नेपाल में निजी मीडिया पर कड़ा प्रहार, सरकार ने कसा शिकंजा

  • अखबार, पोर्टल और यूट्यूब चैनलों पर बड़ा प्रहार, विज्ञापन बंद करने का आदेश
  • नेपाल सरकार सरकारी मीडिया पर हो सकती है मेहरबान

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

काठमांडू। नेपाल में मीडिया जगत को झकझोर देने वाला बड़ा फैसला सामने आया है। प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् कार्यालय के शाखा अधिकृत विनोद रेग्मी द्वारा जारी ताजा पत्र के अनुसार अब से सरकारी निकायों के विज्ञापन निजी अखबारों, ऑनलाइन पोर्टलों और यूट्यूब चैनलों को नहीं दिए जाएंगे। यह कदम सीधे तौर पर निजी मीडिया की आर्थिक रीढ़ पर प्रहार माना जा रहा है। सरकार के इस फैसले के बाद अब सभी सरकारी विज्ञापन केवल सरकारी स्वामित्व वाले माध्यमों – गोरखा-पत्र, रेडियो नेपाल और नेपाल टेलीविजन – में ही प्रकाशित और प्रसारित किए जाएंगे।

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नेपाल सरकार का कहना है कि सरकारी विज्ञापनों के वितरण में लंबे समय से अनियमितता, अपारदर्शिता और आर्थिक गड़बड़ी की शिकायतें मिल रही थीं। कई निजी मीडिया संस्थानों पर “फर्जी प्रसार संख्या” दिखाकर भारी भरकम सरकारी विज्ञापन लेने के आरोप भी लगते रहे हैं। ऐसे में सरकार ने अब इस पूरे सिस्टम को अपने नियंत्रण में लेने का फैसला किया है। इस फैसले से निजी अखबारों की आय का बड़ा स्रोत खत्म हो जाएगा ऑनलाइन पोर्टल और यूट्यूब चैनलों की कमाई पर सीधा असर पड़ेगा। इतना ही नहीं छोटे और क्षेत्रीय मीडिया संस्थान बंद होने की कगार पर आ सकते हैं।

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नेपाल में बड़ी संख्या में मीडिया संस्थान सरकारी विज्ञापनों पर ही निर्भर हैं। ऐसे में यह आदेश उनके अस्तित्व पर संकट खड़ा कर सकता है। मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से सरकारी मीडिया को एकतरफा बढ़त मिल सकती है, जिससे सूचना का संतुलन बिगड़ने का खतरा है। सरकार जहां इसे पारदर्शिता और खर्च नियंत्रण का कदम बता रही है, वहीं निजी मीडिया इसे आर्थिक नाकेबंदी और “आवाज दबाने की रणनीति” करार दे रहा है। नेपाल में यह फैसला केवल विज्ञापन नीति का बदलाव नहीं, बल्कि पूरे मीडिया परिदृश्य को बदलने वाला कदम साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अपने फैसले पर कायम रहती है या बढ़ते दबाव के बीच इसमें बदलाव करती है। फिलहाल इतना तय है- नेपाल में मीडिया और सरकार के बीच टकराव की नई कहानी शुरू हो चुकी है।

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