बिहार चुनाव : पप्पू , चिराग गड़बड़ा न दे सत्ता की गणित

यशोदा श्रीवास्तव


बिहार का विधानसभा चुनाव इस बार पिछले कई चुनावों से हटकर है। पिछले चुनावों में किसी एक के नेतृत्व में कई पार्टियां एक साथ लड़कर अपने सबल प्रतिद्वंद्वी को पटखनी देकर सरकार बना लेती थी। 2015 के चुनाव पर नजर डालें तो कांग्रेस, राजद तथा जदयू एक साथ मिलकर चुनाव लड़े तो न केवल सरकार बना लिए, 2010 के चुनाव में 243 सीटों पर चुनाव लड़कर मात्र चार सीट पाने वाली कांग्रेस 2015 में 40 सीटों पर लड़कर 27 सीट जीतने में कामयाब हुई थी। राजद 80 सीटें जीती थी और जदयू 70 के करीब रह गई थी। बीजेपी से जदयू के अलग होने का असर यह था कि 2010 में 90 सीटें जीतने वाली भाजपा 2015 में 54 सीटों पर रह गई।हालांकि उसका वोट प्रतिशत सबसे अधिक 24 प्रतिशत था।

इस बार बिहार के गड्डमड्ड चुनावी समीकरण को देख एक से एक राजनीतिक समीक्षक असमंजस में हैं।  हिम्मत जुटा कर कुछ जानकार कह पाते हैं कि 2015 के चुनाव में बीजेपी से नाराज मतदाता राजद गठबंधन को वोट कर दिये थे इसलिए उसकी लाटरी खुल गई थी।

हैरत है कि इस तर्क को प्रस्तुत करने वाले समीक्षक यह कह पाने का साहस नहीं जुटा पाते कि आखिर गठबंधन से अलग होकर बीजेपी के साथ सरकार बना लेने वाले नीतीश ने ऐसा क्या कर दिया बिहार के लिए कि इस चुनाव में उनके वोटर लहालोट हैं। और क्या कांग्रेस राजद से अलग हुए जदयू को बीजेपी के साथ लड़ने पर गैर बीजेपी वोट हासिल हो पाएंगे? ऐसे कई सवाल है इस चुनाव में जिसे लेकर बहस मुबाहिसा का दौर जारी है।

लोजपा के अलग लड़ने से जहां नीतीश बाबू असमंजस में हैं वहीं पप्पू यादव, चंद्र शेखर आजाद सहित कुछ और दलों के गठबंधन के मैदान में उतर आने से महागठबंधन भी चैन से नहीं है। पप्पू यादव के गठबंधन ने तो उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा तक घोषित कर दिया है। इसका मतलब यह कि गठबंधन सभी 243 सीटों पर दांव लगाएगा।

उधर बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे ओबैसी भी राजद गठबंधन को ही चुनौती देंगे। यशवंत सिन्हा, उपेंद्र कुशवाहा का गठबंधन भी मैदान में है।शरद यादव की जदयू में वापसी की आश जब धरी रह गई तो उनकी बेटी ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया,वे मधेपुरा से चुनाव भी लड़ रही हैं।इस तरह और भी तमाम नामचीन नेता अपनी शाख बचाने के लिए गठबंधन बनाकर मैदान में उतर आए हैं।

लेकिन देखा जाय तो अन्य गठबंधनों के मुकाबले पूर्व सांसद पप्पू यादव का गठबंधन और चिराग पासवान की लोजपा ही कुछ कर गुजरने की स्थिति में है। महागठबंधन और जदयू गठबंधन को यही डर है कि ये ज्यादा कुछ करने में कामयाब हुए तो सत्ता का गणित गड़बड़ा सकता है।

हालांकि यह भी तय है कि जदयू और बीजेपी सरकार बनने में कुछ कसर रहा तो लोजपा के चिराग की रोशनी उसी ओर होगी।ऐसी ही स्थिति पप्पू यादव के गठबंधन की होगी जो राजद कांग्रेस की सरकार बनने में सहायक होगी। चिटफुट सीटें हासिल कर लेने वाले बाकी गठबंधन की भूमिका संभावित किसी भी सरकार में मोलभाव करने वाली होगी।

राम विलास पासवान के बिना अकेले चुनाव लड़ रही लोजपा के लिए बड़ी चुनौती है। वह भी ” बीजेपी से बैर नहीं नीतीश तेरी खैर नहीं ” जैसे चुनौतीपूर्ण स्लोगन के साथ। पासवान के निधन पर पटना और हाजीपुर में उनके समर्थक खूब रोए। ये आंसू उनके अपने समाज के थे।

इन आंसूओ का असर चुनाव में कितना पड़ेगा,देखना होगा। बिहार की जातीय समीकरण पर आधारित राजनीति के जानकार कहते हैं कि मौजूदा विधानसभा में लोजपा के दो सदस्य हैं वह भी तब जब वह बीजेपी के साथ मिलकर लड़ी थी। अब रामविलास पासवान के निधन से उपजी सहानुभूति से कम से कम 10 सीटों का फायदा हो सकता है।

जदयू और लोजपा दोनों एनडीए का हिस्सा हैं लेकिन  बिहार में लोजपा अलग राह चलकर नीतीश को ललकार रही है जबकि जदयू और बीजेपी साथ चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि बीजेपी लोजपा से किसी तरह के संबंध को खत्म बता रही है लेकिन एनडीए से अलग करने की घोषणा नहीं की है।

वहीं चिराग पासवान स्वयं को मोदी का हनुमान बताकर ताल ठोक रहे हैं।साथ ही यह भी कहा है की प्रधानमंत्री जदयू को संतुष्ट करने के लिए उनके खिलाफ जो चाहें बोलें, उन्हें आपत्ति नहीं। जदयू ने अपने खाते से कुछ सीटें जीतनराम मांझी को भी दी है। लोजपा जदयू की सीटों के अलावा बीजेपी की कुछ सीटों पर भी फ्रेंडली फाइट की तर्ज पर चुनाव लड़ रही है। अब लोजपा कितनी सीटे जीतेगी और लोजपा के लड़ने से जदयू हारेगी कितने पर राजनीतिक समीक्षकों का इस बिंदु पर उधेडबुन जारी है।

लोजपा के जदयू से अलग लेकिन बीजेपी के साथ लड़ने के गेम को नीतीश बाबू  बखूबी समझ रहे हैं। उन्हें यह भी पता है कि इसके पीछे कौन है? चिराग पासवान के पिता स्व. रामविलास पासवान के बीच मतभेद किसी से छुपा नहीं है।नीतीश रामविलास पासवान का फोन तक नहीं उठाते थे,लेकिन यह अनायास नहीं था।बताने की जरूरत नहीं जब 2005 में 37 सीटें जीतकर पासवान ने नीतीश को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया था।

कुछ महीने मध्यावधि चुनाव कराना पड़ा था जिसमें पासवान की पार्टी बुरी तरह हारी थी। नीतीश और अपने पिता स्व.रामविलास पासवान के बीच इस मतभेद को चिराग पासवान भुला नहीं पाये। लेकिन बीजेपी की नियत साफ होती तो रामविलास के बाद नीतीश और चिराग के बीच इस सनातनी मतभेद को दूर करने के लिए नीतीश और चिराग के बीच सुलह समझौते की कोशिश जरूर करती। बीजेपी का ऐसा न करना अचंभित करने वाला है। शायद बीजेपी को डर है कि शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल की तरह लोजपा न उससे छिटक जाय?

इस चुनाव को सनसनीखेज बनाने की बीजेपी की रणनीति धरी रह गई। सुशांत प्रकरण का मामला साफ हो जाने के बाद बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय की सुशांत को न्याय दिलाने की उनकी देवदूत की छवि भी धूलधुसरित हुई। वीआरएस लेकर वे बाकायदे नीतीश बाबू का दामन थामे थे।

अब नितीश बाबू ने उन्हें एक टिकट के लायक भी नहीं समझा।वे अपने जन्मस्थली बक्सर से भाग्य आजमाना चाहते थे जहां एक अवकाश प्राप्त सिपाही बीजेपी का उम्मीदवार है। महाराष्ट्र से देवेंद्र फणनवीस को बिहार का प्रभारी बनाकर भेजा गया ताकि वे सुशांत अर्थात बिहार के लाल की लड़ाई लड़ने वाली महाराष्ट्र बीजेपी की वीरगाथा सुनाकर युवाओं का दिल जीत सकें। सुशांत प्रकरण से पर्दा हटने के बाद बीजेपी जानती है कि बिहार के लिए फणनवीस अब बेमतलब हैं लेकिन वापस बुलाकर विरोधियों को एक मुद्दा देने से बचने के लिए पार्टी का कहना है की फणनवीस को बिहार का प्रभारी बनाकर उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में लांच करने की शुरुआत है।

बीजेपी ने नीतीश बाबू को फिर मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया है तो कांग्रेस और राजद गठबंधन का चेहरा तेजस्वी यादव हैं। तेजस्वी के अपने ही एक कार्यकर्ता की कथित हत्या के मामले में नामजद होने से सवालों से घिरे हैं। हत्या के इस मामले में तेजस्वी के भाई तेज प्रताप भी आरोपी हैं। राजद समर्थकों में यह धारणा है कि हार के डर से विपक्ष के  चुनाव प्रचार को कमजोर करने की सत्ता पक्ष की साजिश है।कांग्रेस इस बार 70 सीटों पर लड़ रही है।

अधिक सीटें लेकर अधिक सीटें जीतने की उसकी पूरी कोशिश है। दस सीटों पर लड़ रही कम्युनिस्ट भी कुछ कर पाएगी यह भी देखना दिलचस्प होगा। युवा कामरेड कन्हैया कुमार की लोकसभा चुनाव के बाद यह दूसरी परीक्षा है। कांग्रेस का एक ऐलान बिहार की शिक्षित महिलाओं को आर्कषित कर रहा है कि बलात्कार के आरोपी को टिकट नहीं देंगे? गौरतलब है कि पहले चरण में हो रहे 71 सीटों के मतदान में कुल 1066 उम्मीदवार हैं जिनमें 391 आपराधिक छवि के हैं।इस 71 सीटों पर सबसे अधिक 29 दागी उम्मीदवार राजद के हैं।

सभी पार्टियों ने टिकट बंटवारे में जातीय अंकगणित का भी खासा ध्यान रखा है।एक एक सीट पर तगड़ा होमवर्क हुआ है। मुस्लिम पार्टियां यदि राजद कांग्रेस उम्मीदवार के क्षेत्र में प्रत्याशी उतारते भी हैं तो उन्हें कोई लाभ मिलता नहीं दिख रहा जैसाकि मुस्लिम मतदाताओं का संकेत है। राजद की पूरी कोशिश है की निवर्तमान विधानसभा की 80 सीटों के सापेक्ष अधिक सीटें जीते।

भाजपा ने राम मंदिर, कश्मीर और पाकिस्तान चीन के नाम पर मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश शुरू कर दी है वहीं विपक्ष किसान विल,कोरोना की नाकामी, गिरती अर्थव्यवस्था, यूपी के हाथरस कांड आदि को मुद्दा बनाएगा। देखा यह गया है कि बिहार के चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे पर स्थानीय मुद्दा भारी रहा है। लोगों की नजर इसपर भी है कि नीतीश बाबू का शराबबंदी जदयू बीजेपी के लिए कितना लाभकारी सिद्ध होता है या यह दांव उल्टा पड़ रहा है। अभी तक विपक्ष ने सत्ता में आने पर शराब बंदी खत्म करने का ऐलान नहीं किया है फिर भी बिहार के शराबियों को सत्ता में आने पर विपक्षी दलों पर पूरा भरोसा है।