नेपाल में पत्रकार पर हमला: भारत को इतिहास से सबक लेकर देना होगा सख़्त संदेश

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शाश्वत तिवारी
 शाश्वत तिवारी

काठमांडू में रिपब्लिक भारत (R BHARAT) के स्टेट हेड और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र पांडेय पर हमला केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह भारत की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है। पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हुई यह बदसलूकी यह दर्शाती है कि नेपाल में भारत विरोधी मानसिकता किस हद तक पनप चुकी है। भारत और नेपाल के संबंध सदियों पुराने धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक बंधनों से जुड़े हैं। दोनों देशों के बीच 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि ने खुली सीमाओं और घनिष्ठ रिश्तों की नींव रखी थी। भारतीय नागरिक बिना वीज़ा के नेपाल जा सकते हैं, और नेपाली नागरिक भारत में बस सकते हैं, काम कर सकते हैं। लेकिन यही खुलेपन को नेपाल की कुछ राजनीतिक ताक़तें भारत के खिलाफ हथियार बनाने लगी हैं।

2015 में जब भारत ने नेपाल के नए संविधान में मधेशियों की अनदेखी पर चिंता जताई थी, तो नेपाल ने भारत पर “नाका बंदी” (Trade Blockade) का आरोप लगाया था। उसी समय से नेपाल की राजनीति में चीन की पकड़ मज़बूत होती चली गई। चीन ने सड़क, हाइड्रोपावर और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) जैसे प्रोजेक्ट्स के ज़रिये नेपाल में गहरी घुसपैठ बनाई। भारत की जगह धीरे-धीरे बीजिंग ने कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। आज नेपाल की राजनीति में भारत की जगह चीन का प्रभाव दिखता है। चीन का इशारा नेपाल की सरकार और स्थानीय प्रशासन पर साफ़ दिखता है। ऐसे माहौल में भारतीय पत्रकार पर हमला केवल भीड़ या आपराधिक तत्वों का काम नहीं माना जा सकता। यह भारत विरोधी माहौल और राजनीतिक दबाव की संगठित अभिव्यक्ति भी हो सकता है। भारत अब केवल औपचारिक निंदा और राजनयिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रह सकता।

  1. नेपाल सरकार को साफ़ शब्दों में चेतावनी दी जानी चाहिए कि भारतीय नागरिकों और पत्रकारों की सुरक्षा राजनीतिक रिश्तों की आधारशिला है।
  2. यदि नेपाल दोषियों पर तुरंत कार्रवाई नहीं करता, तो भारत को अपने आर्थिक और रणनीतिक दबाव के विकल्प इस्तेमाल करने चाहिए।
  3. भारत को नेपाल के भीतर भारत विरोधी ताक़तों की पहचान कर उनका कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर प्रतिरोध करना होगा।

यह घटना हमें याद दिलाता है कि सद्भाव और सहनशीलता की भी एक सीमा होती है। भारत ने हमेशा नेपाल को भाईचारे, धार्मिक साझेदारी और आर्थिक सहयोग के दृष्टिकोण से देखा है। लेकिन यदि वही पड़ोसी बार-बार भारतीय नागरिकों, पत्रकारों और भारत की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचाएगा, तो भारत को भी अपने कदम सख़्त करने होंगे। राघवेंद्र पांडेय पर हमला सिर्फ़ एक पत्रकार पर हमला नहीं, बल्कि भारत की कूटनीति की परीक्षा है। भारत को यह साफ़ संदेश देना होगा_ “भारत की मित्रता अमूल्य है, लेकिन भारत की गरिमा सर्वोपरि है।

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