शुक्र ग्रह पर जीवन के संकेत, एलियन के अस्तित्व को मिली पहली बार स्वीकारोक्ति

शुक्र ग्रह पर जिस तरह से जीवन के संकेत मिले हैं उसको देखते हुए आने वाले दिनों में ब्रह्मांड के ऐसे रहस्य उजागर होंगे जो अब तक कि वैज्ञानिक खोजों की नई परिभाषा गढ़ने वाले होंगे। एलियन के अस्तित्व को लेकर अभी तक कपोल कल्पना ही कि जाती रही है। पर अब उसका अस्तित्व भी प्रमाणित होने के पुख्ता साक्ष्य मिल गए हैं। इस प्रश्न का जवाब सदियों से खोजा जा रहा है।

इसी कड़ी में वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि शुक्र ग्रह के वायुमंडल में फॉस्फीन गैस मिली है। यह एक जैविक प्रक्रिया या बायोलॉजिकल प्रोसेस से पैदा होती है। इस खोज से ब्रह्मांड में एलियन होने की संभावना फिर जाग गई है। नासा प्रमुख ने इस खोज को पृथ्वी से इतर जीवन की तलाश में ‘अब तक की सबसे महत्वपूर्ण खोज’ करार दिया है। हमने पांच प्रश्नों के जरिए बताया है कि इस खोज को लेकर आपको उत्साहित क्यों होना चाहिए और आगे क्या होगा?

वैज्ञानिकों को क्या मिला है शुक्र ग्रह पर?

नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित खोज में रिसर्चर्स ने दावा किया है कि शुक्र ग्रह के वायुमंडल में एसिडिक बादलों में फॉस्फीन नाम की गैस मिली है। पृथ्वी पर फॉस्फीन ऐसे माइक्रोब्स से बनी होती है, जो बिना ऑक्सीजन के जीवित रह सकते हैं। यह औद्योगिक प्रक्रियाओं में जन्म लेने वाली गैस है।

हवाई में जेम्स क्लर्क मैक्सवेल टेलीस्कोप के डिप्टी डायरेक्टर जेसिका डेम्पसी ने इस गैस को खोज निकाला है। उन्होंने बताया, “यह गैस आपको स्वैम्प्स और डिकम्पोज होने वाली वस्तुओं पर मिलती है। माइक्रोब्स जैसी एनारोबिक लाइफ हमारी हवा से निकलकर बादलों पर जम जाती है।’

फॉस्फीन गुरु और शनि ग्रहों के वायु मंडलों में भी पाई जाती है। लेकिन, वहां इनके होने का कारण कुछ केमिकल प्रक्रियाएं हैं। यह प्रक्रियाएं न तो पृथ्वी पर संभव है और न ही शुक्र ग्रह पर। इसी वजह से वैज्ञानिकों को लग रहा है कि यह जीवन का संकेत हो सकती है।

इस खोज का मतलब क्या है?

इसके दो मतलब है- 

1. जीवित माइक्रोब्स हो सकते हैं। लेकिन यह शुक्र ग्रह पर नहीं बल्कि उसके बादलों में हैं। हम जानते हैं कि शुक्र की सतह किसी भी जीवन के लिए अनुकूल नहीं है। यह गैस जिन बादलों में मिली है वहां तापमान 30 डिग्री सेल्सियस था।

 2. यह माइक्रोब्स उन जियोलॉजिकल या केमिकल प्रक्रियाओं की वजह से बन सकते हैं, जो हमें पृथ्वी पर नहीं दिखती और हम उसे नहीं समझ सकते।

डॉ. डेम्पसी का कहना है कि हम यह 100% दावा नहीं कर सकते कि हमने वहां जीवन खोज लिया है। लेकिन यह भी नहीं कह सकते कि वहां जीवन नहीं है। यह संभावना जगाने वाली खोज है। हमें जो फॉस्फीन गैस मिली है, उसके वहां होने के कारण अब तक हमें पता नहीं है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, रीवरसाइड, के प्लेनरी साइंटिस्ट स्टीफन केन कहते हैं कि हमने पृथ्वी पर बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं से फॉस्फीन को बनते नहीं देखा है। जियोलॉजिकल कारण भी हमें नहीं पता है। लेकिन यह भी नहीं कह सकते कि ऐसा हर जगह होता है।

फॉस्फीन गैस के होने में जीवन होने जैसा क्या है?

इस समय कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। यदि जीवन शुक्र पर नहीं मिलता है तो फॉस्फीन गैस के वहां होने का बिल्कुल ही अलग कारण होगा। पृथ्वी जैसा तो कतई नहीं। हालांकि, जो माइक्रोब्स वहां मिले हैं, वह पृथ्वी पर भी चरम परिस्थितियों में होते हैं- जैसे जियोथर्मल पूल्स पर। वे पांच प्रतिशत एसिड वाले पर्यावरण में जीवित रह सकते हैं।

तुलनात्मक रूप से शुक्र ग्रह के बादल 90 प्रतिशत एसिडिक होते हैं। इंटरनेशनल रिसर्च टीम का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर जीन ग्रीव्स ने कहा कि वहां कोई जीवन अस्तित्व में है तो उस पर प्रयोग करने का कोई आसान तरीका नहीं है।

तो इस खोज को लेकर उत्साहित होने की वजह क्या है?

नासा के बॉस जिम ब्राइडस्टीन ने इस खोज को पृथ्वी से ईतर जिंदगी की तलाश में अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया है। नतीजों की अब तक पुष्टि नहीं हुई है। फॉस्फीन के शुक्र के वायुमंडल में पाए जाने और इससे जीवन होने के संकेत का दावा करना बेहद उलझा हुआ मामला है। यदि यह जीवन के लक्षण हैं तो इसके आसपास जीवन का अस्तित्व बताने वाले अन्य केमिकल्स के संकेत भी मिलने चाहिए।

वैज्ञानिक यह कैसे पता लगाएंगे कि यह वाकई में जीवन है या कुछ और?

प्रोफेसर ग्रीव्स का कहना है कि अब तक जो नतीजे मिले हैं, उसके आधार पर कोई दावा नहीं कर सकता। इसके लिए हमें स्पेसक्राफ्ट भेजना होगा। सैम्पल जुटाने होंगे। तब ही पता चल सकेगा कि वहां जीवन किसी भी स्वरूप में मौजूद है या नहीं।

नासा ने अगले दशक में शुक्र ग्रह पर भेजने के लिए दो डिस्कवरी मिशन और एक फ्लैगशिप मिशन के प्रस्तावों को हरी झंडी दे दी है। फ्लैगशिप मिशन में एक ऑर्बिटर का इस्तेमाल करते हुए शुक्र पर खोज की जाएगी। यह ऑर्बिटर एक टेफ्लोन-कोटेड गुब्बारा, ग्लाइडर और लैंडर होगा। दोनों ही मिशन में फॉस्फीन के साथ-साथ फॉस्फोरस एसिड की भी तलाश की जाएगी जिससे यह पता चलेगा कि गैस नॉन-बायोलॉजिकल प्रोसेस से पैदा हुई है