स्थापना दिवस पर विशेष: नीम करौली बाबा और कैंची धाम

भक्तों की मनोकामना यहां आने से होती है पूर्ण

पूरी दुनिया में बजता है करौली धाम का डंका

स्थापना दिवस
(1900 -11 सितंबर 1973)

श्री हनुमंत अंशावतार महाराज जी की गणना बीसवीं शताब्दी के सबसे महान संतों में होती है। भक्तों और आस्थावान साधकों के लिए वह साक्षात श्री हनुमान जी ही हैं। इनका जन्म स्थान ग्राम अकबरपुर जिला फ़िरोज़ाबाद उत्तर प्रदेश है जो कि हिरनगाँव से एक किलोमीटर मीटर दूरी पर है। महाराज जी का सबसे विख्यात आश्रम कैंची, नैनीताल, भुवाली से 7 कि॰मी॰ की दूरी पर भुवालीगाड के बायीं ओर स्थित है। कैंची मन्दिर में प्रतिवर्ष 15 जून को वार्षिक समारोह मानाया जाता है। उस दिन यहाँ बाबा के भक्तों की विशाल भीड़ लगी रहती है। महाराजजी इस युग के भारतीय दिव्यपुरुषों में से हैं। श्री नीम करोली बाबा को हम महाराज जी कहते है। महाराज जी का संन्यास पूर्व का नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा है। आइए, जानते हैं महाराज जी की जीवन लीला के बारे में।

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आरंभिक जीवन
उनका जन्म एक धनी ब्राह्मण परिवार में हुआ, 11 वर्ष की उम्र में उनके माता-पिता द्वारा शादी कर दिए जाने के बाद, उन्होंने साधु बनने के लिए घर छोड़ दिया। बाद में वह अपने पिता के अनुरोध पर, वैवाहिक जीवन जीने के लिए घर लौट आए। वह दो बेटों और एक बेटी के पिता बने। ऐसा माना जाता है कि जब तक महाराजजी 17 वर्ष के थे उनको इतनी छोटी सी आयु मे सारा ज्ञान था । बताते है , भगवान श्री हनुमान जी उनके गुरु है। उन्होंने भारत में कई स्थानों का दौरा किया और विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से जाने जाते थे। गंजम में मां तारा तारिणी शक्ति पीठ की यात्रा के दौरान स्थानीय लोग उन्हें हनुमानजी, चमत्कारी बाबा के नाम से संबोधित किया करते थे।

नीम करोली
प्रसंग है कि एक बार बाबा ट्रेन में सफर कर रहे थे लेकिन उनके पास टिकट नहीं था जिस कारण टीटी अफसर ने उन्हें पकड़ लिया। बिना टिकट होने के कारण अफसर ने उन्हें अगले स्टेशन में उतरने को कहा।स्टेशन का नाम नीम करोली था। स्टेशन के पास के गांव को नीम करोली के नाम से जाना जाता है। बाबा को गाड़ी से उतार दिया गया और ऑफिसर ने ड्राइवर से गाड़ी चलाने का आदेश दिया। बाबा वहां से कहीं नहीं गए। उन्होंने ट्रेन के पास ही एक चिमटा धरती पर लगाकर बैठ गए। चालक ने बहुत प्रयास किया लेकिन ट्रेन आगे ना चली। ट्रेन आगे ना चलने का नाम ही नहीं ले रही थी। तभी गाड़ी में बैठे सभी लोगों ने कहा यह बाबा का प्रकोप है।उन्हें गाड़ी से उतार देने का कारण ही है कि गाड़ी नहीं चल रही है। तभी वहां बड़े ऑफिसर जो कि बाबा से परिचित थे। उन्होंने बाबा से क्षमा मांगी और ड्राइवर और टिकट चेकर दोनों को बाबा से माफी मांगने को कहा। सब ने मिलकर बाबा को मनाया और उनसे माफी मांगी। माफी मांगने के बाद बाबा ने सम्मानपूर्वक ट्रेन पर बैठ गए लेकिन उन्होंने यह शर्त रखी कि इस जगह पर स्टेशन बनाया जाएगा जिससे वहां के गांव के लोग को ट्रेन में आने के लिए आसानी हो जाए क्योंकि वहां लोग आने के लिए मिलो दूर से चलकर आते थे, तब जाकर ट्रेन में बैठ पाते थे।उन्होंने बाबा से वादा किया और वहां पर नीम करोली नाम का स्टेशन बन गया। यहीं से बाबा की चमत्कारी कहानियां प्रसिद्ध हो गई और इस स्थान से पूरी दुनिया में बाबा का नाम नीम करोली बाबा के नाम से जाना जाने लगा।यही से बाबा को नीम करोली नाम मिला था।

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कैंची आगमन
महाराज जी का कैंची आकर आश्रम स्थापित करने की कहानी भी चमत्कारिक ही है। घटना 1962 की है।
1962 में कुछ समय पहले महाराज जी ने कैंची गांव के श्री पूर्णानंद को बुलाया, जबकि वे खुद कैंची के पास सड़क के किनारे दीवार पर बैठकर उनका इंतजार कर रहे थे। जब वे आए, तो उन्होंने 20 साल पहले 1942 में हुई अपनी पहली मुलाकात की यादें ताज़ा कीं। इसी मुलाकात में अनेक संत सिद्ध मनीषियों की चर्चा हुई और आश्रम की स्थापना पर कार्य शुरू हो गया। वन विभाग से आश्रम के लिए भूमि लेने की व्यवस्था की गई। श्री हनुमान जी और अन्य देवी देवताओं के विग्रह स्थापित किए गए जिसकी कहानी बहुत लंबी है। इन विग्रहों की स्थापना अलग अलग वर्षों में की गई लेकिन तिथि 15 जून ही रही। इसीलिए 15 जून को ही इस आश्रम की स्थापना को तिथि को वार्षिकोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

मंदिर का निर्माण
देह से सूक्ष्म अवतार की यात्रा शुरू हो गई। 10 सितम्बर 1973 की रात्रि में बाबाजी ने अपना भौतिक शरीर त्याग दिया। उनकी अस्थियों से युक्त कलश श्री कैंची धाम में स्थापित कर दिया गया था। तत्पश्चात, बिना किसी योजना व डिजाइन के बाबा के मंदिर का निर्माण कार्य 1974 में शुरू हुआ। उनके सभी भक्तों ने इसमें स्वेच्छा से सहयोग किया। निर्माण कार्य में लगे कारीगरों और राजमिस्त्रियों ने सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए तथा “महाराज जी की जय” का नारा लगाते हुए काम शुरू कर दिया। जब निर्माण कार्य चल रहा था, तब भक्तों ने हनुमान चालीसा का पाठ भी किया तथा श्री राम-जय राम-जय जय राम गाकर कीर्तन भी किया, माताओं ने भी ईंटों पर “रामनाम” लिखकर उन्हें श्रमिकों को दिया। “बाबा नीम करौली महाराज की जय” के नारों से पूरा वातावरण गुंजायमान हो गया। माताओं की बाबा जी के प्रति उत्कट भक्ति से प्रभावित होकर श्रमिकों में भी वही भक्ति, विश्वास, श्रद्धा और प्रेम की भावना उत्पन्न हुई। यह बाबा जी की ही लीला थी कि उन्होंने इन श्रमिकों में विश्वकर्मा (देवताओं के शिल्पी) के गुण भर दिए और वे निर्माण कार्य में लगे रहे।

15 जून 1976
दैव योग बन गया।15 जून 1976 आया, महाराज जी की मूर्ति की स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा का दिन। महाराज जी ने स्वयं कैंचीधाम की प्राण प्रतिष्ठा के लिए 15 जून का दिन तय किया था। स्थापना एवं प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से पूर्व भागवत सप्ताह एवं यज्ञ आदि सम्पन्न हुए। भक्तों ने घण्टा, घड़ियाल, ढोल, शंख आदि की ध्वनि के साथ मंदिर पर कलश स्थापित कर ध्वजारोहण किया। तालियों की ध्वनि से आकाश गूंज उठा। कीर्तन एवं बाबाजी की जय के नारे गूंजने लगे। वातावरण में उल्लास छा गया तथा सभी को बाबाजी महाराज की प्रत्यक्ष उपस्थिति का आभास होने लगा। तत्पश्चात वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ तथा निर्धारित विधि से प्राण-प्रतिष्ठा एवं पूजन के साथ महाराजजी की मूर्ति स्थापित की गई। इस प्रकार मूर्ति रूप में बाबाजी महाराज श्री कैंची धाम में विराजमान हैं।
महाराज जी के आश्रम

नीम करोली बाबा के आश्रम भारत में कैंची, भूमियाधार, काकरीघाट, कुमाऊं की पहाड़ियों में हनुमानगढ़ी, वृन्दावन, ऋषिकेश, लखनऊ, शिमला, फर्रुखाबाद में खिमासेपुर के पास नीम करोली गांव और दिल्ली में हैं। उनका आश्रम ताओस, न्यू मैक्सिको, संयुक्त राज्य अमेरिका में भी स्थित है।

उल्लेखनीय शिष्य
नीम करोली बाबा के उल्लेखनीय शिष्यों में आध्यात्मिक शिक्षक राम दास (बी हियर नाउ के लेखक), गायक और आध्यात्मिक शिक्षक भगवान दास, लेखक और ध्यान शिक्षक लामा सूर्य दास और संगीतकार जय उत्तल और कृष्ण दास शामिल हैं। अन्य उल्लेखनीय भक्तों में मानवतावादी लैरी ब्रिलियंट और उनकी पत्नी गिरिजा, दादा मुखर्जी (इलाहाबाद विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश, भारत के पूर्व प्रोफेसर), विद्वान और लेखक यवेटे रोसेर, अमेरिकी आध्यात्मिक शिक्षक मा जया सती भगवती, फिल्म निर्माता जॉन बुश और डैनियल गोलेमैन लेखक शामिल हैं।ध्यान संबंधी अनुभव और भावनात्मक बुद्धिमत्ता की विविधताएँ। बाबा हरि दास (हरिदास) कोई शिष्य नहीं थे, लेकिन उन्होंने 1971 की शुरुआत में कैलिफोर्निया में आध्यात्मिक शिक्षक बनने के लिए अमेरिका जाने से पहले (1954 से 1968 ) कई इमारतों की देखरेख की और नैनीताल क्षेत्र में आश्रमों का रखरखाव किया।

विदेशों में ख्याति
स्टीव जॉब्स ने अपने मित्र डैन कोट्टके के साथ संतान धर्म और भारतीय आध्यात्मिकता का अध्ययन करने के लिए अप्रैल 1974 में भारत की यात्रा की; उन्होंने नीम करोली बाबा से मिलने की भी योजना बनाई, लेकिन वहां पहुंचे तो पता चला कि गुरु की देह पिछले सितंबर में ही छूट गई थी। हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया राबर्ट्स भी नीम करोली बाबा से प्रभावित थीं। उनकी एक तस्वीर ने रॉबर्ट्स को हिंदू धर्म की ओर आकर्षित किया। स्टीव जॉब्स से प्रभावित होकर मार्क जुकरबर्ग ने कैंची में नीम करोली बाबा के आश्रम की यात्रा कर ध्यान किया। लैरी ब्रिलियंट गूगल के लैरी पेज और ईबेय eBay के सह-संस्थापक जेफरी स्कोल को भी साथ लेकर गए। महाराज जी के शिष्यों और उनमें आस्था रखने वालों की संख्या वैश्विक है जिसे न तो लिखा जा सकता है और न ही सभी के नाम उल्लिखित किए जा सकते हैं।

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