क्या अब जय किसान का नारा सार्थक होगा!

हमारे देश का प्रसिद्ध नारा है, ‘जय जवान जय किसान’, अर्थात देश के दो महानायक माने जाते हैं,जवान और किसान। सच कहा जाए तो ये दोनों ही देश की नींव हैं और इनके दम से ही हमारे देश की इमारत सुरक्षित है। इसलिए देश की सरकार को भी इन्हें मजबूत बनाने की बहुत जरूरत है।

देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद देश से जो सबसे बड़े वादे किए थे, उनमें से एक था वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी को दुगुना करना। मोदी सरकार का मानना है कि यदि खेती से जुड़े कुछ कानूनों में बदलाव कर दिए जाएं तो किसानों की आमदनी दुगुनी हो सकती है। इसके लिए ये जरूरी है कि किसानों को देश में कहीं भी अपनी फसल बेचने का अधिकार हो। इसे ‘एक देश एक बाजार’ के नाम से जाना जाता है। इसके लिए सरकार जो विधेयक लेकर आई है, विपक्षी दल ने उसका विरोध करते हुए इस विधेयक को किसान विरोधी बताया है,

और कहा है कि इससे किसान बर्बाद हो जाएंगे और कृषि पर प्राइवेट कंपनियों का कब्जा हो जाएगा। जबकि प्रधानमंत्री ने इन विधेयकों को किसानों के लिए रक्षा कवच बताया है और किसानों को आगाह करते हुए कहा है कि जो लोग बिचौलियों का साथ दे रहे हैं उनसे किसानों को सावधान रहने की आवश्यकता है। साथ-साथ उन्होंने किसानों को उनकी उपज देश में कहीं भी किसी को भी बेचने की आजादी देना एक ऐतिहासिक कदम बताया है।

अभी तक के कानून के अनुसार किसानों को अपनी फसल को अपने ही जिले की मंडी समिति को बेचना पड़ता था। हर मंडी में बिचौलियों का कब्जा होता है और किसान उनके सामने असहाय होते हैं। इन बिचौलियों के कारण कई बार किसानों की फसल अच्छे दामों पर नहीं बिक पाती बल्कि बहुत कम दामों पर बिकती है। अधिकांशतः इन्हीं बिचौलियों से किसानों को कर्जा लेना पड़ जाता है। क्योंकि आज भी बहुत से गरीब किसान बैंक से कर्ज लेने में कतराते हैं। फसल आने से पहले ही बिचौलियों से कर्ज लेकर किसान इस कर्ज के बोझ तले इतना दब जाते हैं कि वे इससे मुक्त नहीं हो पाते और घबराकर व परेशान होकर आत्महत्या जैसा गलत कदम उठा लेते हैं।

सरकार ने इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए तीन नए विधेयक बनाए हैं। पहला बिल एग्रीकल्चर मार्केट के बारे में है, यह बिल किसानों को पूरी आजादी देता है कि वह अपनी फसल देश में जहां चाहें बेच सकते हैं। दूसरा बिल कांट्रैक्ट खेती के बारे में है, यह बिल किसानों को यह छूट देता है कि वो प्राइवेट कंपनियों के साथ कांट्रैक्ट करके अपनी फसल अच्छी कीमत पर बेच सकते हैं। तीसरा बिल है, आवश्यक वस्तु अधिनियम, जिसमें प्याज,आलू, अनाज और दालों जैसी चीजों को आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी से बाहर रखा गया है।

भारत में कृषि मानसून पर निर्भर करती है। फसलों की पैदावार मानसून पर आधारित होती है और किसान का भाग्य ऊपर वाले के हाथ में होता है। खेती करना एक जुएं की भांति है। किसान दिन-रात मेहनत करता है, किंतु उसका क्या परिणाम निकलेगा, लाभ होगा य हानि, वह नहीं जानता। हर साल, हर सीजन में किसान को यह जुआं खेलना पड़ता है।
किसान अपनी फसल लेकर जब मंडी में पहुंचते हैं, तो उनका पहला सामना आढ़तियों से होता है।

कई बार यह आढ़ती बिचौलिए का काम करने लगते हैं। वो किसानों की मदद के नाम पर उन्हें कम दाम पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर करने लगते हैं और किसान इसके लिए तैयार भी हो जाते हैं। क्योंकि उन्हें तुरंत पैसे की आवश्यकता होती है। किसानों को अधिकांशतः इन्हीं आढ़तियों से कर्जा भी लेना पड़ जाता है। ये आढ़ती राजनीतिक तौर पर बहुत मजबूत होते हैं। ये वहां के लोकल नेताओं से मिले होते हैं और किसी न किसी राजनैतिक पार्टी से जुड़े होते हैं। किसान बेचारे इन आढ़तियों के प्रभाव से डरते हैं। कई बार जब किसान इनका कर्ज उतारने की स्थिति में नहीं होते तो यही आढ़ती उनकी जमीन हड़प लेते हैं। नए विधेयक से इन आढ़तियों की मनमानी पर अंकुश लगेगा।

इन विधेयकों को लेकर किसानों में कई भ्रम व्याप्त हैं, वह सोचते हैं कि इन कानूनों के आने से न्यूनतम समर्थन मूल्य का सिस्टम समाप्त हो जाएगा और किसानों का अधिकार उनकी जमीनों से छिन जाएगा।
अंग्रेजों ने मार्केटिंग बोर्ड की शुरुआत की थी और किसानों को एक ही जगह उपज बेचने को मजबूर कर दिया था। आजादी के बाद इस मार्केटिंग बोर्ड का नाम बदलकर मंडी समिति हो गया, किंतु कानून वही रहा। इस कानून के अंतर्गत किसानों की उपज मंडी समिति ही खरीदेगी।

इसीलिए किसानों से खरीदी गई उपज ग्राहकों तक आते-आते कई गुना महंगी हो जाती है। इस कानून के कारण किसान हमेशा गरीब ही रहा क्योंकि उसे अपनी उपज का सही मूल्य मिला ही नहीं। सरकार जो नए विधेयक लेकर आई है, वह संभवतः किसानों के लिए फायदेमंद साबित होंगे।

किंतु सरकार को यह भी देखना होगा कि खुले बाजार के नाम पर किसानों के शोषण की कोई नई व्यवस्था न शुरू हो जाए। अभी तक तो मंडी समितियां थीं,बिचौलिये और आढ़तिये थे। अब कहीं बड़ी-बड़ी कंपनियों के एजेंट आकर किसानों का शोषण न करने लगें। इसलिए सरकार को इन पर भी अंकुश लगाने की व्यवस्था करनी पड़ेगी।

                                                                                                                            रंजना मिश्रा, कानपुर, उत्तर प्रदेश

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