भूमि पूजनः गृह मंत्री के संक्रमित होने के बाद अब प्रधानमंत्री के आने पर सवाल!

  • अभी ये स्पष्ट नहीं की कि गृहमंत्री अमित शाह पिचले दिनों पीएम के संपर्क में आए थे या नहीं
  • WHO और ICMR की गाइडलाइन को मानने की बाध्यता, होना पड़ेगा आइसोलेट
  • गृहमंत्री ने खुद कहा कि मेर संपर्क में आए लोग आइसोलेट हो जाए और जांच कराए

अनिल उपाध्याय

लखनऊ। गृह मंत्री अमित शाह ने कोरोना संक्रमण के कारण खुद को आइसोलेट कर लिया है। अब वो 5 तारीख को होने वाले श्रीराम के मंदिर निर्माण के भूमि पूजन में नहीं आएंगे। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय ने भी अमित शाह के आने की पुष्टि कर दी है। सवाल ये है कि गृहमंत्री के संक्रमित निकलने के बाद क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भूमि पूजन कार्यक्रम में आ पाएंगे ? ये सवाल इसलिए उठ रहा है कि WHO और ICMR की गाइडलाइन के मुताबिक कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए व्यक्ति को भी आइसोलेट होना पड़ता है। ऐसे में अगर बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की मुलाकात न हुयी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता और अगर नीतिगत और महत्वपूर्ण फैसलों के कारण दोनों का संपर्क हुआ है तो प्रधानमंत्री का भूमि पूजन में आना भी असंभव हो जाएगा। हालांकि अभी ये साफ नहीं हो पाया है कि पीएमओ या प्रधानमंत्री की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं आया है। वैसे गृहमंत्री ने खुद ट्वीट में लिखा है कि मेरा अनुरोध है कि आप में से जो भी लोग गत कुछ दिनों में मेरे संपर्क में आयें हैं, कृपया स्वयं को आइसोलेट कर अपनी जांच करवाएं। ऐसे में महत्वपूर्ण हो जाता है कि कौन-कौन सा महत्वपूर्ण शख्श गृहमंत्री से मिला था।

वैसे अयोध्या नगरी भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण मंदिर के लिए पूरी तरह तैयार हो चुकी है। भूमि पूजन कार्यक्रम की तैयारियां अंतिम चरण में है। ऐसे में ऐन वक्त पर गृह मंत्री अमित शाह कोरोना संक्रमण के कारण कार्यक्रम में नहीं आ रहे है । हिन्दुत्व के नायक बनकर उभरे और 1992 में हुए अयोध्या आंदोलन के नायक लालकृष्ण आडवाणी को पहले आमंत्रित नहीं करने की खबरें थी पर बाद में बताया गया कि फोन पर न्यौता दिया गया था पर वो भी भूमिपूजन में नहीं आएंगे। इसी तरह मुरली मनोहर जोशी भी वीडियो कान्फ्रेंसिग से ही भूमि पूजन करेंगे। इनके न आने के पीछे कोरोना संक्रमण और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे बड़े कारण भी है। ऐसे में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का वह बयान महत्वपूर्ण हो जाता है जिसमें उन्होंने कहा था कि मंदिर निर्माण का यह सही समय नहीं है।

देश में कोरोना संक्रमण के बेहद तेज रफ्तार के बढ़ते आंकड़ों के बीच भूमि पूजन की टाइमिंग पर सियासी और धार्मिक हलको में पहले भी कई सवाल उठे थे। धार्मिक सरोकारों से जुड़े लोग ही नहीं बल्कि आम रामभक्त भी भूमि पूजन की टाइमिंग को लेकर संशय में है। उनका मानना है कि इतने लंबे संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर निर्माण की सारी बाधाएं दूर कर दी हैं। भगवान राम करोड़ो हिन्दूओं की आस्था का केन्द्र हैं। ऐसे में कोरोन संक्रमण को कही भूमि पूजन के लिए क्यों चुना गया।
डब्लूएचओ की गाइडलाइन है आईसीएमआर के भी नियम है। इन नियमों को मानना खास से लेकर आम तक बाध्यता है। ऐसे में यह जटिल समय ही क्यों चुना गया। खैर यह समय इस मामले में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का फैसले पर सवाल उठाने का नहीं है पर ‘ बड़ों ’ के ना आने से हालात कुछ ऐसे बन गये हैं कि चर्चा हो ही रही है। मौजूदा हालातों की बात करें तो अमित शाह भारतीय जनता पार्टी में हिन्दुत्व के नए नायक बनकर उभरे हैं। धारा 370 हटाने और सीएए जैसे फैसलों के बाद उनकी यह छवि और मजबूत हुयी है। ऐसे में ऐसे में उनके भूमिपूजन में न आ पाना भी कार्यक्रम की सियासी चकाचौंध पर असर डाल सकती है।

वहीं भाजपा की राजनीति को राम मंदिर आंदोलन से ‘ऐतिहासिक माइलेज ’ दिलाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी भी इस ऐतिहासिक पल के गवाह नहीं होंगे। उन्हें पहले तो बुलाया ही नहीं गया और बाद में जब फोन से न्यौता दिया तो उन्होंने भी आने के बजाय विडियो कान्फ्रेसिंग से कार्यक्रम में शामिल होने की बात कह दी। राम मंदिर आंदोलन को देख चुका हर शख्श जानता है कि मंदिर आंदोलन के सबसे बड़े हीरो वह ही थे। वही आडवाणी जो आज भाजपा में सबसे वरिष्ठ हैं पर हाशिए में हैं।
वो आडवाणी ही थे जिन्होंने सितंबर 1990 में उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए दक्षिण से अयोध्या तक 10 हजार किलोमीटर लंबी रथयात्रा शुरू की थी।

आडवाणी का रथ जिन शहरों से गुजरा, उनमें से कई जगहों पर सांप्रदायिक हिंसा हुई और कई लोग मारे गए। रथ बिहार पहुंचा तो वहां की नई नवेली लालू यादव सरकार ने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। इसके बावजूद देश भर से बड़ी संख्या में कारसेवक और संघ परिवार के लोग अयोध्या पहुंचे और बाबरी ढांचे पर हमले की कोशिश की। पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। दोनों पक्षों में संघर्ष हुआ और कई कारसेवक मारे गए। केंद्र की वीपी सिंह सरकार को कमजोर बताते हुए बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद यूपी और देश की सियासत में भाजपा का ग्राफ बढ़ता ही चला गया। खैर इन सबके बीच अयोध्या को प्रधानमंत्री के आने का इंतजार है।