बड़बोलापन और अहंकार के कारण हारे केजरीवाल!

  • अब पार्टी में बड़ी टूट की खबरें बढ़ा रहे हैं बेचैनी
आनंद सिंह
    आनंद सिंह

दिल्ली विधानसभा के इसी चुनाव में अरविंद केजरीवाल एक स्थान पर भाषण दे रहे थे- मोदी जी! आप कुछ भी कर लो। आप इस जन्म में तो अरविंद केजरीवाल को नहीं हरा पाओगे। दिल्ली का मतलब अरविंद केजरीवाल ही होता है। मुझे हराने के लिए आपको अगला जन्म लेना होगा। और आज, आठ फरवरी को अरविंद केजरीवाल चुनाव हार गये। उन्हें दिल्ली के दिग्गज नेता साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश साहिब सिंह वर्मा ने हराया। मन के किसी कोने में आज केजरीवाल को वह लम्हा स्मरण हुआ होगा, जब उन्होंने झूठे प्रचार के दम पर शीला दीक्षित को पराजित किया था। चुनाव में कई लोग अपना भाग्य आजमाते हैं। एक विजयी होता, शेष सभी पराजित ही होते हैं। लेकिन अरविंद केजरीवाल एक अलग ही किस्म की नेतागीरी करने आए और 10 साल तक किया भी। इन 10 वर्षों में दिल्ली को जहां पहुंचना था, नहीं पहुंच पाई। “भड़ास” के संपादक यशवंत सिंह ने एक्स पर कुछ पंक्तियां पोस्ट की हैं। एक बार उसे पढ़ें। ये परिणाम के पहले की पोस्ट है…फिर हम लोग आगे बात करते हैं…

“दिल्ली का मूड जानने के लिए मैं पूरे चौबीस घंटे नई दिल्ली से लेकर पुरानी दिल्ली तक में कई ऑटो से घूमा। लोगों से बात की। मन मिज़ाज समझा। एक बात कॉमन समझ आई। लोग अरविंद केजरीवाल के बड़बोलेपन से ऊब चुके हैं। वे बदलाव चाहते हैं। ऑटो वाले तो कसम खाकर बैठे हैं कि अबकी केजरीवाल को वोट नहीं देना है। किसे देना है? इस सवाल पर कई ऑटो वाले साफ़ साफ़ कह रहे हैं कि बीजेपी को वोट देंगे क्योंकि अरविंद केजरीवाल ने ऑटो वालों के लिए कुछ नहीं किया। इसलिए सबक सिखायेंगे। दस साल से ऑटो वाले ही इन्हें सरकार में बिठाए हैं। अब ऑटो वाले ही गद्दी से उतारेंगे! बिहार के मूल निवासी ऑटो चालक अरविंद यादव ने कहा- “मुझे पता है बीजेपी आएगी तो वो भी कुछ नहीं करेगी क्योंकि सब केवल चुनाव के समय बोलते हैं। पर वोट बीजेपी को देंगे क्योंकि ऑटो वालों की केजरीवाल ने बहुत उपेक्षा की है। नया तो कुछ किया नहीं, उल्टे साठ साल बाद मिलने वाली पेंशन भी बंद कर दी है।” दिल्ली में बहुत सारे लोग केजरीवाल की शराब पालिसी (एक पर एक फ्री) से खार खाये दिखे। उनके अपने इस पियक्कडी प्रमोशन नीति से कई किस्म के नुकसान में है। परिवार टूटे, सेहत बिगड़ी। ये फैक्टर भी आम आदमी पार्टी के लिए नेगेटिव है। कुल मिलाकर दिल्ली की लड़ाई में ये समझ में आ रहा कि अरविंद केजरीवाल के लिए सत्ता का रास्ता इस बार बहुत टफ है। बीजेपी गर्दन दबोचने को तैयार है। आम आदमी पार्टी का आधार वोट बैंक ऑटो वाले बुरी तरह नाराज़ बैठे हैं।“ ये थी यशवंत की रिपोर्ट।

मुझे याद आता है, दिल्ली के एक अखबार में मैं हरियाणा संस्करणों का संपादकीय प्रभारी था। उस दौर में हमारे स्थानीय संपादक की पहल पर सात कॉलम में दिल्ली-एनसीआर के सभी संस्करणों में फ्लायर छपा, जो दिल्ली सरकार में हुए दवा घोटाले से संबंधित था। लगातार तीन दिनों तक वह खबर फ्लायर में ही, सात कॉलम में ही छपी। इससे नाराज होकर केजरीवाल की सरकार ने उस अखबार का विज्ञापन ही रोक दिया। विज्ञापन रोका सो रोका, उसके बाद एक सीनियर जब केजरीवाल से मिलने गये तो उनसे भी भारी बेइज्जती की गई। यह 2019 की बात है। आज उस अखबार के एक साथी ने बतायाःसर, जश्न मन रहा है हमारे यहां। मुझे याद है, उस वक्त मुझे बुला कर संपादक ने पूरा किस्सा सुनाया था। माफी मांगने के बाद विज्ञापन शुरु तो हुआ लेकिन तब तक कई करोड़ का नुकसान हो चुका था।

आपके लिए अब यह कोई खबर नहीं रह गई कि अरविंद केजरीवाल चुनाव हार गये। लेकिन, आपको उनकी पराजय के कारणों को जरूर जानना चाहिए। दरअसल, केजरीवाल कोई एक कारण से चुनाव नहीं हारे। आप याद करें तो केजरीवाल के पहले शीला दीक्षित जी ने 15 साल सरकार चलाई थी। उस दौर में दिल्ली यकीनन विकास की राह पर बढ़ चली थी। 10-11 साल पहले जब से केजरीवाल आए, दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर से उनकी कभी नहीं पटी। हर दिन कोई न कोई रगड़ा होता ही था। इस चक्कर में दिल्ली को जो तरक्की करनी थी, नहीं कर सकी।

इस बात को केजरीवाल के विरोधी भी मानेंगे कि उन्होंने हेल्थ और एजुकेशन में शानदार काम किया लेकिन यह भी सत्य है कि हेल्थ के क्षेत्र में बड़े-बड़े घोटाले हुए। पानी-बिजली का वादा कुछ दिनों तक तो चलता रहा, बाद में उसमें भी घूसखोरी शुरु हो गई। कई योजनाएं फाइलों में ही पड़ी रह गईं और लोगों का नुकसान हुआ सो अलग। फिर, आप के सत्येंद्र जैन, मनीष सिसोदिया और खुद केजरीवाल तिहाड़ पहुंच गए। शराब घोटाले ने आप को तगड़ी चोट दी। जितना बड़ा घोटाला नहीं था, उसे उससे कहीं ज्यादा भाजपा ने बढ़ा-चढ़ा कर जनता के मन में केजरीवाल के लिए निगेटिव नैरेटिव गढ़ने में सफलता प्राप्त कर ली।

गौर से देखें तो अरविंद केजरीवाल के साथ ही मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन समेत जितने बड़े चेहरे थे आप के, सभी धूल चाट गये। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली में इन नेताओं के साथ-साथ आम आदमी पार्टी भी जमीन चाटती हुई नजर आई। इन नेताओं से संबंधित किसी भी बूथ पर ऐसा लगा ही नहीं कि ये तगड़ा फाइट दे रहे हैं। बेशक मुकाबला एकतरफा नहीं हुआ लेकिन हार और जीत का मार्जिन बड़ा जरूर रहा है।

जाहिर है, जब सेनानायक पराजित होता है तो सैनिक खुद ही सरेंडर कर देते हैं। यही हाल आप का हुआ है। जल्द ही आपको खबर मिले कि आप के अधिकांश नेता भाजपा में जा रहे हैं तो परेशान मत होइएगा क्योंकि कई लोग आज ही के दिन का इंतजार कर रहे थे। आप, पंजाब में भी भाजपा ज्वाइन करने वालों की लंबी कतार लगी हुई है। भगवंत मान की समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि वह करें तो क्या करें। उनके लिए पंजाब आप को इकट्ठा रखना बड़ी चुनौती है क्योंकि पार्टी का सबसे प्रमुख व्यक्ति आज चुनाव हार चुका है। केजरीवाल क्या कदम उठाएंगे, यह तो नहीं पता। वैसे भगदड़ कभी भी शुरु हो सकती है और इसकी चपेट में पंजाब सरकार भी आ जाए तो चकराइएगा मत।

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