
द्वादशी तिथि का धार्मिक महत्व
हिंदू पंचांग के अनुसार द्वादशी तिथि प्रत्येक पक्ष में एकादशी के अगले दिन आती है। एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालु विधि-विधान के अनुसार द्वादशी पर पारण करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना, तुलसी दल अर्पित करने और जरूरतमंदों की सहायता करने को पुण्यकारी माना जाता है। संत एकनाथ महाराज महाराष्ट्र की वारकरी भक्ति परंपरा के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने अभंगों और आध्यात्मिक विचारों के माध्यम से भगवान के नाम-स्मरण, सेवा, समानता और करुणा का संदेश दिया।
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तुलसी और भगवान विष्णु की महिमा की कथा
धार्मिक मान्यताओं में द्वादशी के अवसर पर तुलसी माता और भगवान विष्णु की महिमा सुनने का विशेष महत्व बताया गया है। एक प्रचलित कथा के अनुसार, रोमश ऋषि की तपस्या भंग होने पर कुछ दिव्य प्राणियों को श्राप मिला। ऋषि ने बताया कि भगवान विष्णु और तुलसी की महिमा सुनने पर उन्हें श्राप से मुक्ति मिल सकती है।
कथा के अनुसार, एक दिन कुछ तीर्थयात्री भगवान विष्णु और द्वादशी की महिमा का वर्णन करते हुए उस स्थान से गुजरे, जहां वे प्राणी श्राप के कारण रह रहे थे। हरि और तुलसी की महिमा सुनते ही उन्हें श्राप से मुक्ति मिल गई। यह कथा भगवान के नाम-स्मरण और भक्ति की शक्ति का संदेश देती है।

संत एकनाथ महाराज और भगवान पांडुरंग का प्रसंग
संत एकनाथ महाराज से जुड़ी एक लोकप्रचलित कथा में भगवान पांडुरंग की भक्तों के प्रति करुणा का वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि यात्रा के दौरान द्वादशी के पारण के लिए संत और उनके अनुयायियों को भोजन सामग्री की आवश्यकता हुई। निर्जन स्थान पर अचानक एक दुकानदार पहुंचा और उसने सभी को जरूरी सामान उपलब्ध कराया।
जब भक्तों ने भुगतान करना चाहा, तो दुकानदार ने पैसे लेने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि वह हिसाब संत एकनाथ महाराज से बाद में कर लेगा। यात्रा आगे बढ़ने पर जब संत ने उस दुकानदार को खोजकर हिसाब चुकाने की कोशिश की, तो वह कहीं नहीं मिला। भक्तिभाव से जुड़ी इस कथा में माना जाता है कि भगवान पांडुरंग स्वयं अपने भक्तों की सहायता के लिए आए थे।
भगवान पांडुरंग
द्वादशी का संदेश: सेवा, संयम और भक्ति
द्वादशी केवल व्रत के पारण की तिथि नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और सेवा की भावना को मजबूत करने का अवसर भी है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी अर्चना, प्रसाद ग्रहण और जरूरतमंदों की मदद करने की परंपरा है।
संत एकनाथ महाराज की भक्ति परंपरा भी यही प्रेरणा देती है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि दूसरों के प्रति करुणा, निस्वार्थ सेवा और ईश्वर के प्रति समर्पण में भी प्रकट होती है।
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