‘जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम’ पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

लखनऊ। आधारशिला काॅलेज ऑव प्रोफेशनल कोर्सेस द्वारा प्रख्यात आलोचक करुणाशंकर उपाध्‍याय के सद्य: प्रकाशित ग्रंथ जयशंकर प्रसाद महानता के आयाम पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए वरिष्ठ आई.ए.एस.अधिकारी एवं कवि राकेश मिश्र ने कहा कि प्रोफेसर करुणाशंकर उपाध्याय कृत जयशंकर प्रसाद महानता के आयाम ग्रंथ प्रसाद साहित्य का विश्वकोश है। यह अत्यंत श्रमसाध्य और गंभीर कार्य है। इसमें आलोचक ने संपूर्ण प्रसाद साहित्य का वैश्विक प्रतिमानों का निर्माण करते हुए एक नया मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। कोई भी महान साहित्य अपनी संस्कृति और ज्ञान- परंपरा से कटकर नहीं लिखा जा सकता है। प्रोफेसर उपाध्याय ने भारतीय काव्यशास्त्रीय चिंतन को प्रासंगिक बनाने के लिए प्रसाद साहित्य के विश्लेषण का निकष बनाकर उनकी परंपरा का रेखांकन किया है। यह हिंदी आलोचना की अत्यंत महत्तर उपलब्धि है।कार्यक्रम के आरंभ में आधारशिला कॉलेज ऑव प्रोफेशनल कोर्सेज के प्रबन्ध निदेशक डॉ तहसीलदार सिंह द्वारा अतिथियों का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय संगोष्ठी की प्रस्तावना रखी गई। इन्होंने कहा कि प्रोफेसर उपाध्याय का यह ग्रंथ इतनी बड़ी साधना की फलश्रुति है कि मैं उस अवसर की प्रतीक्षा में था कि कब आप इस क्षेत्र में आएं और हम एक भव्य समारोह का आयोजन करें।यह आयोजन उसी प्रतीक्षा की सिद्धि है।

इस मौके पर अपना वक्तव्य देते डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’ ने कहा कि जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में नारी और प्रकृति का सौंदर्य वर्णन लावण्य, माधुर्य और सौंदर्य की दृष्टि से किया गया है। आज आंतरिक और बाह्य दोनों तरह के सौंदर्य को देखने समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि प्रो. उपाध्याय ने ग्रन्थ और पांडुलिपि के अंतर को स्पष्ट करते हुए उसके मिथक को दूर करने का प्रयास किया है।इस आलोचना ग्रंथ की सूक्तियां भी क्लासिक हैं अत: मैंने उसी को आधार बनाकर अपना आलेख लिखा है।यह ग्रंथ ज्ञानपीठ पुरस्कार और उससे भी बड़े सम्मान का अधिकारी है। इसी क्रम में अरुणाचल प्रदेश से आए डॉ शिवम चतुर्वेदी का मानना है कि प्रसाद ने अपनी समस्त कृतियों में कर्तव्यबोध कराया है। प्रो उपाध्याय इसी कर्तव्यबोध की याद दिलाते है। वे पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताओं को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में दिखाने का प्रयास करते हैं,उसकी प्रासंगिकता उभारते हैं।इस ग्रंथ में प्रसाद साहित्य में निहित सामान्य प्रेम की अपेक्षा राष्ट्रीय प्रेम के महत्व को ज्यादा देखा जा सकता है।

बी एन के बीपीजी कॉलेज, अकबरपुर के हिन्दी विभाग के प्रो. व अध्यक्ष डाॅ.सत्यप्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि वैचारिक खेमेबाजी के कारण साहित्य का बहुत अहित हुआ है। जयशंकर प्रसाद का ठीक मूल्यांकन आज तक नहीं हो पाया था। 31 वर्षों की मेहनत और साधना की देन है कि प्रो उपाध्याय ने इस ग्रन्थ को नई भाषा और शिल्प के साथ प्रस्तुत किया है। इसमें पहली बार उनके साथ पूरा न्याय हुआ है। इसमें प्रसाद को संपूर्ण विश्व का बीसवीं शताब्दी का सर्वश्रेष्ठ कवि घोषित किया गया है। इस प्रकार यहां एक नए युग का सूत्रपात हुआ है।मैं उन आलोचकों की इस स्थापना पर मुहर लगाता हूँ कि करुणाशंकर उपाध्याय वर्तमान शती के आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं और इस ग्रंथ द्वारा इसका प्रमाणीकरण हो गया है। इन्होंने इसमें आचार्य शुक्ल के आगे जाकर प्रतिमान एवं निकष बनाए हैं।

लेखक व वरिष्ठ आलोचक प्रो करुणाशंकर उपाध्याय ने अपने लेखकीय वक्तव्य में कहा कि इस ग्रंथ में हमने प्रसाद की तुलना विश्व के 15 सबसे बड़े कवियों के साथ की है। प्रसाद का काव्य ऋग्वेद की तरह दर्शन, विज्ञान, संगीत, छंद और अनंत रमणीय कवित्व का संश्लेषण है। जिस प्रकार ऋग्वेद में ये पंचतत्व अंतर्निहित हैं उसी प्रकार प्रसाद साहित्य में भी इनका गहन कलात्मक विन्यास हुआ है।इनके अनुसार जिसके पास अंतर्दृष्टि, विश्वसंदृष्टि, भारत- बोध तथा भारतीय ज्ञान परंपरा का सम्यक ज्ञान नहीं है और जिसके जीवन मे उदात्त बोध नहीं है वह प्रसाद को नहीं समझ सकता। भारतीयता का मौलिक अन्वेषण क्या हो सकता है यह प्रसाद की रचनाओं से समझा जा सकता है। भारत की सभ्यता सिंधु- सरस्वती सभ्यता है जिसे सर्वप्रथम जयशंकर प्रसाद ने रेखांकित किया।इन्होंने प्रसाद साहित्य में निहित विज्ञान और सभ्यता- विमर्श का विशेष रूप से उल्लेख किया।

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. हरिशंकर मिश्र ने कहा कि इस संगोष्ठी में सारे वक्ताओं ने विषय पर बोला। इससे यह सिद्ध हो गया है कि प्रसाद को समझने के लिए यह एक बेहतर ग्रन्थ है।इतना सर्वांगीण और गंभीर कार्य दूसरा नहीं है। दूसरे आलोचकों ने प्रसाद साहित्य के किसी एक पक्ष का ही विवेचन किया था। इन्होंने न केवल प्रसाद के संपूर्ण साहित्य का विश्लेषण इस ग्रंथ में किया है बल्कि जिस सूक्ष्म और अंतर्दृष्टि के साथ नूतन स्थापनाएँ दी हैं उसकी अनुगूंज लंबे समय तक रहेगी। यह हिंदी आलोचना के लिए एक महनीय उपलब्धि है।आपने आचार्य राजशेखर को उद्धृत करते हुए कहा कि जिस प्रकार एक पत्थर ( पारस) सोना बनाता है और दूसरा पत्थर उसकी शुद्धता एवं सत्यता की परख करता है उसी प्रकार यदि प्रसाद जी अपने साहित्य के रूप में हमारे समक्ष स्वर्ण- भंडार निर्मित करने वाले पारस पत्थर हैं तो उपाध्यायजी उस स्वर्ण- भंडार की सचाई प्रकट करने वाले आलोचक हैं।

इस अवसर पर विजयशंकर मिश्र’ भास्कर’ कृत भए प्रकट कृपाला, डाॅ. सुशीलकुमार पांडेय ‘ साहित्येंदु कृत अभिज्ञानशाकुंतलम् एवं कामायनी के तुलनात्मक संदर्भ और डाॅ. सत्यप्रकाश त्रिपाठी कृत हिंदी सूफी काव्य और शेख निसार कृत यूसुफ जुलेखा पुस्तकों का अतिथियों द्वारा लोकार्पण भी किया गया। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन डॉ .अनिल सूर्यधर ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन कॉलेज के प्राचार्य अविनाश चन्द्र मिश्रा द्वारा सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में अवध के साहित्यकारों, विद्वानों के साथ- साथ कॉलेज के प्राध्यापक और छात्र सैकड़ों की संख्या में उपस्थित थे। किसी आलोचना ग्रंथ पर यह अपने ढंग का अनूठाऔर सार्थक आयोजन था।

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