भारत-नेपाल संबंध: प्रचंड के लिए क्या भारतीय सेना में भर्ती प्रक्रिया साबित होगी ‘अग्निपथ’

उमेश तिवारी


काठमांडू/नेपाल। नेपाल में सत्ताधारी दल के एक नेता ने  बीबीसी नेपाली को बताया कि प्रधानमंत्री ने अभी तक संसद में विश्वास मत हासिल नहीं किया है और नए विदेश मंत्री की नियुक्ति की प्रक्रिया भी जारी है, इसलिए इस मामले को अंतिम रूप देने में कुछ समय लग सकता है। ‘अग्निपथ योजना’ भारतीय सेना के तीनों अंगों थलसेना, वायुसेना और नौसेना में क्रमश: जवान, एयरमैन और नाविक के पदों पर भर्ती के लिए भारतीय रक्षा मंत्रालय की ओर से शुरु की गई एक नई योजना है। भर्ती होने के बाद उन्हें ‘अग्निवीर’ के रूप में जाना जाएगा और उनका कार्यकाल चार साल का होगा। उसके बाद सेवाकाल में प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन होगा और 25 प्रतिशत लोगों को नियमित किया जाएगा। नेपाल में शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाली सरकार ने अगस्त में ‘अग्निपथ योजना’ के तहत गोरखाओं की भर्ती को निलंबित कर दिया था। भारतीय सेना की गोरखा ब्रिगेड के एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि अगर जनवरी के दूसरे सप्ताह तक कोई निर्णय नहीं लिया गया तो नेपाली युवा गोरखा दूसरी बार भर्ती से वंचित रह सकते हैं।

अग्निपथ पर कब होगा फैसला?

नई सरकार के गठन के लगभग एक सप्ताह बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि इसे लेकर नेपाल और भारत के बीच ‘असहमति’ कैसे सुलझेगी  सत्ताधारी गठबंधन के कुछ नेताओं का मानना ​​है कि नई सरकार पूरी तरह काम संभालने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा सकती है। नेपाल ने ‘अग्निपथ योजना’ के तहत गोरखाओं की भर्ती से असहमत होने के बाद अगस्त के अंत में भर्ती प्रक्रिया को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया था।

अग्निपथ योजना: विरोध के सात बड़े सवालों पर सेना के जवाब

बीबीसी नेपाली से बात करते हुए भारतीय सेना के मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक मेहता ने कहा कि विदेश नीति के मामले में ‘प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार के लिए अग्निपथ पहला सवाल है। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि विदेश मामलों में प्रचंड की सरकार का पहला निर्णय अग्निपथ के बारे में होगा। भर्ती अभियान, जिसे दिसंबर में शुरू किया जाना था, उसमें देरी हुई है। अगर मार्च में प्रशिक्षण का नियमित चक्र बनाए रखना है, तो गोरखा भर्ती जनवरी तक आयोजित की जानी चाहिए। अशोक मेहता ने कहा, “एक साल में दो भर्तियों के तहत 1,200 लोगों को लिया जाता है। वो दो साल से कोविड के कारण नामांकन नहीं करा पाए हैं। मुझे लगता है कि हमें अभी लगभग 1,500 लोगों को भर्ती करने की जरूरत है।

क्या नेपाल सरकार भारतीय सेना में अपने युवाओं को चार साल के लिए भर्ती करने के लिए सहमत होगी, इस सवाल पर अशोक मेहता ‘संदेह’ जाहिर करते हैं। मेहता कहते हैं कि अग्निपथ योजना को गोरखा भर्ती के मामले में लागू नहीं किया जाना चाहिए। वो कहते हैं, “मैंने भारत सरकार को सुझाव दिया था कि नेपाल के मामले में अग्निपथ को लागू नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “जिस दिन नेपाल ने कहा था कि उनकी सरकार इस बारे में फैसला नहीं ले सकती है। मैं उस वक्त से कहता आ रहा हूं कि नेपाल के लिए इस तरह का फैसला करना मुश्किल होगा।

नेपाल, भारत और ब्रिटेन के बीच त्रिपक्षीय संधि

मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक मेहता ने कहा, ‘भारत एक बड़ा देश है और सैनिक चार साल बाद अलग-अलग जगहों पर पहुंच सकते हैं। नेपाल एक अलग देश है और अग्निपथ भारतीयों के लिए लाई गई योजना है। जनरल मेहता ने कहा कि अगर नेपाल भर्ती रोक देता है तो भारतीय सेना की गोरखा रेजीमेंट के साथ-साथ नेपाल-भारत संबंधों पर भी सीधा और रणनीतिक असर पड़ेगा। नेपाल के कुछ नेता इस बात पर नाराजगी जताते रहे हैं कि भारत ने अग्निपथ योजना के तहत भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती की शर्तों में एकतरफा संशोधन किया है।

उनका तर्क है, “1947 में नेपाल, भारत और ब्रिटेन के बीच त्रिपक्षीय संधि ने गोरखाओं की भर्ती को निर्देशित किया और नेपाल से सलाह मशविरा किए बिना ‘अग्निपथ’ के तहत गोरखा सैनिकों की भर्ती का निर्णय गलत था। पिछले सितंबर में नेपाल का दौरा करने वाले भारतीय सेना के प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और उच्च सरकारी अधिकारियों के साथ इस पर चर्चा की थी। भारत लौटने के बाद उन्होंने कहा था, “अगर नेपाल में गोरखा भर्ती की प्रक्रिया पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार नहीं की जा सकती है, तो कुछ समय के लिए उन पदों पर दूसरे युवकों को भर्ती किया जा सकता है। भारतीय सेना प्रमुख ने कहा कि उन्होंने नेपाल को इस बारे में जानकारी दी है कि वर्तमान में ‘अग्निपथ योजना’ के सेवा निधि पैकेज के तहत नामांकित 75 प्रतिशत सैनिकों को उनकी सेवानिवृत्ति के दौरान लगभग 18.5 लाख रुपये का लाभ मिलेगा। उस समय ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट में उनके हवाले से कहा गया था, “यह फैसला नेपाल को लेना है।

क्या कहते हैं नेपाली विशेषज्ञ

नेपाल इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन अफेयर्स के पूर्व उप कार्यकारी निदेशक रूपक सापकोटा का मानना ​​है कि ‘अग्निपथ’ पर निर्णय लेते समय भू-राजनीतिक, राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक लाभों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “जब 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ था, तो भारतीय सेना में नेपालियों को तैनात किया गया था। इसके बाद इस बात पर बहस हुई थी कि अब नेपाल की गुटनिरपेक्ष नीति टूट गई है। गुटनिरपेक्षता को मानने के बावजूद नेपाल के नागरिकों को दूसरे देश की सेना में भर्ती किया जा सकता है। यह मुश्किल अभी भी नेपाल के सामने बनी हुई है, जिसे वह सालों से लिए चला आ रहा है।

सापकोटा ने कहा, “भारत का चीन, पाकिस्तान और नेपाल जैसे देशों के साथ सीमा विवाद है और यहां तक की आज की तारीख़ में भी हम भू-राजनीतिक रूप से अस्थिर हैं। पंचशील के सिद्धांत के आधार पर भी कोई सामंजस्य नहीं है, जिसे बेहतर करने की जरूरत है। उनके अनुसार यह अध्ययन करने की जरूरत है कि प्रशिक्षित सैन्य शक्ति का चार साल के बाद नेपाल की राष्ट्रीय सुरक्षा पर क्या असर होगा। सापकोटा ने कहा, “हमें इस बात पर चर्चा करनी चाहिए कि हम उन युवाओं को समाज में कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं जिन्होंने हथियारों की ट्रेनिंग ली है। इसके अलावा सेवानिवृत्त गोरखा सैनिकों के लिए भारत से आने वाली पेंशन भारत के लिए एक सॉफ्ट पावर है। इन सभी मुद्दों पर गंभीर विश्लेषण के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए।

नेपाल की मुश्किल क्या है?

प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के तुरंत बाद एक न्यूज चैनल से पुष्प कमल दहाल प्रचंड ने कहा था कि वो पहली विदेश यात्रा पर भारत जाएंगे। सापकोटा का कहना है कि प्रधानमंत्री के भारत दौरे के दौरान ‘अग्निपथ योजना’ को लेकर कोई नतीजे आ सकता है। नेपाल के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के जानकार और यूएमएल के पूर्व सांसद दीपक प्रकाश भट्ट कहते हैं कि उन्हें ऐसी स्थिति नहीं दिखती जहां सरकार ‘अग्निपथ योजना’ पर आसानी से फैसला ले पाए। अगस्त महीने में बीबीसी नेपाली से बात करते हुए नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल के दो नेता, जो विदेश मंत्री रह चुके हैं, उन्होंने कहा था, ‘भारत को नेपाल के मामले में ‘अग्निपथ योजना’ को लागू नहीं करना चाहिए।

 

पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने कहा कि ‘अग्निपथ योजना’ ने नेपाल को गोरखा भर्ती पर अपनी नीति को संशोधित करने का अवसर दिया है। उन्होंने कहा कि नेपाल 10 साल के सशस्त्र संघर्ष से बाहर आया है ऐसे में नेपाली लोगों को किसी दूसरे देश की सेना में चार साल जैसे छोटे कार्यकाल के लिए भर्ती करना समाज के लिए अच्छा नहीं है। नेपाल में गोरखा भर्ती के मुद्दे पर विवाद बढ़ने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि गोरखा भर्ती ‘अग्निपथ योजना’ के अनुसार आगे बढ़ेगी।

भारतीय सेना में कितने गोरखा हैं?

वर्तमान में भारतीय सेना की गोरखा ब्रिगेड में सात रेजिमेंट हैं।बताया जाता है कि नेशनल राइफल्स समेत 43 बटालियन में 40 हजार से ज़्यादा गोरखा जवान हैं। हालांकि इनमें 60 फ़ीसद नेपाल के हैं और 40 फीसद कुमाऊं और गढ़वाल जैसे इलाकों से चुने गए हैं। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक ‘अग्निपथ योजना’ की घोषणा से पहले ही भारत से नेपाली गोरखा सैनिकों की सालाना भर्ती में कमी आने लगी है। खबर के मुताबिक, पहले करीब चार हजार लोगों की सालाना भर्ती होनी थी, लेकिन पिछली बार इसे घटाकर 1,500 कर दिया गया था। अखबार ने अनुमान लगाया है कि ‘अग्निपथ योजना’ के बाद यह संख्या और भी कम हो सकती है।

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