‘मनोरमा दादी माँ का खजाना एवं हमारे संस्कार’ का मालिनी अवस्थी ने किया ऑनलाइन विमोचन

लखनऊ। ‘मनोरमा दादी माँ का खजाना एवं हमारे संस्कार’ का विमोचन बुधवार को पद्मश्री से सम्मानित मालिनी अवस्थी ने ऑनलाइन किया। विमोचन के दौरान उन्होंने कहा कि हमें हमारी संस्कृति को बचाने की जरुरत है जो की विलुप्त होती जा रही है। इस समय में ये पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी। सत्येन्द्र सिंह द्वारा अपनी विलुप्त होती जा रही संस्कृति को बचाने का यह प्रयास अप्रतिम है। इस पुस्तक को पढ़कर हमें इसमेंलिखी बातों को आत्मसात करना होगा तभी इस पुस्तक को लिखना सार्थक होगा। इस पुस्तक में ऐसे पौष्टिक पारम्परिक पकवानों का जिक्र है जो अब हमारी रसोईं से विलुप्त हो रहे हैं। पकवानों और संस्कारों के मिलन को इस पुस्तक में बेहतरीन ढंग से बताया गया।

उन्होंने कहा कि संस्कृति किसी भी देश, जाति और समुदाय की आत्मा होती है। संस्कृति से ही देश, जाति या समुदाय के उन समस्त संस्कारों का बोध होता है जिनके सहारे वह अपने आदर्शों, जीवन मूल्यों आदि का निर्धारण करता है। संस्कृति का साधारण अर्थ होता है – संस्कार, सुधार, परिष्कार, शुद्धि, सजावट आदि। भारतीय प्राचीन ग्रंथों में संस्कृति का अर्थ संस्कार से ही माना गया है। कौटिल्य जी ने विनय के अर्थ में संस्कृति शब्द का प्रयोग किया गया है। भारतीय प्राचीन ग्रंथों में भी अंग्रेजी शब्द कल्चर के समान संस्कृति शब्द का प्रयोग होने लगा है। संस्कृति का अर्थ हम भले ही कुछ निकाल लें किन्तु संस्कृति का संबंध मानव जीवन मूल्यों से है।
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है। विश्व की विभिन्न संस्कृतियाँ भारतीय संस्कृति के समक्ष पैदा हुई और मिट गईं। भारतीय संस्कृति में महान समायोजन की क्षमता होती है। यहाँ पर विभिन्न संस्कृतियों के लोग आए और यहीं पर बस गए। उनकी संस्कृतियाँ भारतीय संस्कृति का अंग बन गईं। इसी वजह से भारतीय संस्कृति लगातार आगे बढती जा रही है।

पुस्तक के लेखक सत्येन्द्र सिंह ने कहा कि स्वादिष्ट भोजन बनाना एक कला है, इसी कारणवश भारतीय संस्कृति में इसे पाक कला कहा गया है, अर्थात् भोजन बनाना एक कला है । भारतीय भोजन विभिन्न प्रकार की पाक कलाओं का संगम है। भारतीय भोजन स्वाद और सुगंध का मधुर संगम है। प्राचीन काल में, जब भारत आने के लिये केवल खैबर-दर्रा ही एकमात्र मार्ग था क्योंकि उन दिनों समुद्री मार्ग की खोज भी नहीं हुई थी। उन दिनों में भी यहाँ आने वाले विदेशी व्यापारियों को भारतीय भोजन इतना अधिक पसंद था कि वे इसे पकाने की विधि सीख कर जाया करते थे और भारत के मोतियों के साथ ही साथ विश्‍वप्रसिद्ध गरम मसाला खरीद कर अपने साथ ले जाना कभी भी नहीं भूलते थे।

सत्येन्द्र ने कहा कि पकवान, यह नाम सुनते ही मुँह में पानी आने लगता है। आजकल लोग पकवान अपने घर से अधिक होटल या रेस्त्रां में खाना अधिक पसंद करते हैं। आजकल की महिलायें घर में काम या तो करना ही नहीं चाहती हैं या अपनी व्यस्तता के कारण एवं समयाभाव की वजह से कर नहीं पाती हैं। पहले की महिलायें घर में ही गेहूँ पीसने से लेकर भोजन परोसने तक का कार्य खुद ही करती थी। पहले खेतों में यूरिया की जगह गोबर की खाद प्रयोग में लायी जाती थी जिसकी वजह से किसी भी तरीके से आप कोई भी पकवान बनायें जहाँ उसका स्वाद लाजवाब होता था वहीँ वे पौष्टिकता से भरपूर होते थे। यही कारण था की पहले लोग स्वस्थ रहते थे। भोजन हमेशा नहा-धोकर, स्वच्छ रसोई में ही बनाना चाहिए। तभी उसमें स्वाद आता है। भोजन बनाते समय हमेशा अपना मन साफ़ रखना चाहिए, खुश रहना चाहिए, तथा अच्छी बातों को ही सोचना चाहिए क्योंकि आप यदि ख़ुशी मन से भोजन बनायेंगे तो फिर आप स्वयं देखेंगे की खाने वाला उँगलियाँ चाटता रह जायेगा।

उन्होंने कहा कि अच्छे एवं ख़ुशी मन से बनाये हुए भोजन को खाने से मन प्रफुल्लित एवं प्रसन्न रहता है हमारे मन में भी अच्छे विचार आते हैं। इस पुस्तक में उन पकवानों को बनाने की विधि बताई गयी है जो की अब आजकल के लोग भूल गए हैं तथा आने वाली पीढ़ियां तो शायद इनका स्वाद कभी चख भी न पाएं। पाश्चात्य भोजन तो सभी बड़े चाव से खाते हैं लेकिन अपने भारतीय व्यंजन को लोग भूल रहे हैं जो की हमारे लिए अत्यंत शर्म की बात है। आज यदि आप पकवानों की किताब भी यदि बाज़ार में देखेंगे तो वे भी सारी पाश्चात्य व्यंजनों से भरी पड़ी है। जबकि पाश्चात्य व्यंजनों में कोई पौष्टिकता नहीं होती है तथा लोग फ़ास्ट फ़ूड खा खा कर अपने शरीर को बर्बाद कर रहे हैं। उम्मीद है आपको यह किताब अवश्य पसंद आयेगी।

पकवान को मैंने संस्कार से भी जोड़ने की कोशिश की है क्योंकि लोग आजकल अपने भारतीय संस्कार को भूल कर पाश्चात्य संस्कार में ढलते जा रहे हैं वहीँ विदेशों के लोग भारत में आकर यहाँ के संस्कार अपनाना चाहते हैं तथा यहाँ का पर्यटन काफी कुछ भारत के त्यौहार और यहाँ की रस्मों , संस्कारों की वजह से ही बढ़ रहा है क्योंकि विदेशी सैलानी यहाँ पर भारतीय शादियाँ देखने तथा यहाँ के त्योहारों को मनाने के साथ यहाँ की सभ्यता को देखने आते हैं तथा उसका आनंद लेने आते हैं वहीँ हम लोग यहाँ की सभ्यता को भूलते जा रहे हैं। संस्कारों से ही बालक सद्गुणी, उच्च विचारवान, सदाचारी, सत्कर्म परायण, आदर्श पूर्ण, साहसी एवं संयमी बनता है। बालक के ऐसा बनने पर देश तथा समाज भी ऐसा ही बनता है, किन्तु बालक के संस्कार हीन होने से वह देश को बिगाड़ेगा, अर्थात अधर्माचरणवाला, नास्तिक तथा देशद्रोही बनकर समाज को दूषित करेगा। जिसके परिणामस्वरूप वह चोरी, डकैती, आतंकवाद, कलह, वैर तथा युद्ध जैसी परिस्थिति उपस्थित कर सकता है। इसलिये हिन्दू-समाज के बालकों का जन्म के पूर्व ही संस्कार कराने का विधान है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए में यहाँ भारतीय संस्कारों के बारे में बताया है ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी इसे अमल में लाये।

पुस्तक की प्रेरणास्रोत मनोरमा सिंह ने कहा अगर नई जेनरेशन को पारंपरिक भोजन के गुणों के बारे में बताया जाए तो उनका रुझान भी इस ओर बढ़ेगा। बच्चों को प्रारंभ से पारंपरिक भोजन दिया जाए तो उन्हें इसका स्वाद पड़ेगा और थोड़ा बड़ा होने पर इसके गुणों की जानकारी देने से उन्हें आदत पड़ जाएगी और वे अपने फूड कल्चर को समझ पाएंगे। पारंपरिक भोजन अनाज, ताजी सब्जियों, फलों, दूध और दूध से बने पदार्थों से बनाया जाता है। ये सभी चीजें सेहत के लिए अच्छी हैं। इस पुस्तक के छपवाने का मुख्य कारण यह है की हमारी आने वाली पीढ़ियां इस स्वाद को महसूस ही न करें वरन उसे चख भी सकें।

भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि हजारों सालों के बाद भी यह अपने मूल स्वरूप में जीवित है जबकि मिस्त्र, यूनान और रोम की संस्कृतियाँ अपने मूल स्वरूप को विस्मृत कर चुकी हैं। भारत में नदियों, वट, पीपल जैसे वृक्षों, सूर्य तथा अन्य प्राकृतिक देवी-देवताओं की पूजा करने का क्रम शताब्दियों से चला आ रहा है। इन्हीं भारतीय संस्कारों को इस किताब के माध्यम से सुन्दर तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में फास्ट फूड ने अपना खासा स्थान बना लिया है क्योंकि महिलाओं के पास नौकरी के कारण समय कम है। पहले संयुक्त परिवार में यह समस्या नहीं थी। अब एकाकी परिवार में रहने के कारण फास्ट फूड पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। भले ही स्वाद में मजेदार है फास्टफूड पर यह पारंपरिक भोजन का विकल्प नहीं हो सकता क्योंकि पारंपरिक भोजन पौष्टिकता से भरपूर होता है और अंत तक स्वादिष्ट वाला भी होता है। पारंपरिक भोजन पौष्टिकता के अलावा बनाने वाले के प्रति भावनात्मक लगाव भी पैदा करता है। इस भोजन के सेवन से शरीर की वृद्धि होती है, तनाव कम होता है और थकान भी दूर होती है।

डॉ अनिल वशिष्ठ ने कहा भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र आध्यात्मिकता है। भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिकता का आधार ईश्वरीय विश्वास होता है। यहाँ पर विभिन्न धर्मों और मतों में विश्वास रखने वाले लोग आत्मा-परमात्मा के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं। उनकी दृष्टि में भगवान ही इस संसार का रचयिता एवं निर्माता है।
वही संसार का कारण, पालक और संहार कर्ता है। त्याग और तपस्या भारतीय संस्कृति के प्राण होते हैं। भारतीय संस्कृति के प्रमुख तत्व त्याग की वजह से मनुष्य में संतोष गुण परिपूर्ण रहता है। त्याग की भावना की वजह से मनुष्य के मन में दूसरों की सहायता सहानुभूति जैसे गुणों का विकास होता है और स्वार्थ व लालच जैसी बुरी भावनाओं का नाश होता है।

भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति है। इससे विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी माना जाता है। जीने की कला हो या विज्ञान और राजनीति का क्षेत्र, भारतीय संस्कृति का सदैव विशेष स्थान रहा है। अन्य देशों की संस्कृतियाँ तो समय की धारा के साथ-साथ नष्ट होती रही हैं किन्तु भारत की संस्कृति आदि काल से ही अपने परंपरागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनी हुई है।
आज के समय में सभ्यता और संस्कृति को एक-दूसरे का पर्याय समझा जाने लगा है जिसके फलस्वरूप संस्कृति के संदर्भ में अनेक भ्रांतियाँ पैदा हो गई हैं। लेकिन वास्तव में संस्कृति और सभ्यता अलग-अलग होती हैं। सभ्यता का संबंध हमारे बाहरी जीवन के ढंग से होता है यथा – खान-पान, रहन-सहन, बोलचाल जबकि संस्कृति का संबंध हमारी सोच, चिंतन, और विचारधारा से होता है।

संस्कृति का क्षेत्र सभ्यता से कहीं व्यापक और गहन होता है। सभ्यता का अनुकरण तो किया जा सकता है लेकिन संस्कृति का अनुकरण नहीं किया जा सकता है। हम पेंट-कोट पहनकर और अंग्रेजी बोलकर पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करते हैं न कि पाश्चात्य संस्कृति का। भारतीय संस्कृति की पृष्ठभूमि में मानव कल्याण की भावना निहित है। यहाँ पर जो भी काम होते हैं वो बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय की दृष्टि से ही होते हैं। यही संस्कृति भारतवर्ष की आदर्श संस्कृति होती है। भारत की संस्कृति की मूल भावना ‘वसुधैव कुटुम्ब कम’ के पवित्र उद्देश्य पर आधारित है।