EXCLUSIVE ANALYSIS: क्या अबकी बंगाल बोलेगा ‘जय श्रीराम’ या फिर  ‘खेला होबे’

अजय कुमार

बंगाल की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है और इस बार इसकी जड़ में है भगवान राम का नाम, जिसकी आस्था को भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सबसे बड़ी चुनावी रणनीति के रूप में चुन लिया है। 2026 के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच सियासी तनाव गहराता जा रहा है। बीजेपी इस बार किसी भ्रम में नहीं है। पार्टी को पता है कि पश्चिम बंगाल में उसने पिछले विधानसभा चुनाव में 77 सीटें जीतकर अपनी सबसे बड़ी सफलता दर्ज की थी और अब वह उस आधार को और मजबूत करना चाहती है। 2016 के चुनाव में जहां बीजेपी को केवल 10.2% वोट मिले थे, वहीं 2021 में यह आंकड़ा बढ़कर 38.1% तक पहुंच गया था। यह उछाल केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक बदलते सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श का संकेत है, जिसे बीजेपी और आरएसएस बखूबी भुनाना चाह रहे हैं। इसीलिए अब पार्टी ने हिंदुत्व को चुनावी हथियार के रूप में और भी धारदार बना दिया है।

पश्चिम बंगाल में रामनवमी का पर्व अब केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह गया, बल्कि यह राज्य की राजनीति की दिशा और दशा तय करने वाला एक अहम मौका बन गया है। रामनवमी के दिन जिस तरह बीजेपी और उससे जुड़े संगठनों ने राज्य भर में तकरीबन 2000 शोभा यात्राएं निकालीं, उसने यह साफ कर दिया कि पार्टी 2026 के चुनाव में किस एजेंडे के साथ मैदान में उतरेगी। इन यात्राओं में हजारों की संख्या में लोगों ने भाग लिया, हाथों में भगवा झंडे, तलवारें, जय श्रीराम के नारे और भगवा वस्त्रों में लिपटे कार्यकर्ताओं की भीड़ ने यह संदेश दे दिया कि यह आस्था की नहीं, सियासत की भी यात्रा है।

बीजेपी नेता अग्निमित्रा पॉल और शुभेंदु अधिकारी जैसे वरिष्ठ नेता इन आयोजनों का चेहरा बने, जिन्होंने मंच से सीधे-सीधे ममता बनर्जी पर निशाना साधा। अग्निमित्रा पॉल ने यहां तक कहा कि राम शोभा यात्रा के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है, केवल पुलिस को सूचित करना होता है। वहीं शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम में राम मंदिर की आधारशिला रखकर ममता बनर्जी को सीधे उनके गढ़ में चुनौती दी। नंदीग्राम वही इलाका है जहां 2007 में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए आंदोलन ने ममता को सत्ता की ओर पहला बड़ा मौका दिया था और अब वही स्थान बीजेपी की रणनीति का आधार बन गया है।

रामनवमी की इन शोभा यात्राओं के पीछे केवल धार्मिक उत्साह नहीं था। यह सांस्कृतिक दावे और राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की एक योजनाबद्ध कोशिश थी। बंगाल के विभिन्न जिलों में जो यात्राएं निकाली गईं, उसमें भगवा रंग की स्पष्टता, जय श्रीराम के नारों की गूंज और हिंदू धर्म के प्रतीकों की भरमार ने यह स्पष्ट कर दिया कि बीजेपी अब बंगाल को भी उसी तरह हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाना चाहती है, जैसा वह उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में कर चुकी है। पार्टी यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि बंगाल की धरती भी राम की है, यहां भी उनके भक्तों की संख्या कम नहीं है और वे अब राजनीतिक बदलाव की तैयारी में हैं।

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बीजेपी की इस रणनीति के जवाब में ममता बनर्जी ने भी चुप्पी साधे रखने का रास्ता नहीं चुना। मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि बंगाल की संस्कृति को बाहरी तत्वों से खतरा है। उन्होंने दोहराया कि बंगाल, गुजरात या यूपी नहीं है। यहां की संस्कृति, भाषा, खानपान और जीवनशैली अलग है और उसे किसी बाहर से आई विचारधारा से बदलने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। ममता बनर्जी ने 2021 के चुनाव में भी इसी ‘बाहरी बनाम बंगाली’ नैरेटिव के सहारे बीजेपी को घेरने में कामयाबी पाई थी और अब वह उसी पथ को फिर से अपनाने जा रही हैं। बंगाली अस्मिता की बात कर ममता फिर से राज्य की जनता को यह संदेश देना चाहती हैं कि बीजेपी की हिंदुत्ववादी राजनीति इस राज्य की मिट्टी से मेल नहीं खाती।

बीजेपी की रणनीति के तहत अब बंगाल के उन स्थानों को भी धार्मिक नक्शे में प्रमुखता से रखा जा रहा है, जिनका रामायण काल से कोई न कोई संबंध माना जाता है। बर्दवान का सुश्रवणगढ़, बांकुड़ा का गंधेश्वरी मंदिर और बीरभूम का गिरिधारीपुर जैसे स्थानों को राम या हनुमान से जोड़ते हुए एक नया धार्मिक विमर्श रचा जा रहा है। यह कोशिश बंगाल की मिट्टी को राममय करने की है, जिससे जनता को यह विश्वास दिलाया जा सके कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान और भगवान राम में कोई विरोध नहीं है। बीजेपी के लिए यह सांस्कृतिक पुनःस्थापना का अवसर है और वह इसमें कोई चूक नहीं करना चाहती।

तृणमूल कांग्रेस इस बार न सिर्फ अस्मिता की बात करेगी बल्कि ममता की प्रशासनिक ताकत को भी सामने रखेगी। रामनवमी के दौरान किसी भी बड़े हिंसक घटना का न होना, पुलिस की मौजूदगी और शांति बनाए रखना, यह सब ममता सरकार की ओर से एक संदेश है कि वह हर हाल में कानून व्यवस्था बनाए रख सकती हैं। कोलकाता पुलिस कमिश्नर ने खुद कहा कि पिछले दो महीने से शोभा यात्राओं को लेकर पुलिस बल की तैयारी की जा रही थी और इसी वजह से किसी तरह की बड़ी अप्रिय घटना नहीं हुई। ममता इसे अपनी सफलता के रूप में प्रचारित करेंगी और इसे बीजेपी की अराजकता के खिलाफ एक मजबूत प्रशासनिक प्रतिवाद के रूप में दिखाएंगी।

लेकिन यह लड़ाई केवल धार्मिक प्रतीकों तक सीमित नहीं रहेगी। टीएमसी के रणनीतिकार जानते हैं कि बीजेपी की लोकप्रियता को केवल अस्मिता की राजनीति से रोका नहीं जा सकता, इसके लिए ज़मीनी मुद्दों पर भी काम करना होगा। इसलिए ममता बनर्जी का जोर विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर भी रहेगा। महिला मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ पहले से ही मजबूत है और वह इसे और भी मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं। साथ ही ममता यह भी चाहेंगी कि मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय उनके साथ एकजुट रहें, जैसा उन्होंने 2021 में किया था।

 

भारतीय जनता पार्टी मुखर होकर हिन्दुत्व की राजनीति कर रही है। उसके सामने यह मजबूरी नहीं है कि हिन्दू वोटरों को खुश करने के चक्कर में उनके हाथों से मुस्लिम वोटर निकल सकते हैं। क्योंकि बीजेपी को मुस्लिमों का साथ कभी मिलता ही नहीं है।

वहीं ममता बनर्जी एक तरफ मुस्लिम वोटों को कांग्रेस या वामपंथी दलों पाले में जाने से बचाने में लगी हैं। हिन्दुओं को भी नाराज नहीं करना चाहती हैं। यही दुविधा ममता बनर्जी पर भारी पड़ रही है। राहुल गांधी आजकल पश्चिम बंगाल पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। उनका ज्यादा फोकस मुस्लिम वोटरों पर है, इसको लेकर भी ममता बेचैन हैं। कांग्रेस यदि बंगाल में ठीकठाक लड़ती है तो इससे ममता बनर्जी की पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है?वहीं बीजेपी मुस्लिम वोटों के बंटने पर फायदे में रहेगी बीजेपी का सियासी हमला हालांकि तीव्र है, लेकिन ममता की सरकार भी जवाब देने में उतनी ही तेज नजर आ रही है। राज्य में प्रशासनिक मजबूती, सांस्कृतिक गर्व और विकास के मिश्रण से वह यह संदेश देना चाहती हैं कि बंगाल की राजनीति का चेहरा बीजेपी नहीं, बल्कि तृणमूल ही है। वहीं दूसरी ओर बीजेपी हर धार्मिक पर्व, हर सांस्कृतिक अवसर को एक चुनावी मंच की तरह इस्तेमाल कर रही है। रामनवमी इसके लिए पहला पड़ाव था, आने वाले महीनों में दुर्गा पूजा, दीवाली, और अन्य त्योहारों को भी राजनीतिक रंग दिए जाने की पूरी संभावना है।

साल 2026 का चुनाव अब केवल एक राजनीतिक मुकाबला नहीं रह गया, यह विचारधाराओं की जंग बन चुका है। एक ओर है राम के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश, दूसरी ओर है बंगाली अस्मिता की रक्षा की हुंकार। यह संघर्ष अब चुनावी मैदान तक सिमटा नहीं रहेगा, बल्कि हर गली, हर चौक, हर मंदिर, हर कॉलेज और हर पंचायत में महसूस किया जाएगा। जनता को अब तय करना है कि वे किस रास्ते पर जाना चाहते हैं राम के नाम पर भगवा राजनीति या ममता की नीली-हरी अस्मिता। यह फैसला केवल बंगाल की दिशा नहीं तय करेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करेगा।

राजनीति के इस रामायण में हर दल अपने-अपने पात्रों को सजाने में जुटा है, लेकिन अंत में जनता ही है जो राम की भूमिका निभाएगी और सत्ता की संजीवनी किसे देनी है, यह फैसला करेगी। इतिहास गवाह है कि बंगाल कभी किसी के लिए आसान नहीं रहा और इस बार की जंग तो और भी पेचीदा और दिलचस्प होने जा रही है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, यह संघर्ष और भी उग्र होगा और शायद इस बार राजनीति का असली चेहरा बंगाल से ही सामने आएगा।

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