आपदाकाल में समुदाय विशेष की चिकित्सीय दलों से हिंसा

ले. कर्नल (सेनि.) आदित्य प्रताप सिंह
ले. कर्नल (सेनि.) आदित्य प्रताप सिंह

आज मुरादाबाद तो कल मुर्शिदाबाद और फिर मुंबई, पुंछ और भोपाल यह कोरोना योद्धाओं के विरुद्ध सतत युद्ध रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। निज़ामुद्दीन मरकज़ में थूकने से आरंभ हुयी हिंसा आज 15 अप्रैल को अपने विकरालतम स्वरूप में देश के अनेक हिस्सों में देखने को मिली। जिसमें मुरादाबाद में गंभीर रूप से आहत डॉक्टर की तस्वीरें मन को विचलित करने वाली हैं। पुलिस और चिकित्सीय दल जिहादियों के विशेष निशाने पर हैं। यह हिंसक हमले मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों का एक स्थायी रूप बन चुके हैं। हिंसा के विडियो में मुस्लिम समुदाय के बच्चों से लेकर बूढ़ों और लड़कियों से लेकर दादियों तक को चिकित्सीय दलों पर पथराव करते देखा जा सकता है। कई ऐसे ही मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में गए एक-दो पुलिस के जवानों को इसी अराजक भीड़ के द्वारा अपमानित होकर भी लौटना पड़ रहा है। क्यूँ मुस्लिम समुदाय कोरोना महामारी की रोकथाम में राष्ट्र के साथ सहयोग नहीं करना चाहता है। क्यूँ वह सरकारी व्यवस्था के विरुद्ध युद्धरत होना चाहता है वह भी तब जब वह सरकार की सभी सुविधाओं का सबसे अधिक लाभ भी उठा रहा है। सरकारी अस्पतालों में समानुपातिक रूप से सबसे अधिक लोग इसी समुदाय के दैनिक उपचार के लिए आते हैं। यह समुदाय विशेष इस राष्ट्र के प्रति यूँ कृतघ्न क्यूँ है?

यह हिंसा लंबे समय से सिंचित प्रतिशोध और विरोध की भावना से प्रेरित है। समुदाय विशेष को मोदी सरकार के प्रत्येक कार्य से घृणा की हद तक चिढ़ है। मुस्लिम महिला सशक्तीकरण का सरकार का तीन तलाक विधेयक भी मुस्लिम समाज की अधिकांश महिलाओं को मुस्लिम विरोधी लगता है। तो वहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे इस्लामिक राष्ट्रों में रह रहे पीड़ित गैर इस्लामिक हिन्दू, सिख, ईसाई और जैन समुदाय के सदस्यों को जो भारत में 2014 के पहले से शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं उन्हे भारत की नागरिकता देने के लिए लाया गया नागरिकता संशोधन विधेयक भी इस्लाम विरोधी लगता है। इस विरोध को धीरे-2 इस्लामिक अस्मिता से जोड़ा गया। देश की राजधानी को हिन्दू विरोधी जिहादी हिंसा से जलना पड़ा और फिर उसी कड़ी का अगला चरण कोरोना जिहाद है। पुलिस और चिकित्सीय दलों के विरुद्ध हिंसा विशुद्ध रूप से जिहादी विचारधारा से प्रेरित है। भारत सरकार का विरोध इस्लामिक अलगाववाद जनित है। इसी इस्लामिक विचारधारा का दीर्घकालिक परिणाम राष्ट्र विभाजन था।

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इस हिंसा से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त किसी अन्य राज्य ने अभी तक दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया है। पश्चिम बंगाल को तो ममता सरकार ने पूर्णरूप से जिहादी दया पर छोड़ रखा है। महाराष्ट्र और राजस्थान की स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं है। भारतीय राजनीतिक प्रक्रिया शायद आज भी स्वतन्त्रता से पूर्व के काल में अटक गयी है जहां राज्य की विपक्षी पार्टियों की सरकारों को केंद्र सरकार का विरोध करते हुये ऐसा लगता है जैसे कि वह अंग्रेज़ शासन का विरोध कर रही हैं। काँग्रेस और उससे उत्पन्न दलों में तो यह भावना अभी बिलकुल भी नहीं निकली है। यह उनके अनेक राष्ट्र विरोधी विरोधों में साफ दिखता है। जिहादी हिंसा इसी स्थिति का लाभ ले रही है।

यह महामारी का आपदाकाल किसी युद्धकाल से कम नहीं है और इस समय सरकार के दिशा निर्देशों के उल्लंघन के साथ-2 सरकारी कार्यों में बाधा पहुंचाना राष्ट्रद्रोह है और दोषियों को दंडित करना भी सरकार की वरीयता होनी चाहिए। कहीं अराजक जिहादी तत्व ऐसी परिस्थितियों में हिंसा कर सरकारी प्रतिक्रिया का अनुमान तो नहीं लेना चाहते जिससे वह भविष्य की अपनी अन्य हिंसक गतिविधियों की रणनीति बना सकें। सरकार पर पुलिस बल और चिकित्सा जगत के अनेकानेक कोरोना योद्धाओं का मनोबल ऊंचा रखने की पूरी ज़िम्मेदारी है।