Lockdown में सरकारी दावे दिखे हवाई, हापुड़ में 2 साल की बच्ची का इलाज नहीं होने के कारण तोड़ा दम

  • पैसे न होने के कारण दो साल की बीमार बच्ची का इलाज तक नहीं करा सका गरीब मजदूर
  • कोई मदद करने नहीं आया, अब प्रशासन का दवा, नहीं थी आर्थिक तंगी, ऱाशन दिया था

महेश मिश्रा

लखनऊ। ये दास्तान सरकार के उन जिम्मेदार अफसरों के उन दावों की सच्चाई बताने में सक्षम हैं जो वो गरीबों की मदद के लिए गाहे-बगाहे करते रहते हैं। हापुड़ में लॉकडाऊन के दौरान बेरोजगार हुए एक पिता के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि अपनी दो साल की बीमार मासूम बच्ची का कहीं इलाज करा सके। सरकारी अस्पताल भी बंद थे। लॉकडाऊन के कारण तमाम लोग खुद ही परेशान थे ऐसे में उसे कहीं से उधार भी नहीं मिला।

योगी सरकार गरीबों के खाते में पैसा डालने की बात क रही थी पर इस गरीब के खाते में भेजा रूपया भी नहीं आया। ऐसे में इलाज न होने करा पाने के कारण बेबस पिता के सामने ही बीमार मासूम ने दम तोड़ दिया। विडम्बना तो ये है कि जिला-प्रशासन के जिम्मेदार अफसर अब अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए परिवार को राशन उपलब्ध कराने के दावे कर रहे हैं।

कोरोना संकट और लॉकडाऊन के दौरान गरीब जनता के क्या-क्या मुसीबत झेली उसकी तस्वीरें अब सामने आ रही हैं। ये तस्वीरें बता रही हैं कि कोरोना महामारी के दौरान सरकारी बदइंतजामी ने ने गरीबों को कितना बेबस कर दिया था। ऐसी ही तस्वीर हापुड़ जनपद से निकलकर सामने आई है। यहां हर्षविहार में रहने वाला सुन्दर मजदूरी करके परिवार पालता था। लॉकडाउन में काम न मिलने की वजह से परिवार के आगे जीवय-यापन की दिक्कतें आने लगी। इसी दौरान उसकी दो साल की मासूम बच्ची बीमार पड़ गयी।

उसने बच्ची का सही इलाज कराने की बहुत कोशिश की। सरकारी अस्पताल के चक्कर भी काटे लेकिन वहां सिर्फ कोविड19 के मरीज ही देखे जा रहे थे। प्राइवेट डाक्टरों की फीस बहुत ज्यादा थी और उसके पास कुछ नहीं बचा था। अखबारों में गरीबों की मदद करने की तसव्री छपवाने वाली स्वंयसेवी संस्थाएं भी पता नहीं उस वक्त कहां थी। प्रशासन के जिम्मेदार अफसरों के पास इतना समय नहीं था कि उस गरीब की गुहार सुन सके। ऐसे में वो अपनी बच्ची का इलाज नहीं करा सका और उस बच्ची ने बेबस पिता और मजबूर मां की आंखों के आगे दम तोड़ दिया।

बच्ची की मां हेमा बेटी की मौत की बात बताते हुए आंखों में आंसू लिए अपना दर्द बयां कर रही थी। हेमा ने बताया कि जब से लॉकडाउन लगा, तभी से बच्ची बीमार चल रही थी। हमारे पास इलाज कराने के लिए रुपये नहीं थे। कई बार लोगों से रुपये उधार मांगे लेकिन नहीं मिले। सरकार लॉकडाउन बढ़ाती रही और इसी के साथ उनकी मजदूरी और बेबसी भी बढ़ती चली गयी। परिवार का कहना है कि लॉकडाउन के चक्कर मे उनकी बेटी चली गई। वहीं मामला सामने आने पर प्रशासन ने अपने बचाव की तैयारी शुरु कर दी। अफसरों ने मजदूर की गरीबी को ही झुठला दिया। प्रशासन ने कहा कि प्रशासन के सामने कोई आर्थिक तंगी नहीं थी। परिवार को राशन उपलब्ध कराने की बात कही है।