
New Delhi: देश में दालों की बढ़ती कीमतों ने केंद्र सरकार की चिंता बढ़ा दी है। अरहर दाल की कीमतों में सालाना आधार पर 17.2 फीसदी और चना दाल के दाम में 8.66 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं, उड़द और मूंग दाल भी महंगी हुई हैं। इस बीच, कई राज्य सरकारों ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं के लिए केंद्र से बड़ी मात्रा में अरहर और चना दाल की मांग की है। ऐसे में केंद्र के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। उसे एक ओर राज्यों की मांग पूरी करनी है, तो दूसरी ओर खुदरा बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए अपने बफर स्टॉक को भी सुरक्षित रखना है।
45 लाख टन दालों का बफर स्टॉक, फिर भी बढ़ी चिंता
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, उपभोक्ता मामले मंत्रालय के पास फिलहाल करीब 45 लाख टन दालों का बफर स्टॉक है। इसमें लगभग 11 लाख टन अरहर, 23 लाख टन चना, 6.50 लाख टन मसूर, 3.70 लाख टन मूंग और 70 हजार टन उड़द शामिल हैं। एक सरकारी अधिकारी के अनुसार, दक्षिण भारत के कुछ बड़े राज्यों ने एक-एक लाख टन से अधिक अरहर दाल की मांग की है।
भविष्य में संभावित कमी और बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने की जरूरत को देखते हुए केंद्र के लिए इतनी बड़ी मात्रा में दाल उपलब्ध कराना आसान नहीं है। सरकार बफर स्टॉक का इस्तेमाल बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर खुदरा कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए करना चाहती है। ऐसे में राज्यों को दाल उपलब्ध कराने और बाजार में हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त भंडार बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना जरूरी हो गया है।
अरहर, चना और उड़द की कीमतों में तेजी
दालों की बढ़ती कीमतों का सीधा असर आम लोगों की रसोई के बजट पर पड़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सोमवार को देश में अरहर दाल की औसत खुदरा कीमत 131.98 रुपये प्रति किलो रही। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 17.2 फीसदी अधिक है। वहीं, चना दाल की औसत कीमत 8.66 फीसदी बढ़कर 92.86 रुपये प्रति किलो पहुंच गई।
उड़द दाल के दाम में 10.56 फीसदी की वृद्धि हुई और इसकी कीमत 125.45 रुपये प्रति किलो रही। मूंग दाल भी 4.77 फीसदी महंगी होकर 114.11 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गई। दालों की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी से घरेलू आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ रही है। खासकर अरहर और चना जैसी प्रमुख दालों के महंगे होने से मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों का खाद्य बजट प्रभावित हो सकता है।
कम बारिश और सूखे से उत्पादन पर संकट की आशंका
दालों की कीमतों में तेजी के पीछे संभावित उत्पादन संबंधी चुनौतियां भी अहम हैं। प्रमुख दाल उत्पादक क्षेत्रों में कम बारिश और सूखे जैसी परिस्थितियों से अरहर की पैदावार प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। अरहर खरीफ की फसल है, जिसके बेहतर उत्पादन के लिए फसल के विकास के दौरान पर्याप्त बारिश जरूरी होती है।
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दूसरी ओर, चना रबी सीजन की प्रमुख फसल है। मिट्टी में नमी की कमी से आने वाले सीजन में चने की बुवाई और उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। अरहर और चना देश में खपत होने वाली प्रमुख दालों में शामिल हैं। दोनों की कुल हिस्सेदारी भारत की दाल खपत में 60 फीसदी से अधिक बताई जाती है। ऐसे में इनकी पैदावार में कमी आने पर बाजार में आपूर्ति घट सकती है और कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
सरकारी खरीद के नियमों में ढील देने की पहल
दालों की उपलब्धता बनाए रखने और सरकारी भंडार के बेहतर प्रबंधन के लिए केंद्र पहले भी कदम उठा चुका है। जुलाई में सरकार ने कृषि मंत्रालय से मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत खरीदी गई दालों के निपटान से जुड़े नौ महीने के नियम में ढील देने को कहा था। इस नियम में बदलाव का उद्देश्य सरकारी भंडार के प्रबंधन में अधिक लचीलापन लाना है। इससे जरूरत पड़ने पर दालों की आपूर्ति बढ़ाने और बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उचित कदम उठाने में मदद मिल सकती है।
पीली मटर के आयात शुल्क में कटौती की मांग
दालों की आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों पर दबाव कम करने के लिए उद्योग जगत पीली मटर पर आयात शुल्क घटाने की मांग कर रहा है। फिलहाल पीली मटर के आयात पर 30 फीसदी शुल्क लागू है। दिसंबर 2023 में केंद्र ने घरेलू बाजार में दालों की उपलब्धता बढ़ाने और अरहर व चना की कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से पीली मटर के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी थी। इसके बाद 2024 में इसका आयात बढ़कर करीब 29.5 लाख टन पहुंच गया। इसी अवधि में भारत का कुल दाल आयात भी रिकॉर्ड लगभग 69 लाख टन तक पहुंच गया था।
पीली मटर अपेक्षाकृत सस्ती होने के कारण चने के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल की जाती है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में भी इसका उपयोग होता है। बाजार में इसकी उपलब्धता बढ़ने से चने की मांग पर दबाव कम हो सकता है, जिससे कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि, केंद्र सरकार ने एक नवंबर 2025 से पीली मटर पर 30 फीसदी आयात शुल्क लागू कर दिया था। इससे पहले की शुल्क-मुक्त व्यवस्था समाप्त हो गई। अब उद्योग जगत फिर से शुल्क में कटौती की मांग कर रहा है, ताकि आयात के जरिए घरेलू बाजार में दालों की उपलब्धता बढ़ाई जा सके।
आम आदमी की थाली पर पड़ सकता है असर
दालें देश के करोड़ों परिवारों के दैनिक भोजन का अहम हिस्सा हैं। ऐसे में अरहर और चना की कीमतों में तेजी के साथ उत्पादन को लेकर बनी अनिश्चितता आने वाले महीनों में महंगाई की चुनौती बढ़ा सकती है। केंद्र के सामने अब यह तय करना महत्वपूर्ण है कि राज्यों की कल्याणकारी योजनाओं के लिए कितनी दाल उपलब्ध कराई जाए और बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कितना भंडार सुरक्षित रखा जाए। वहीं, पीली मटर के आयात शुल्क में संभावित बदलाव भी घरेलू बाजार में दालों की आपूर्ति और कीमतों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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