लोकप्रिय होते हुए भी लुप्तप्राय विधा में नौटंकी का शामिल होना निश्चय ही विचारणीय है : डा.पूर्णिमा पाण्डे

  • उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी का ‘नौटंकी: कल आज और कल’ वेबिनार
  • ‘उत्तर भारत का आपेरा है नौटंकी’

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की लोकनाट्य विधा नौटंकी अपने आप में अद्भुत विशिष्टताएं रखती है। समय के साथ इसमें आई अश्लीलता और आधुनिक मनोरंजन साधनों ने इसे विलुप्ति की कगार पर खड़ा किया है पर संरक्षण और इसमें आई विसंगतियों का दूर करके इसकी जीवंतता को नई शक्ति मिलेगी। यह कहना उन वक्ताओं का था जो आज उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की ओर से प्रारम्भ की वेबिनार शृंखला में ‘नौटंकी: कल आज और कल’ विषय पर अपने विचार रख रहे थे। वेबिनार का शुभारम्भ करते हुए अकादमी की अध्यक्ष डा.पूर्णिमा पाण्डे ने कहा कि लोकप्रिय होते हुए भी लुप्तप्राय विधा में नौटंकी का शामिल होना निश्चय ही विचारणीय है और ऐसे आयोजन विधा को पुष्ट करने में मददगार होेंगे। अकादमी के सचिव तरुणराज ने बताया कि कोरोना संकटकाल में अकादमी की वेबिनार शृंखला का यह पहला कार्यक्रम है। इसकी हम अकादमी अभिलेखागार के लिए रिकार्डिंग भी संरक्षित कर रहे हैं। यह शृंखला हम आगे भी जारी रखेंगे।

गर्म पानी के साथ लें किशमिश, मौजूद एंटीऑक्सीडेंट झट से बढ़ाएगा इम्युनिटी, जानें और भी इसके फायदे

लोक गायिका मीता पंत के संचालन में चले वेबिनार में विषय प्रवर्तन करते हुए मथुरा के प्रतिष्ठित विद्वान डा.खेमचन्द्र यदुवंशी ने नौटंकी में अपनाई गई वंदना की गायकी की एक बानगी वाद्यों के साथ पेश करने के साथ उसके इतिहास को रखा। नौटंकी को भगत और सांगीत विधा से जोड़कर सातवीं सदी के मध्यकाल में इस रसभरी-प्रेम भरी वाणी की शुरुआत बताते हुए कहा कि प्रदेश की लोक विधा नौटंकी विश्वस्तर की पहचान रखती है। इसका ज़िक्र आइने अकबरी में भी मिलता है। उन्होंने बताया कि आगरा में 1927 में आगरा में ‘स्याहपोश’ का प्रदर्शन हुआ था। नथाराम शर्मा गौड़ ने इसे विस्तार दिया फिर बंदी खलीफा ने इसे कानपुर-लखनऊ में नौ झीलों का प्रयोग ‘शहजादी’ नामक प्रस्तुति में करके नौटंकी नाम दिया। दिल्ली के विद्वान पं.रामदयाल शर्मा ने लंदन में अंग्रेजी में विश्वस्तर पर प्रस्तुत हीर-रांझा की प्रस्तुति में नौटंकी के छंदों के अपने प्रयोग की चर्चा करते हुए कहा कि नौटंकी उत्तर भारत का ओपेरा है। नौटंकी संवर्धन की आवश्यकता देते हुए उन्होंने कहा कि कम्पनियों की पैसे की चाह में इसमे नाच और अश्लीलता आ गई।

लखनऊ के रंगनिर्देशक आतमजीत सिंह ने लैला मंजनू, आला अफसर, मुंशीगंज गोली काण्ड जैसी नौटंकी प्रस्तुतियों का जिक्र करते हुए कहा कि आधुनिक रंगमंच के तत्वों से नौटंकी और नौटंकी के तत्वों से आधुनिक रंगकर्म को बल मिलेगा। प्रयागराज के अतुल यदुवंशी ने नाटकीयता को नौटंकी की आत्मा बताते हुए कहा कि इसके पीछे हमारे विद्वानों की सदियों का श्रम और परम्परा रही है। उन्होंने 2011 में प्रयागराज में हुए नौटंकी के विशेष समारोह के बारे में भी बताया। वाराणसी के कला विद्वान अष्टभुजा मिश्र ने देश के बटवारे में कलाकारों के पलायन की पीड़ा रखते इस बात पर ज़ोर दिया कि नौटंकी का छंद विधान विशिष्ट है, इसे संरक्षित और समृद्व रखा जाय।

मुम्बई के रंगकर्मी-लेखक विभांशु वैभव ने नौटंकी को फैशन की तरह इस्तेमाल किये जाने पर एतराज जताते हुए बचपन के अनुभव रखे और कहा कि अपनी लोक कलाओं के संरक्षण से ही हमे नई दृष्टि व जीवंतता मिलेगी। वेबिनार में मुम्बई के ही लेखक विजय पण्डित ने भी नौटंकी के संरक्षण की जरूरत बताते हुए अभिनव प्रयोगों की चर्चा की। वेबिनार में दिल्ली के सुमन कुमार और प्रयागराज के सतीश चित्रवंशी ने भी इस गौरवमयी लोकनाट्य परम्परा पर विचार रखे। विद्वानों का श्रोताओं से सवाल जवाब का सिलसिला भी चला। वेबिनार में नाट्य सर्वेक्षक शैलजाकांत पाठक, छायानट के संपादक राजवीर रतन भी उपस्थित रहे। इस दौरान नौटंकी के खास वाद्य नक्कारे पर उस्ताद इब्राहिम खां, ढोलक पर अशोक नागर व हारमोनियम पर वासुदेव नागर ने भी नौटंकी छंदों के साथ आवश्यक स्थलों पर वादन किया।