विश्वविद्यालयों को भ्रष्ट कुलपतियों से बचाएं

विवेकानंद त्रिपाठी, रेजिडेंट एडिटर


शिक्षा के क्षेत्र में जब आचरणहीनता और भ्रष्टाचार के मामले उजागर होते हैं तो उसकी अनुगूंज बहुत दूर तक सुनाई पड़ती है। आने वाली नस्लों के विश्वास टूटते हैं। वह हताशा का शिकार होकर कुपथगामी होने लगती है। वजह मूल्यहीनता के मौजूदा दौर में अभी भी इसी क्षेत्र में उम्मीद की किरण भी बची हुई है। इसी हफ्ते महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलपति के कुकृत्य ने संपूर्ण शिक्षा जगत के इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ दिया है। वहां के कुलपति आरपी सिंह रिश्वतखोरी के आरोप में गिरफ्तार हैं। इस घटना से कुलपतियों के चयन प्रक्रिया पर कई सवाल उठ रहे हैं। जिस आरपी सिंह का अकादमिक रिकॉर्ड से लेकर समूचा कार्यकाल स्याह रहा हो उन्हें आखिर किस योग्यता के आधार पर इतने बड़े पद की जिम्मेदारी दे दी गई। आरपी सिंह चाहे बरेली कॉलेज के प्राचार्य रहे हों या मेरठ यूनिवर्सिटी के कुलपति हर जगह उनका कायज़्काल विवादों में ही रहा। उन्होंने भ्रष्टाचार को प्रश्रय ही नहीं दिया बल्कि खुद भी उसमें आकंठ डूबे रहे। क्या उन्हें चयनित करने वाले दोषी नहीं हैं? अगर हां तो वे भी सजा के हकदार क्यों नहीं हैं?

दरअसल कुलपतियों की नियुक्ति में योग्यता नहीं राजनीतिक रसूख हाबी हो चला है। सत्ता के गलियारे तक जिसकी पहुंच है उसके हजार गुनाह माफ हैं। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा के मंदिरों में एक आर्ष वाक्य लिखा देखा जा सकता है। आ नो भद्रा क्रतव: सन्तु विश्वत: इसका अर्थ तो यह है कि दुनिया में जो भी सर्वश्रेष्ठ है वह हमारे अंदर समाहित हो। अब इस आर्ष वाक्य में आ नो भद्रा की जगह आ नो भ्रष्टा होता जा रहा है। अपने देश के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का इतिहास देखें तो ऐसे ऐसे सितारों से जडि़त इतिहास है कि अगर उनके समृद्ध आदर्शो, परंपराओं को सिर्फ आगे बढ़ाया गया होता तो भी इन वैश्विक संस्थाओं में इतना मूल्यों का क्षरण नहीं होता। काल के प्रवाह में उनके द्वारा स्थापित शिक्षण के मूल्य नेपथ्य में चले गए हैं। परस्पर ईष्र्या और एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति विश्वविद्यालयों में इस कदर घर करती जा रही है कि पूर्व में स्थापित सारी समृद्ध परंपराएं धूल धूसरित हो रही हैं। सबसे महत्वपूणज़् क्षेत्र जहां राष्ट्र का भविष्य निमिज़्त होता है, गौड़ होता जा रहा है। एक नकारात्मक वातावरण बनता जा रहा है।

विश्वविद्यालयीय व्यवस्था में दिनोंदिन हो रहे क्षरण पर कई विश्वविद्यालयों के वीसी रह चुके और इस दौर के लिविंग लीजेंड प्रोफेसर भूमित्र देव कहते हैं दरअसल अंधेरे को कोसने वाले ज्यादा हो गए हैं उसे दूर करने के लिए एक चिराग जलाने वाले कम होते जा रहे हैं। कुलपतियों के चयन प्रक्रिया में किसी तरह की गोपनीयता की जरूरत नहीं हैं। कहते हैं इस पद के लिए नाम नियुक्ति के पहले ही सार्वजनिक कर दिए जाने चाहिए। उस व्यक्ति की कमियां अच्छाइयां उजागर हो जाएंगी। इस पद पर नियुक्त होने वाला प्रसिद्ध हो यह जरूरी नहीं। बहुतेरे ऐसे हैं जो बिना किसी ख्याति की लालसा के अपने कर्तव्य की अलख जगा रहे हैं। बस जरूरत है अच्छी नीयत से ऐसे लोगों को तलाश करने की।

इस चयन के तीन ही पैरामीटर होने चाहिए- ईमानदारी, कठिन परिश्रम और रचनात्मक दृष्टि। इस तरह की विशेषता वाला व्यक्ति किसी तरह के झंझावात में कतज़्व्यच्युत नहीं हो सकता। वह कुछ भी कर सकता है। प्रोफेसर देव उन स्टार कुलपतियों में शामिल हैं जिनका शिक्षा जगत में बहुत ही आदर के साथ नाम लिया जाता है। उन्होंने पद को अपने कदमों में रखा और मूल्यों को सिर आंखों पर। उनके कायज़्काल से जुड़ा एक मशहूर वाकया है। पत्रकारों को प्रोफेसर देव साक्षात्कार दे रहे थे। बरेली के एक बहुत वरिष्ठ पत्रकार ने उनसे एक सवाल पूछा आपका रंग कौन सा है? प्रोफेसर देव को इस सवाल के निहितार्थ समझने में देर नहीं लगी।

उन्होंने एक क्षण सोचकर फौरन जवाब दिया – मेरा रंग वही है जो विश्वविद्यालय का रंग है। जिस दिन आपको लगे कि यह रंग बदरंग हो रहा है मुझे बता दीजिएगा मैं छोडक़र चला जाऊंगा। कुलपतियों के चयन के लिए जो पैरामीटर उन्होंने सुझाए उसे उन्होंने अपने कार्यकाल में हर तरह के चयन के दौरान अपनाया। उनके कार्यकाल से जुड़ा एक वाकया और। रुहेलखंड विश्वविद्यालय को एक लीगल एडवाईजर की तलाश थी। प्रोफेसर देव ने अपने स्रोतों से तमाम लोगों से किसी अच्छे वकील के बारे में पता लगाया तो उन्हें राधाकमल सारस्वत नाम के एक ऐसे वकील का नाम पता चला जिसे कोई जानता नहीं था मगर उसकी काबिलियत बेमिसाल थी।

कई लोगों को इस नाम पर आपत्ति भी हुई। पर प्रोफेसर देव की पारखी नजरों ने तो उस हीरे को परख लिया था लिहाजा वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। सारस्वत ने भी उनके विश्वास को डिगने नहीं दिया। सारस्वत जब तक विश्वविद्यालय के विधि सलाहकार रहे हाईकोर्ट तक विश्वविद्यालय को किसी भी केस में शिकस्त नहीं मिली। प्रोफेसर भूमित्रदेव कहते हैं कि पारदर्शिता और ईमानदारी से काम किया जाय तो इस तरह के लोग खुद ब खुद जुड़ते जाते हैं और एक इतिहास रच दिया जाता है। अपनी इस सफलता का श्रेय वे खुद नहीं अपनी टीम को देते हैं।

इस क्रम में उन्होंने बरेली के प्रोफेसर आरके शर्मा का नाम बहुत आदर और स्नेह से लिया। कहा उन जैसे लोगों के चलते ही जो कुछ अच्छा था संभव हो पाया। दुखद यह है कि आज इस पद पर कई ऐसे लोग बिठा दिए जा रहे हैं जिनकी निष्ठा विश्वविद्यालय के रंग में नहीं पार्टियों के रंग में रंगी है। वही उनकी योग्यता है। जिसका खामियाजा देश के भावी कर्णधारों को भुगतना पड़ रहा है। आरपी सिंह जैसे लोग इसी तरह के रंगों में रंगे हैं उनकी निष्ठाएं अपने आकाओं के प्रति हैं ताकि वे भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाते रहें और आकाओं के कवच कुंडल से उन्हें त्राण मिलता रहे।

प्रोफेसर भूमित्र देव की विश्वविद्यालयों की दिशहीनता, मूल्यहीनता पर की गई यह टिप्पणी समूचे सिस्टम को कटघरे में खड़ी करती है और आत्मचिंतन को प्रेरित करती है। उनके शब्दों में ‘गुलाम भारत के विश्वविद्यालय आजाद थे और आजाद भारत के विश्वविद्यालय गुलाम हैं।’ दरअसल राजनीति से प्रेरित होकर जब तक कुलपति नियुक्त होते रहेंगे शिक्षण संस्थाओं में आरपी सिंह जैसे दागदार दामन के लोग आते रहेंगे। गौर करने की बात है कि विश्वविद्यालयों में बहुतेरे अच्छे लोगों की खामोशी और उदासीनता से ढेर सारी स्वस्थ परंपराओं ने दम तोड़ दिया है। ‘हक अच्छा है पर इसके लिए कोई और लड़े तो और अच्छा है’ इस तरह की प्रवृत्ति से विश्वविद्यालयों का बंटाधार हो रहा है। साठ के दशक की बात है।

ख्यातिलब्ध राजनेता, साहित्यकार, शिक्षाविद के एम मुंशी ने राज्यपाल रहते हुए विश्वविद्यालयों के मेधावी छात्रों के लिए चांसलर कैंप की शुरुआत की थी। इसमें हर क्षेत्र के विशेषज्ञ बुलाए जाते थे और उनसे विद्यार्थियों का परिचय कराया जाता था। यह स्वस्थ परंपरा उनके अवसान के बाद ही खत्म हो गई। इसे शुरू करने पर किसी का ध्यान नहीं। इसी तरह से कई कुलपतियों ने भी विश्वविद्यालयों में कई अच्छी परंपराएं शुरू कीं मगर उनका भी कोई नामलेवा नहीं है। जरूरत है विश्वविद्यालयों की स्वस्थ परंपराओं को पुनर्जीवित करने की। पर हकीकत यह है कि आरपी सिंह सदृश वीसी भगवान बन जाते हैं और वे सिर्फ अपने भक्तों से ही बात करते हैं। अच्छे लोगों से खुद भी डरते हैं और उन्हें अपने सत्ता से गठजोड़ के बल पर डराते भी हैं। पर जरूरत है ‘आ नो भद्रा क्रतव: संतु विश्वत:’ के आर्ष वाक्य को जीवन में और आचरण में उतारने की तभी विश्वविद्यालयों की गरिमा और गौरव अक्षुण्ण रह सकेगा। विश्वविद्यालयों को भ्रष्टाचार के इस धुंध से उबारने के लिए योग्य, ईमानदार और जीवन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध लोगों की तलाश जरूरी है।