भारतीय टेलीविजन के इतिहास में ‘रामायण’ केवल एक धारावाहिक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन माना जाता है। लेकिन इस महागाथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘लव-कुश’ ऐसा था, जिसे बनाने को लेकर खुद इसके निर्माता रामानंद सागर शुरुआत में सहमत नहीं थे। इसके पीछे भावनात्मक और धार्मिक कारण जुड़े हुए थेरामानंद सागर भगवान राम के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे। उनके लिए राम केवल एक पात्र नहीं, बल्कि आराध्य थे। यही वजह थी कि वे उस प्रसंग को दिखाने में असहज थे, जिसमें माता सीता का परित्याग होता है। उनके अनुसार, इस कथा को उसी रूप में दिखाना उनकी आस्था के विपरीत था।
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हालांकि, दर्शकों की उत्सुकता लगातार बढ़ रही थी। रावण वध और राम राज्याभिषेक के बाद लोग जानना चाहते थे कि आगे क्या हुआ। इस बीच समाज के कुछ वर्गों, खासकर वाल्मीकि समुदाय ने भी इस कथा को पूरा दिखाने की मांग की। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब प्रधानमंत्री कार्यालय से भी इस विषय पर संपर्क किया गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल एक धारावाहिक नहीं, बल्कि जनभावनाओं से जुड़ा विषय बन चुका था
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आखिरकार, रामानंद सागर ने कुछ बदलावों के साथ ‘लव-कुश’ प्रसंग को दिखाने का निर्णय लिया। उन्होंने इसे अपनी व्याख्या के अनुसार प्रस्तुत किया, ताकि उनकी आस्था और कथा दोनों का संतुलन बना रहे। आज यह हिस्सा भी ‘रामायण’ की तरह ही लोकप्रिय है और इसे IMDb पर भी उच्च रेटिंग मिली है, जो इसकी गुणवत्ता और दर्शकों के प्यार को दर्शाती है।
