सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्श टीवी के एक विवादित कार्यक्रम पर लगायी रोक,साम्प्रदायिक कार्यक्रम बताया

  • कोर्ट ने कहा कि मीडिया का अधिकार नागरिकों की ओर से है और यह मीडिया का एक्सक्लूसिव अधिकार नहीं
  • इलेक्ट्रानिक मीडिया के स्व नियमन में मदद के लिए एक समिति गठित करने का सुझाव

नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम की विवादित कड़ियों के प्रसारण पर रोक लगा दी है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस केएम जोसेफ की तीन सदस्यीय पीठ ने इस कार्यक्रम की दो कड़ियों के प्रसारण पर रोक लगाते हुए कहा कि इस समय पहली नजर में ऐसा लगता है कि यह कार्यक्रम एक समुदाय को बदनाम करने वाला है।
इन कड़ियों का प्रसारण मंगलवार और बुधवार को किया जाना था। न्यायालय ने कहा कि पहली नजर में ही ये एक समुदाय को बदनाम करने वाले प्रतीत होते हैं। द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक सुदर्शन न्यूज चैनल के एक शो में अगस्त माह में एक शो का ट्रेलर चलाया गया था। इसमें दावा किया गया था कि नौकरशाही में एक समुदाय की घुसपैठ के षडयंत्र का बड़ा खुलासा किया जाएगा। इस शो का प्रसारण 28 अगस्त को रात 8 बजे होना था, लेकिन जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने उसी दिन इस पर रोक लगा दी थी। इसके बाद 9 सितंबर को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने चैनल को कार्यक्रम के प्रसारण की इजाजत दे दी थी। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने उसे नोटिस भेजा था, लेकिन प्रसारण रोकने से इनकार कर दिया था।इसके बाद इस कार्यक्रम के प्रसारण के बारे में शीर्ष अदालत में याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता के वकील ने इस कार्यक्रम के प्रसारण पर अंतरिम रोक लगाने सहित कई राहत मांगी थी।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस केएम जोसेफ की तीन सदस्यीय पीठ ने इस कार्यक्रम की दो कड़ियों के प्रसारण पर रोक लगाते हुए कहा था कि इस समय पहली नजर में ऐसा लगता है कि यह कार्यक्रम एक समुदाय को को बदनाम करने और उकसाने वाला है। यह कार्यक्रम तथ्यों के बगैर ही यह संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं को संदेह के दायरे में ले आता है और उन पर भी आरोप लगता है।

सुदर्शन टीवी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने पीठ से कहा कि चैनल इसे राष्ट्रहित में एक खोजी खबर मानता है।इस पर पीठ ने दीवान से कहा, ‘आपका मुवक्किल देश का अहित कर रहा है और यह स्वीकार नहीं कर रहा कि भारत विविधता भरी संस्कृति वाला देश है। आपके मुवक्किल को अपनी आजादी के अधिकार का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए।
लाइव लॉ के अनुसार जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘जब आप कहते हैं कि जामिया के छात्र सिविल सेवाओं में हो रही ‘घुसपैठ’ का हिस्सा हैं, यह स्वीकार्य नहीं है। आप किसी एक समुदाय को लक्षित नहीं कर सकते, और एक विशेष तरीके से उन्हें चिह्नित नहीं किया जा सकता। जस्टिस जोसेफ ने इसमें जोड़ा, ‘वह भी गलत तथ्यात्मक रूप से गलत बयानों के आधार पर। इस वीडियो में उन्होंने जामिया आवासीय कोचिंग अकादमी (आरसीए) से पढ़कर यूपीएससी की परीक्षा पास करने वालों को जामिया का जिहादी बताया था।

वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये मंगलवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, ‘हम मीडिया पर किसी तरह की सेंसरशिप का सुझाव नहीं दे रहे हैं, लेकिन मीडिया में स्वत: नियंत्रण की कोई न कोई व्यवस्था होनी चाहिए।
पीठ ने कहा, ‘हम मीडिया रिपोर्टिंग के बारे में कुछ मानक कैसे निर्धारित करें.’ पीठ ने कहा कि मीडिया में स्वत: नियंत्रण की कुछ व्यवस्था होनी चाहिए और इस सवाल पर हम सॉलिसिटर जनरल को सुनेंगे। सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि पत्रकारों की स्वतंत्रता सर्वोच्च है और प्रेस को नियंत्रित करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक होगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि पेश याचिका में कुछ विषयों की रिपोर्टिग कैसे की जाए, इस बारे में दिशा निर्देश बनाने और स्वत: नियंत्रण के दिशानिर्देश बनाने का अनुरोध किया गया है।

पीठ ने कहा कि हम यह नहीं कह रहे कि राज्य ऐसे दिशा निर्देश थोपेंगे क्योंकि यह तो संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रदत्त बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए अभिशाप हो जाएगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि टीवी चैनल के राजस्व का मॉडल और उसके स्वामित्व का स्वरूप वेबसाइट पर सार्वजनिक दायरे में होना चाहिए। पीठ ने कहा, ‘मीडिया का अधिकार नागरिकों की ओर से है और यह मीडिया का एक्सक्लूसिव अधिकार नहीं है। पीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान सुझाव दिया कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के स्व नियमन में मदद के लिए एक समिति गठित की जा सकती है। पीठ ने कहा, ‘हमारी राय है कि हम पांच प्रबुद्ध नागरिकों की एक समिति गठित कर सकते हैं जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए कुछ मानक तैयार करेगी। हम राजनीतिक विभाजनकारी प्रकृति की नहीं चाहते और हमें ऐसे सदस्य चाहिये, जिनकी प्रतिष्ठा हो।