हाईकोर्ट ने अमरावती मामले पर कोई भी जानकारी सार्वजनिक करने पर लगायी रोक, मीडिया पर भी प्रतिबंध

  • सोशल मीडिया पर भी नहीं आएगी कोई जानकारी, दिए निर्देश

हैदराबाद। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने मंगलवार देर रात एक अप्रत्याशित आदेश में कहा कि अमरावती में जमीन खरीद के संबंध में एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा द्वारा राज्य के पूर्व कानून अधिकारी और अन्य के खिलाफ दर्ज एफआईआर की जानकारी सार्वजनिक न की जाए। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि इस संबंध में कोई भी समाचार इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट या सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक , चीफ जस्टिस जेके माहेश्वरी ने आदेश में कहा, ‘अंतरिम राहत के माध्यम से यह निर्देशित किया जाता है कि किसी भी आरोपी के खिलाफ इस रिट याचिका को दायर करने के बाद (एफआईआर) कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। किसी भी तरह की पूछताछ और जांच पर भी रोक रहेगी।

मुख्य न्यायाधीश जेके माहेश्वरी द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि यह निर्देशित किया जाता है कि इस संबंध में कोई भी समाचार इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट या सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। आदेश में कहा गया है कि आंध्र प्रदेश सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा राज्य के गृह विभाग के सचिव और डीजीपी को यह सुनिश्चित करने के लिए सूचना दी जाए कि अदालत के अगले आदेश तक इस संबंध में प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कोई समाचार प्रकाशित न हो।
आदेश में कहा गया, ‘इस संबंध में सोशल मीडिया पोस्ट भी प्रकाशित नहीं होगा। इस बारे में संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म/संगठनों को सूचना देने के लिए आंध्र प्रदेश के डीजीपी और केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय आवश्यक कदम उठाएंगे।

रिपोर्ट के अनुसार, बीते मंगलवार को एफआईआर दर्ज होने के बाद पूर्व कानून अधिकारी का प्रतिनिधित्व करते हुए वरीष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और श्याम दीवान ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार उन्हें निशाना बना रही है और मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक लगाने सहित हाईकोर्ट से राहत की मांग की। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस जेके माहेश्वरी की पीठ कर रही थी।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि आंध्र प्रदेश भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो उनके खिलाफ गलत इरादे से काम कर रही है। इस पूरे मामले को राजनीतिक रंग देने के साथ मीडिया ट्रायल में बदला जा रहा है। आंध्र प्रदेश सरकार की ओर से पेश होते हुए वकील सी. मोहन रेड्डी ने कहा था कि प्रतिबंधात्मक आदेश की अपील का कोई मतलब नहीं था क्योंकि खबर पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक में चल चुकी थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने नोटिस जारी कर बचावपक्ष से चार सप्ताह के अंदर जवाब मांगा।