कांग्रेस ने मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष में गड़बड़ी को लेकर BJP को कटघरे में किया खड़ा

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देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉ. हरक सिंह रावत ने मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष और देश में बढ़ते एलपीजी गैस और तेल संकट को लेकर भाजपा को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि केवल उधम सिंह नगर और चंपावत जिलों के आंकड़े ही यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि इस कोष की किस प्रकार बंदरबांट की जा रही है। सूचना के अधिकार में उधम सिह नगर जनपद एवं चम्पावत जनपद से सूचनाएं मागी गई कि किन.किन लाभार्थियों को मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष का लाभ मिला है। पहले तो सूचनाएं देने में विलंब किया गया फिर आधी अधूरी सूचनाएं दी गई। लेकिन जो सूचनाए प्राप्त हुई वह बहुत चौकाने वाली व लंबी सूची है।

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उधमसिह नगर जनपद एवं चम्पावत जनपद मुख्यमंत्री से सम्बंधित जनपद है, क्योकि खटीमा से वह पहले विधायक रहे है और चम्पावत से वर्तमान में विधायक है। और दोनों ही जनपदों में भाजपा से जुडे हुए पदााधिकारियों एवं उनके परिजनों को प्रतिवर्ष मुख्यमंत्री विवेकाधीनकोष से लाभ दिया जा रहा है। हरक सिंह रावत ने कहा कि प्रमुख लाभार्थियों में सुबोध मजुमदार, भारत सिंह, गोदावरी, कान्ता रानी, भरत बांगा, कामील खान, गजेन्द्र सिह बिष्ट, पूरन सिह, संतोष कुमार अग्रवाल एवं मुकेश शर्मा, शान्ता बडोला, राजेन्द्र प्रसाद आदि को पांच लाख रुपए एवं हयात सिह मेहरा जो भाजपा कॉपरेटिव से सम्बंधित है, को चार लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी गई है।

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कांग्रेस नेता ने कहा कि तारा देवी, जसवीर चौधरी, निकिता खडायत, कुसुम देवी, हेम लता जैसे लाभार्थियों को भी 04 लाख, 03 लाख, 02 लाख की आर्थिक सहायता दी गई। चम्पावत में बिना नाम के व्यक्ति को 2023 -24 में 03 लाख् रुपए एवं एक जगह चम्पावत में ही अध्यक्ष नाम से 02 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी गई है। उन्होंने कहा कि यह तो मात्र चंद उदाहरण रखे गए है, पूरी सूची चौंकाने वाली है। उन्होंने कहा कि यदि पूरे प्रदेश के सभी जिलों के आंकड़े सामने आ जाएं तो यह उत्तराखंड के इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए । डॉ. रावत ने कहा कि आज पूरे देश में एलपीजी गैस की आपूर्ति को लेकर संकट जैसे हालात पैदा हो गए हैं, लेकिन सरकार इसे स्वीकार करने के बजाय जनता को गुमराह कर रही है। एक तरफ सरकार गैस की कमी से इनकार कर रही है, वहीं दूसरी ओर गैस बुकिंग के बीच शहरी और ग्रामीण क्षेत्र की जनता को बांटते हुए 25 और 45 दिन का अंतर तय कर दिया गया है, जो इस संकट की गंभीरता को खुद उजागर करता है। यह समज से परे है कि आखिर उपभोक्ताओं में भेदभाव को क्यों किया जा रहा है जबकि गैस की जरुरत सबको बराबर है।

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