नेपाली गृहमंत्री रमेश लेखक ने हिंसक प्रदर्शन में हुई मौतों की जिम्मेदारी लेते हुए मंत्रिमंडल से दिया इस्तीफा

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  • नेपाल में भारी हिंसा से जनजीवन प्रभावित
  • भारतीय, विदेशी पर्यटकों और आम जनता में दहशत का माहौल
  • सोशल मीडिया तो बहाना है निशाने पर है ओली सरकार ?

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

काठमांडू । काठमांडू में सुबह स्कूल के छात्रों समेत हजारों युवाओं ने माइतीघर और बानेश्वर इलाकों में मार्च निकाला। प्रदर्शनकारी छात्रों ने सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए फेसबुक, व्हाट्सएप और एक्स सहित 26 सोशल मीडिया पर प्रतिबंध अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया।

क्या एक ही मॉडल से सरकारें गिराने की साजिश रची जा रही है? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि श्रीलंका और बांग्लादेश में युवाओं को आगे कर सत्ता परिवर्तन किया गया। नेपाल में हो रहे घटनाक्रम से लगता है कि मॉडल वही है, भले ही मुद्दे अलग हों। श्रीलंका में प्रदर्शनकारियों ने संसद पर कब्जा कर सरकार गिरा दी थी। बांग्लादेश में भी यही पैटर्न दिखा। अब नेपाल में भी ऐसा ही हो रहा है। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ 16 से 26 साल के युवा सड़कों पर उतरे और संसद तक पहुंच गए। प्रदर्शनकारी शुरू में सोशल मीडिया प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहे थे, लेकिन यह मांग धीरे-धीरे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे तक पहुंच गई। युवा सोशल मीडिया पर पोस्ट कर पीएम ओली से इस्तीफा मांग रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक 18 से अधिक युवाओं की जान जा चुकी है और 100 से अधिक घायल बताए जा रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने सेना तैनात कर दी है। कुल मिलाकर, नेपाल की स्थिति बेहद भयावह और खराब है। जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट सुशांत शरीन ने श्रीलंका और बांग्लादेश के मॉडल का जिक्र किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि अब नेपाल की बारी है! क्या हमसे कुछ चूक हुई कि सड़कों पर गुस्से का यह विस्फोट हो रहा है? एक चिंगारी ही काफी है। हमने इसे श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल में देखा। इंडोनेशिया और म्यांमार में यह और भयावह रूप में दिखा। भारत में किसान आंदोलन और शाहीन बाग के दौरान भी सरकारों की निष्क्रियता और आंदोलनों को दबाने की समझ की कमी दिखी। लोग सोचते हैं कि गुस्सा निकलने के बाद स्थिति शांत हो जाएगी, लेकिन ये आंदोलन अक्सर बड़े रूप ले लेते हैं।

उन्होंने आगे लिखा कि क्या सरकारें सड़कों पर बन रहे दबाव को नजरअंदाज कर रही हैं? क्या कानून प्रवर्तन एजेंसियों को स्थिति का अंदाजा नहीं है? क्या उन्हें विश्वविद्यालयों, अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष हित समूहों या राजनीतिक समूहों में होने वाली गतिविधियों की जानकारी है? क्या अधिकारी अहंकार या चापलूसी में सड़कों की अनदेखी कर रहे हैं, जिससे उपद्रवियों को बढ़ावा मिल रहा है, जैसा मुंबई में हाल ही में देखा गया?  ये अनाम, चेहरा विहीन लोग कहां से आ रहे हैं, जो अचानक वित्तीय राजधानी को बंधक बना लेते हैं? इनका समर्थन और फंडिंग कौन कर रहा है? फंडिंग का पता क्यों नहीं लगाया जा रहा? या ये लोग कौन हैं एजेंसियों को पता है, लेकिन तब तक नजरअंदाज किए जाते हैं जब तक स्थिति बेकाबू न हो जाए?

नेपाल में सोशल मीडिया प्रतिबंध के खिलाफ सोमवार को काठमांडू में हुए हिंसक प्रदर्शनों में कम से कम 18 युवाओं की जान जा चुकी है और 100 से अधिक लोग घायल होने का समाचार है। हालांकि कि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। मृतकों की संख्या बढ़ने की भी बात कही जा रही है। राजधानी के कुछ हिस्सों में तनाव के कारण अधिकारियों को एक दिन का कर्फ्यू लगाना पड़ा। काठमांडू में सुबह स्कूल के छात्रों समेत हजारों युवाओं ने माइतीघर और बानेश्वर इलाकों में मार्च निकाला। प्रदर्शनकारी छात्रों ने सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए फेसबुक, व्हाट्सएप और एक्स सहित 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया। प्रदर्शन तब हिंसक हो गया, जब प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन के पास पुलिस अवरोधकों को तोड़ दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाकर्मियों ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और रबर की गोलियां चलाईं। काठमांडू जिला प्रशासन ने संसद भवन के आसपास अशांति रोकने के लिए दोपहर 12:30 से रात 10:00 बजे तक कर्फ्यू लागू किया। प्रमुख जिलाधिकारी छवि लाल रिजाल ने नोटिस में कहा कि प्रतिबंधित क्षेत्र में लोगों के आवागमन, प्रदर्शन, सभा या धरना-प्रदर्शन की अनुमति नहीं होगी। काठमांडू में सोमवार को शुरू हुए विरोध प्रदर्शन में 28 साल से अधिक उम्र के लोगों के शामिल होने पर पाबंदी थी। इसलिए इसे Gen Z प्रदर्शन नाम दिया गया। 26 साल से कम उम्र के जेन-जेड युवा इसमें शामिल थे। काठमांडू पोस्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़प के बाद आंदोलन हिंसक हो गया, जिसके चलते न्यू बानेश्वर और आस-पास के इलाकों में कर्फ्यू लगाना पड़ा। इन सबके बीच आज गृहमंत्री रमेश लेखक ने हिंसक प्रदर्शन में हुई मौतों की जिम्मेदारी लेते हुए मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है।

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