की भी धारणा प्रचलित हुई थी।

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सुश्री माधुरी बोस ने बताया कि नेताजी की पुत्री अनीता फाफ, उनके बड़े भाई के पुत्र और प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी द्वारका नाथ बोस और नेताजी के एक अन्य भतीजे अर्धेंदु बोस सहित परिवार के तीन सदस्यों ने अक्टूबर 2016 और दिसंबर 2019 में सरकार से विवाद खत्म करने के लिए रेनकोजी की अस्थियों के डीएनए परीक्षण का आदेश देने का अनुरोध किया था। अब तक हालांकि ऐसा नहीं किया गया है। सुश्री फाफ ने नेताजी के जीवन और संघर्ष को याद करते हुए अपने संदेश में उल्लेख किया कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए दशकों समर्पित किये। बाद में जब कारावास में रहने से उनका मिशन असंभव हो गया तो उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को जारी रखने के लिए भारत छोड़ने और इस लड़ाई को देश के बाहर से चलाने का निर्णय लिया।

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यूरोप की ओर उनका पलायन, उसके बाद एक पनडुब्बी के जरिए दक्षिण-पूर्व एशिया की खतरनाक यात्रा और आजाद हिंद फौज के नेतृत्व में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार का गठन हुआ। सुश्री फाफ ने बताया कि अगस्त 1945 में जापान के आत्मसमर्पण के बाद, नेताजी सिंगापुर से टोक्यो के लिए रवाना हुए थे, लेकिन 18 अगस्त 1945 को ताइपे में एक घातक विमान दुर्घटना का शिकार हो गये। वह हालांकि गंभीर रूप से जलने के बावजूद शुरुआती दुर्घटना में बच गये थे, लेकिन उसी दिन बाद में उन्होंने दम तोड़ दिया। ताइपे में उनका अंतिम संस्कार किया गया और उनकी अस्थियां बाद में टोक्यो ले जायी गयीं। नेताजी की अस्थियां तब से जापान के रेनकोजी मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारा सुरक्षित कस्टडी में रखी गयीं थी, जहां वे आज भी रखी हुई हैं।(वार्ता)

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