कोरोना गाइड लाइन का पालन कराने में जमकर होती लापरवाही

  •  भीड़ भरे अस्पताल में दवा का छिड़काव तक समय से नहीं होता
  •  अवकाश के दिन छोड़कर एक हजार से अधिक मरीज पहुंचते अस्पताल

बांदा  ।  कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए तमाम गाइड लाइन बनाई गई हैं, लेकिन उनका पालन नहीं कराया जा रहा है। जिला अस्पताल का हाल तो बहुत ही बेहाल है। अवकाश के दिन छोड़ दिया जाए तो प्रतिदिन एक हजार मरीज अस्पताल पहुंचते हैं। लेकिन वहां पर न तो सेनेटाइजेशन का कोई इंतजाम हैं और न ही कोरोना गाइड लाइन का ही पालन कराया जा रहा है। बिना मास्क और बिना सामाजिक दूरी का पालन किए मरीज और उनके तीमारदार अस्पताल में चिकित्सक के चेंबर, पर्चा काउंटर और दवा वितरण कक्ष में मंडराते नजर आते हैं।

यूपी की राजधानी लखनऊ ही क्या, देश की राजधानी दिल्ली तक में कोरोना वायरस को लेकर सतर्कता बरती जा रही है। भीड़ भरे स्थानों पर आवाजाही के लिए न सिर्फ रोक है बल्कि स्कूल और कालेजों तक को बंद कर दिया गया है। लगातार वहां दवा का छिड़काव हो रहा है और मास्क तथा सेनेटाइजर भी वितरित किए जा रहे हैं। लेकिन स्थानीय जिला अस्पताल में कोरोना वायरस से बचाव के लिए सतर्कता बरतने का ढोल जरूर पीटा जा रहा है लेकिन हकीकत में कोई इंतजामात नहीं हैं।

प्रतिदिन एक हजार से अधिक मरीज जिला अस्पताल पहुंच रहे हैं, लेकिन भीड़ भरे अस्पताल में दवा का छिड़काव तक नहीं किया जा रहा है। न तो मास्क मिल रहे हैं और न ही सेनेटाइजर ही उपलब्ध हो पा रहा है। हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।
कोरोना वायरस को लेकर सतर्कता बरतने और दवा आदि का छिड़काव कराए जाने या फिर मास्क उपलब्ध कराते हुए सेनेटाइजर वितरित करने के मामले में स्थानीय स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह से शून्य है। यहां पर कोई व्यवस्थाएं नहीं हैं। शासन स्तर से जारी निर्देशों का स्थानीय अस्पताल प्रशासन पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।

स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी स्थान पर भीड़ जमा नहीं होनी चाहिए। लेकिन अस्पताल में इसके ठीक उलट काम हो रहा है। एक दिन में एक हजार से अधिक मरीज और उनके तीमारदार अस्पताल में उपचार कराने के लिए पहुंच रहे हैं। पर्चा काउंटर से लेकर चिकित्सकों के चेंबर और दवा वितरण कक्ष में भी मरीजों की रेलमपेल मच रही है। लेकिन अफसोस कि स्थानीय स्वास्थ्य विभाग को यह सब नजर नहीं आ रहा है। कोरोना का दूसरा संदिग्ध मरीज पहले ट्रामा सेंटर और फिर मेडिकल कालेज भेजा गया है, लेकिन अभी तक अस्पताल कैंपस में दवा का छिड़काव तक नहीं किया गया है।

इससे बड़ी लापरवाही स्थानीय स्वास्थ्य विभाग की और क्या होगी कि अस्पताल के कर्मचारियों को ही मास्क नहीं उपलब्ध हो पा रहे हैं। सेनेटाइजर भी मिल पाना स्वास्थ्य कर्मियों को मुमकिन नहीं हो पा रहा है। सहमे स्वास्थ्य कर्मचारी किसी तरह से अपना काम कर रहे हैं। कोई रुमाल चेहरे पर बांध रहा तो कोई तौलिया। हालात बदतर हैं। लेकिन स्थानीय स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी कान में तेल डाले बैठे हैं।

नहीं मिल पा रहे N-95 मास्क

बांदा। जिला अस्पताल और ट्रामा सेंटर में काम करने वाले चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मचारियों को भी मास्क के लाले हैं। साधरण मास्क तो कुछ स्वास्थ्य कर्मियों को उपलब्ध हो गए हैं लेकिन बेहतर मास्क जिसका नाम ‘नाइनटी फाइव’ मास्क है, स्वास्थ्य कर्मचारियों को नहीं मिल पा रहे हैं। स्वास्थ्य कर्मचारियों का कहना है कि उच्चाधिकारियों को अवगत भी कराया गया, लेकिन इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मरीजों का उपचार करने में उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

ओपीडी में संक्रमण फैलने का खतरा

राजधानी में स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी आदेशों के अनुसार देखा जाए तो 10 लोगों से अधिक की भीड़ एक जगह पर एकत्र नहीं होनी चाहिए। लेकिन स्थानीय जिला अस्पताल के पर्चा काउंटर या फिर दवा काउंटर में एक बार में कम से कम एक-एक सैकड़ा मरीज जमा हो रहे हैं। चिकित्सकों के चेंबर तक में मरीजों की रेलमपेल मची हुई है। ऐसे में स्वास्थ्य कर्मचारियों को ही संक्रमण से बचाव के लिए न तो मास्क मिल पा रहे हैं और न ही अन्य व्यवस्थाएं ही उपलब्ध हो पा रही हैं। ऐसे में स्वास्थ्य कर्मचारियों को जहां संक्रमण का खतरा बना हुआ है वहीं मरीज और उनके तीमारदार तो सहमे हैं ही। अभी हाल ही में जिला अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ डा. टीआर सरसैया भी पाजिटिव हो गए थे। जिलाधिकारी के निरीक्षण के दौरान उनकी गैरहाजिरी पर बताया गया था कि डाक्टर कोरोना से ग्रसित होने के कारण गैरहाजिर हैं।

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