कोरोना से भी भयानक खतरा मंडरा रहा है सम्पूर्ण जीव जगत पर

  •  कमजोर हो रहा पृथ्‍वी का चुंबकीय क्षेत्र
  •  खतरा मंडरा रहा है सैटेलाइट और अंतरिक्ष यानों पर
महेश मिश्र

कोरोना महामारी का संक्रमण कम होने का नाम नहीं ले रहा है यह संक्रमण चीन के वुहान प्रांत से उत्पन्न होकर पूरे विश्व में अपना धाक जमाकर बैठ गया है। फिलहाल इंसान इस संक्रमण से पूरा विश्व एक साथ होकर लड़ रहें है। और इसी लड़ाई के बीच और भी कई तरह के रोगों का पनपना लोगों के लिए खतरा है। आपकों बता दें कि पहले कोरोना, उसके बाद हंता, फिर यूरोपिए देशों में कावासाकी नामक बीमारी ने जन्म ले लिया।

कोरोना वायरस वैक्सीन की शायद न पड़े ...

यह एक गंभीर रोग है, जो ज्यादातर पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों में अधिक होता है। इस तथ्य पर वैज्ञानिकों का मानना है कि कावासाकी संक्रमण (जैसे-वायरस या जीवाणुओं के विष) के कारण होता है। इस बीमारी की पहचान पहली बार जापानी बच्चों में 1967 में की गई थी। शोध के अनुसार, कावासाकी संक्रमण के कारण हो सकता है और कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यह वंशानुगत कारकों से भी होता है।

बच्चों में कावासाकी रोग के लक्षण ...

फिलहाल अभी पूरा विश्व इन बिमारियों से लड़ रहे है। और इसी बीच भारत के  पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता पर जो मुसीबत ढाई है उसे बयां नही किया जा सकता है। इस चक्रवाती तूफान अम्फान ने भारी तबाही मचाई है। इस तूफान की वजह से 72 लोगों की मौत हो गई। 15 की मौत कोलकाता शहर में हुई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मानना है तूफान से एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

The Shift India -चक्रवाती तूफान अम्फान' का ...

आपको बता दें कि 29 अक्टूबर 1999 को आए इस सुपर साइक्लोन के कारण 250 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चली थीं और संभवतः किसी चक्रवात से हुई सबसे बड़ी तबाही दी थी। 1999 का ओडिशा चक्रवाती तूफान उत्तर हिंद महासागर का सबसे शक्तिशाली चक्रवाती तूफान था। इस तूफान की केंद्रीय दबाव 912 मिलिबार था, जो एक रिकॉर्ड है। उसी साल से लेकर ओडिशा ने जो बदलाव किए हैं उससे क्या दूसरे राज्य भी सीख सकते हैं?

कमजोर हो रहा पृथ्‍वी का चुंबकीय क्षेत्र, सैटेलाइट और अंतरिक्ष यानों पर मंडरा रहा है खतरा

और इन बस समस्याओं को खत्म होने से पहले एक और समस्या हमारे बीच आ गया है। जिसे सुनकर लोगों के पैरों तले से जमीन खिसक जाएगा। एक-एक करके खतरा दुनिया के सामने आ रहा है। हम सभी ने कक्षा 6 से 12 तक के सभी विज्ञान की किताबों में एक अध्याय चुम्बक का होता है जिसे हर कोई पढ़ा होगा या सुना होगा कि पृथ्वी चुम्बक की तरह व्योहार करती है और इसका यह व्योहार ही अंतरिक्ष में होने वाली कई तरह की घटनाओं से बचाती है।

Earth's Magnetic Field Is Weakening 10 Times Faster Now | Live Science
पिछली दो शताब्दियों में पृथ्वी अपनी चुम्बकीय शक्ति का 10% तीव्रता खो चुका है

वहीं पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र हमें सौर विकिरण से बचाता है। लेकिन यही चुंबकीय क्षेत्र अब कमजोर हो रहा है। रिपोर्ट की मानें तो, पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र, पिछली दो शताब्दियों में अपनी 10% तीव्रता खो चुका है। बता दें कि पृथ्‍वी पर जीवन के लिए चुंबकीय क्षेत्र बहुत जरूरी है. चुंबकीय क्षेत्र पृथ्‍वी को सूर्य से होने वाले रेडिएशन और अंतरिक्ष से निकलने वाले आवेशित कणों से बचाता है।

अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बीच एक बड़ा इलाका जिसे दक्षिण अटलांटिक विसंगति कहा जाता है, वहां इसमें तेजी से कमी देखी गई है। इस क्षेत्र में पिछले 50 वर्षों में एक बड़े हिस्से में काफी तेजी से कमी देखी गई है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के वैज्ञानिक स्वार्म डेटा, इनोवेशन एंड साइंस क्लस्टर से विसंगति का अध्ययन करने के लिए ईएसए के स्वार्म सैटैलाइट के डेटा का उपयोग कर रहे हैं। ये स्वार्म सैटैलाइट पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को बनाने वाले विभिन्न चुंबकीय संकेतों को पहचान और माप सकते हैं।

पिछले पांच वर्षों में, अफ्रीका के दक्षिण-पश्चिम की ओर कम तीव्रता का एक दूसरा केंद्र विकसित हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि इसका मतलब यह हो सकता है कि विसंगति दो अलग-अलग कोशिकाओं में विभाजित हो सकती है। चुंबकीय क्षेत्र के कमजोर पड़ने से उपग्रहों और अंतरिक्ष यान भी परेशानी झेल रहे हैं। इन्हें भी ग्रह की परिक्रमा करने में तकनीकी दिक्कतें आ रही हैं।

दक्षिण अटलांटिक विसंगति पिछले एक दशक से दिखाई दे रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बड़ी तेजी के साथ विकसित हुई है। जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंसेज से डॉ. जुर्गन मत्ज़का ने कहा कि हम बहुत भाग्यशाली हैं कि दक्षिण अटलांटिक विसंगति के विकास की जांच के लिए ऑर्बिट में स्वार्म सैटैलाइट हैं। इन परिवर्तनों के साथ पृथ्वी के कोर में होने वाली प्रक्रियाओं को समझना ही सबसे बड़ी चुनौती है।

इसके पीछे जिस कारण का अनुमान सबसे ज्यादा लगाया जा रहा है वो ये है कि हो सकता है कि पृथ्वी के ध्रुव के पलटने का समय नजदीक आ रहा है। ध्रुव उत्क्रमण तब होता है जब उत्तर और दक्षिण चुंबकीय ध्रुव हट जाते हैं। हालांकि यह फ्लिप तुरंत या अचानक नहीं होते, इन्हें होने में सदियों का समय लगता है,  इस दैरान ग्रह के चारों ओर कई उत्तर और दक्षिण चुंबकीय ध्रुव होंगे।

ऐसा पहली बार नहीं है कि पृथ्वी पर ध्रुवीय उत्क्रमण होने वाला हो। वैज्ञानिकों के अनुसार यह घटना हमारे ग्रह के इतिहास में  पहले भी हुई है। ये बदलाव हर 2,50,000 साल में होता है। हालांकि इन बदलावों से आम जनता बहुत हद तक प्रभावित नहीं होगी, लेकिन इससे विभिन्न सैटेलइट और अंतरिक्ष यानों के लिए तकनीकी परेशानियां जरूर पैदा हो रही हैं। क्योंकि चुंबकीय क्षेत्र कमजोर हो रहा है और ब्रह्माण्ड से आवेशित कण ओजोन परत को भेदकर पृथ्वी पर आ जाएंगे और ये वो ऊंचाई है जहां सैटेलाइट परिक्रमा करते रहते हैं।