
- अमावस्यायुक्त प्रतिपदा से शुरुआत करने पर रुष्ट हो जाएंगी देवी
- देवीभागवत में ख़ुद शक्ति ने कहा है यह बात
प्रकृति की मौलिक शक्ति की आराधना का पवित्र पक्ष वासन्तिक नवरात्रि की शुरुआत 20 मार्च दिन शुक्रवार से हो रहा है। अब आप सोच रहे होंगे कि पूरी दुनिया हिंदू नववर्ष और वासन्तिक नवरात्र 19 मार्च से मना रही है तो एक दिन बाद क्यों? लेकिन आपको एक बार देवी भागवत के उस श्लोक को देखना होगा।

अमायुक्ता न कर्तव्या प्रतिवत्पूजने मम।
मुहूर्तमात्रा कर्तव्या द्वितीयादिगुणान्विता।
देवी भागवत के अंतर्गत
इस समय सनातन धर्म के साथ कई अन्य धर्मों के लोग भी महिषमर्दिनी दुर्गा जी की विशेष कृपा प्राप्ति के लिए आराधना करते हैं। इस पक्ष में मां दुर्गा की आराधना से अनेक शक्तियों की प्राप्ति तो होती ही है। मनोवांछित फल भी मिलता है, जिससे जरूरी है कि मनोकामना की पूर्ति के लिए इस पक्ष में पूजन अर्चन कर लाभ पाएं। लेकिन पूजा की शुरुआत मां की अनुमति के अनुसार ही हो तो ठीक है।
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यह रहेगा कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
इस बार कलश स्थापना में अनेक प्रकार के विघ्न बताए जा रहे हैं। शास्त्रों के अनुसार नवरात्र के प्रथम दिन में हैं। शुक्रवार प्रातः 5:35 के बाद कभी भी देवी कलश स्थापना किया जा सकता है।भविष्य पुराण और निर्णय सिंधु में अभिजीत मुहूर्त अत्यधिक शुभ बताया गया है। सम्पूर्णा यदा भवेत अर्थात् अभिजीत मुहूर्त (11:36 से 12:24 ) में कलश स्थापना करना सम्भव न हो तो आप किसी भी समय सूर्यास्त से पहले शुक्रवार को कलश स्थापित कर सकते हैं। बताते चलें कि रात्रि काल में कलश स्थापना को निषिद्ध बताया गया है।

नवरात्रि में ज़रूर करें कन्या पूजन
देवी भागवत में कन्या पूजन का बड़ा ही महत्व बताया गया है। देवी पुराण में कुमारी पूजन का विवरण दिया गया है जिसमें नवरात्रि के दिनों में प्रतिदिन कुमारी पूजन का बड़ा ही महत्व बताया गया है । स्कंद आदिपुराणों के अनुसार एक एक कन्या का प्रतिदिन बढ़ाकर पूजन करें। क्योंकि सकाम {कामना युक्त } अनुष्ठान में 9 की संख्या का विशेष महत्व है। यह संख्या पूर्णांक के रूप में मानी जाती है, जो पूर्ण है वही सभी कामनाओं को पूर्ण कर सकता है। ऐसा 9 दिन करना चाहिए ऐसे में यह संख्या 45 हो जाएगी। इस बार नवरात्र पंचमी और षष्ठी एक ही दिन होने से इन दिनों की कन्या की संख्या जोड़ कर पूजन करें। अंत में कन्या की संख्या 45 हो जाएगी 4+5=9 हो जाएगा। संख्या पूर्ण होने से मनोकामना भी पूर्ण हो जाएगी। सदैव सर्वत्र पूजनीय हैं कन्या समस्त जातियों की ऐसा हमारे धर्म शास्त्रों में उल्लेख प्राप्त होता है नाना प्रकार के मनोवांछित कामनाओं की सिद्धिदात्री है यह कन्या
कन्या पूजन से क्या है लाभ
ब्राह्मणीं सर्वकार्येषु जयार्थे नृपवंशजाम्।
लाभार्थे वैश्यवंशोत्थां सुतार्थे शद्रवंशजाम्।
दारूणे चान्त्यजातानां पूजयेद्विधिना नरः ।।
ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाली कन्या के पूजन से सभी कार्य सिद्ध होते हैं।वहीं क्षत्रिय कुल में जन्म लेने वाली कन्या के पूजन से विजय की प्राप्ति होती है।वैश्य मे जन्म लेने वाली कन्या के पूजन से व्यापार वृद्धि और धन लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। संतान प्राप्ति के लिए शूद्र वंश में जन्म लेने वाले कन्याओं का पूजन करना श्रेष्ठ कर माना गया है।
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कन्याओं का करें इस तरह पूजन
१-ऊँ ह्रीं कल्याण्यै नमः २-ऊँ ह्रीं कौमार्य्यौ नमः३-ऊँ ह्रीं त्रिपुरायै नमः ४- -ऊँ ह्रीं रोहिण्यै नमः ५-ऊँ ह्रीं कामिन्यै नमः ६-ऊँ ह्रीं चण्डिकायै नमः ७-ऊँ ह्रीं शांकर्य्यै नमः ८- ओम दुर्गायै नमः ९ ऊँ सुभद्रायै नमः
ऐसी है मान्यता
- दुर्गा 1
- रोहिणी 2
- कुमारिका 3
- कल्याणी 4
- चण्डीका 5
- शाम्भवी 6
- त्रिमूर्ति 7
- काली 8
- सुभद्रा 9
यानी 9+32+5+24+18+27+2=108: पूर्णांक 9 45:4+5 =9
हिंदी वर्णमाला के अनुसार जिस पंक्ति पर जो अक्षर आया है, उस अक्षर की गिनती कर जोड़ने पर उपरोक्त अंक प्राप्त होते हैं।
