काश दहाड-फुफकार से जंगल की आग बुझ जाती

अनिल त्रिपाठी
अनिल त्रिपाठी

एक जंगल की छोटी-मोटी झाड़ी मे आग लगी। छोटे मोटे जीव हलकान परेशान इधर उधर भागने लगे। सियार ने शेर को ख़बर दी – ” महाराज, झाड़ियों में आग लग गई है। कुछ देर में दरख्तों को पकड़ेगी, जल्दी ही पूरा जंगल ज़द में आ जाएगा। हम सब झुलस जाएँगे महाराज, कुछ कीजिये ”
आराम फ़रमा रहे शेर ने गुर्राते हुए अपनी सुरक्षा में लगे गधे से कहा ” मार सारे क चार दुलत्ती..आ के पूरा मज़ा ख़राब कर दिया। आँख लगी ही थी, नई शेरनी से मिलने का सपना सँजो ही रहे थे कि आ गया मनहूस आग की ख़बर ले के। अबे झाड़ी की आग से मेरा क्या लेना देना ! हम तो रहते हैं गुफा में मांद में…यहाँ कौन सी झाड़ी है !
मरोगे तुम। हमको तो बस तुमको खाने से मतलब,अब कच्चा खाएँ या भुना हुआ क्या फ़र्क पड़ता है ? खामखाँ नींद ख़राब कर दी। ”

गधे ने दी घुमा के एक दुलत्ती,..इससे पहले की दूसरी लगाने की मुद्रा बना पाता सियार दुम दबा के किकियता भाग निकला।
जंगल वापस आया तो देखा कई छोटे मोटे जंतु बुरी तरह झुलस चुके हैं। दरख़्त भी आग की चपेट में आ रहे हैं। उसने चीख़ पुकार करते हुए पेड़ों की ऊँची डालियों तक पर बसे पशु-पक्षियों समेत आस पास मौजूद सभी जीवों से गुहार लगाई कि सब मिल के कुछ करें नहीं सब मारे जाएँगे। सब इक्कठा हुए,सबने एक स्वर से जंगल के राजा शेर के पास चलने का सुझाव रखा। सियार ने पूरी घटना बताते हुए कहा वो कुछ नहीं करेंगे। उन्हें तो बस हम लोगों को खाने से मतलब है,अब कच्चा खाएँ या भुना क्या फ़र्क पड़ता है। कुछ और करना पड़ेगा।

ख़रगोश बोला हमे अजगर-एनाकोंडा के पास चलना चाहिए,वो हमारी सहायता कर सकते हैं। कोबरा,करैत सहित दोमुँहे ने तस्दीक की ” हाँ..हाँ.. हमे फ़ौरन चलना चाहिए,वही हमे बचा सकते हैं “। सब चल दिये। कुत्तों को भौंक के सबको आगाह करने और कहाँ आग ज़्यादा है पता लगा के सूचित करने का काम सौंपा गया।
अजगर के पास पँहुच के सजातीय होने के नाते कोबरा,करैत, दोमुँहे आदि ने सबकी तरफ से गुहार लगाई..” दुहाई सरकार की अब आप ही बचाइए,ये आग हम सबको निगल जाएगी।” अजगर -एनाकोंडा ने एक लम्बी जम्हाई लेते हुए कहा ” एकदम्म दुर्बुद्धिये हो का बे..! अबे हम गहरे बिल में बाँबी बना के रहते हैं, हमे इस आग से क्या लेना देना.? ” साथ ही कोबरा करैत आदि सहित सभी विषधरों को लताड़ लगाते हुए कहा ” बहुत नेतागिरी न सवार हो..तुम सब भी तो बिलों में ही रहते हो, तुम काहे परेशान हो ?.. चुप्पे चलो अपने अपने बिल में,..नहीं यहीं पड़ के सो जाओ। हम काहे मरेंगे बे ! मरेंगे ये अभागे जो ज़मीन पर रहते हैं। हमे तो इनको निगलने से मतलब, जिंदा निगलें या भुना हुआ,क्या फ़र्क पड़ता है “।

वो सब वहीं पड़ के सो गए। बेचारे बाक़ी जानवर अब क्या करते, जान बचाने को जिसे जिधर जो रास्ता मिला वो उधर भागने लगा। कुत्ते जी जान से इधर से उधर दौड़ते हुए भौंकते अपनी ड्यूटी निभा रहे थे।
आग फैलते फैलते पूरे जंगल मे फैल गई। प्रचंड आग की तेज़ आँच अब शेर की गुफा-मांद और अजगर के बिल-बाँबी के भीतर भी पँहुचने लगी। गधे ने शेर से कहा – ” महाराज आप ज़ोर से दहाड़िये, आपकी दहाड़ से बड़े बड़े मूत मारते हैं,ये आग क्या चीज़ है ! ” ,उधर कोबरा करैत सब मिल अजगर से बोले – ” हुज़ूर आप तेज़ी से फुफकरिये हम सब भी आपका साथ देते हैं, हमारी फुफकारों की हवा के सामने ये आग क्या टिकने पाएगी ! ”

शेर ने ज़ोर ज़ोर से दहाड़ना शुरू किया, अजगर ने कोबरा करैत के साथ पूरा ज़ोर लगा के फुफकारना। लेकिन अफ़सोस, काश दहाडों या फुफकारों से जंगल की आग बुझ जाया करती।
बिल्कुल यही हाल आज फ़िल्म इंडस्ट्री का है।
आग की आँच तेज़ हो रही है, अभी तक गुफ़ा-मांद बिल-बाँबी में चुपचाप पड़े जीवों की दहाड़ – फुफकार आदि की आवाज़ें आने लगी हैं। बेशक ये आवाज़ अभी और तेज़ होंगी। लेकिन फिर वही अफ़सोस, काश दहाडों या फुफकारों से जंगल की आग बुझ जाया करती।
संयोगवश ये कहानी मैंने राज्यसभा सांसद जया भादुड़ी जी द्वारा लोकसभा सांसद रविकिशन जी के बयान के संदर्भ में संसद में दिए उनके वक्तव्य को देखने के बाद ही लिखी है।