नौ सितम्बर से शुरु होगा ‘वाह नवाब वाह’ का प्रसारण

  • अवधविद् पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन ने जारी किया पोस्टर

लखनऊ। लखनऊवा नवाबों के लच्छेदार क़िस्से दुनिया भर में मशहूर हैं। ‘पहले आप-पहले आप’ या ‘नवाबी ठाठ’ जैसे जुमले तो सभी जानते हैं किन्तु इन नवाबों ने तहज़ीब की कई मिसालें भी पेश की हैं। नवाबों से जुड़े ये किस्से अब सर्वसुलभ होंगे। लोक संस्कृति शोध संस्थान द्वारा निर्मित धारावाहिक ‘वाह नवाब वाह’ के माध्यम से लोग लखनऊ की नवाबियत के खास पहलू से रूबरू हो सकेंगे। सोमवार को अवधविद् पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन की उपस्थिति में वाह नवाब वाह का पोस्टर रिलीज किया गया।

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एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर सुधा द्विवेदी ने बताया कि लखनऊ के हरफनमौला नवाबों से जुड़ी कहानियां 9 सितम्बर से प्रत्येक बुधवार को लोक संस्कृति शोध संस्थान के यूट्यूब चैनल पर प्रसारित होंगी। नवाबियत की शुरुआत 9 सितम्बर 1722 ई. को हुई थी इसलिए इसी दिन से इस धारावाहिक का प्रसारण भी आरंभ हो रहा है। उन्होंने बताया कि जीतेश श्रीवास्तव के परिकल्पना और संयोजन में एस.के. गोपाल द्वारा निर्देशित यह धारावाहिक लखनऊ की नवाबयुगीन संस्कृति का आईना सिद्ध होगी। प्रोडक्शन मैनेजर मंजूश्री और तकनीकी सलाहकार आशीष मौर्य ने इसमें विशेष श्रम किया है।

शौकीन मिज़ाज थे अवध के नवाब : योगेश प्रवीन
अवधविद् पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन ने बताया कि जो शऊर और तहज़ीब लखनऊ वालों में कूट-कूट कर भरी है, उसका बहुत कुछ श्रेय इन नवाबों को जाता है। ये नवाब शौकीन मिज़ाज और कला प्रेमी थे। उन्होंने बताया कि औरंगज़ेब की मौत के बाद मुग़लिया सल्तनत का आफ़ताब डूबने लगा था और छोटे-मोटे रियासतदार अपने इलाकों के खैरख्वाह बन गए थे। अवध के नवाबों के उत्थान के पीछे भी यही कारण था। लखनऊ के नवाब शिया थे जो ईरान के ख़ुरासान से हिंदुस्तान आए थे। औरंगजेब ने उनको ‘नवाबी’ दी थी।

कुल 135 साल चली थी नवाबियत : जीतेश श्रीवास्तव
धारावाहिक निर्माण की परिकल्पना करने वाले जीतेश श्रीवास्तव ने बताया कि नवाबों की सल्तनत 1722 ई. से शुरू हुई थी। मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह ने सादत अली खान को आगरा से अवध भेजा था और सादत अली खान ने फैज़ाबाद को अवध की राजधानी बनाया। सन 1754 ई. में शुजाउद्दौला को फ़ैज़ाबाद की नवाबी मिली। शुजाउद्दौला के बाद आसफुद्दौला ने राजधानी को फैज़ाबाद से लखनऊ पहुंचा दिया और फिर नवाब यहीं जम गए। वाजिद अली शाह पीढ़ी के आख़िरी नवाब थे। 1857 के गदर के बाद नवाबियत ख़त्म हो गई किन्तु नवाबियत की रुह आज भी ज़िन्दा है। योगेश प्रवीन जी के मार्गदर्शन व संरक्षण में लखनऊवा नवाबियत के रोचक किस्सों को लोगों तक पहुंचाने की पहल की जा रही है।