निकाय चुनाव : OBC आरक्षण बना BJP के लिए का जंजाल!

विपक्षी पार्टियों के वार का करना पड़ेगा सामना


सुरेश गांधी


लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने नगर निकाय चुनाव को तत्काल कराने का आदेश दिया है। यह बात अलग है कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने कहा कि पहले OBC आरक्षण और उसके बाद ही चुनाव कराएंगे। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है क्या आरक्षण पर भारी पड़ा योगी सरकार का अति आत्मविश्वास! क्या पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन न करना सरकार की किरकिरी की बनी वजह? क्योंकि OBC वर्ग को शहरी निकायों में आरक्षण देने के लिए जिस ट्रिपल टेस्ट की बात हो रही है, उसका पहला कदम ही पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन है। जबकि मोदी सरकार ने सभी राज्यों में OBC आयोग के गठन को लेकर संसद में विधेयक भी पारित किया है। बावजूद इसके प्रदेश सरकार द्वारो इस आयोग का गठन न करना लापरवाही नहीं तो और क्या है?

मतलब साफ है पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन ना करना योगी के लिए नगर निकाय चुनाव  का जंजाल बन गया है। खास यह है कि सप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत तो चुनाव टालना ही बचेगा एकमात्र विकल्प?हो  जो भी सच तो यही है कि अगर योगी सरकार ने राज्य में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर निकायों में आरक्षण देने का फैसला किया होता तो शायद इस अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता था। लेकिन सरकार का यह अति आत्मविश्वा कि हमने जो फैसला किया वही सही, इस मामले मे उस पर भारी पड़ गया। क्योंकि OBC वर्ग को शहरी निकायों में आरक्षण देने के लिए जिस ट्रिपल टेस्ट की बात हो रही है, उसका पहला कदम ही पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन है। जबकि उत्तर प्रदेश में फिलहाल पिछड़ा वर्ग आयोग ही अस्तित्व में नहीं है, इसी आयोग को पिछड़ी जातियों के संबंध में रिपोर्ट तैयार करनी है। बता दें कि ट्रिपल टेस्ट के अंतर्गत सबसे पहले राज्य को एक कमिशन का गठन करना होगा। वो कमिशन राज्य में पिछड़ेपन की प्रकृति पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा। इसके बाद पिछड़ेपन के आधार पर तय करेगा कि निकाय चुनाव में OBC वर्ग के लिए कितना आरक्षण दिया जा सकता है।

 

इस उहापोह की स्थिति देखते हुए चुनाव टालना ही योगी के सामने एकमात्र विकल्प है। सरकार सुप्रीम कोर्ट से चुनाव टालने की गुहार लगाते हुए। अपने हलफनामें में कहेगी कि OBC के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था खत्म कर चुनाव कराने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश व्यावहारिक नहीं है। ऐसे में आरक्षण व्यवस्था को खारिज करने की बजाय चुनाव की अधिसूचना स्थगित करने की मंजूरी दी जायं। योगी ने कहा भी है कि प्रदेश सरकार नगरीय निकाय सामान्य निर्वाचन के परिप्रेक्ष्य में आयोग गठित कर ट्रिपल टेस्ट के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के नागरिकों को आरक्षण की सुविधा उपलब्ध कराएगी। इसके बाद ही नगरीय निकाय सामान्य निर्वाचन को सम्पन्न कराया जाएगा। बता दें, उत्तर प्रदेश के शहरी निकायों में OBC आरक्षण देने संबंधी योगी सरकार के अति आत्मविश्वास भरे फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने खारिज कर दिया है। योगी सरकार ने अपने को OBC समाज का हितैषी साबित करने के क्रम में बीती 5 दिसंबर की अधिसूचना जारी कर प्रदेश के OBC को स्थानीय निकायों के सभी पदों पर 27 फीसदी का आरक्षण दे दिया था।

सरकार के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। जिस पर सुनवाई के बाद इलाहाबाद हाई की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश नगर निकाय चुनाव के लिए सरकार की ओर से जारी OBC आरक्षण को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने तुरंत चुनाव कराने का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट का यह फैसला योगी सरकार के अति आत्मविश्वास में लिए गए फैसले पर बड़ी चोट है। यह अलग बात है कि प्रदेश सरकार की तरफ से निकाय चुनाव में OBC को आरक्षण देने के लिए यह दलील दी गई थी कि उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के लिए 22 मार्च 1993 को आयोग बनाया गया था, उसके आधार पर 2017 में भी निकाय चुनाव करवाए गए थे। जिस ट्रिपल टेस्ट की बात कही गई है। उसका पालन करते हुए उत्तर प्रदेश में बैकवर्ड क्लास को आरक्षण देने के लिए डेडिकेटेड कमीशन बना हुआ है और उसके आधार पर ही आरक्षण दिया गया है, जो 50 फीसदी से अधिक नहीं है।

सरकार की इस दलील पर हाई कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र के विकास किशन राव गवली केस में सुप्रीम कोर्ट ने OBC को अलग से आरक्षण देने के लिए ट्रिपल टेस्ट को जरूरी कहा है। सरकार निकाय चुनाव में ट्रिपल टेस्ट करते हुए एक डेडिकेटेड कमीशन बनाकर OBC को आरक्षण दे, समय पर निकाय चुनाव यह सरकार सुनिश्चित करे, बिना ट्रिपल टेस्ट के जिन सीटों पर OBC को आरक्षण दिया गया है, उन्हें अनारक्षित माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निकायवार पिछड़ेपन का आकलन अनिवार्य है। इसलिए अब पिछड़ा वर्ग आयोग को ही OBC आरक्षण का प्रतिशत तय करना होगा, जोकि शहरी निकाय वार होगा। यानी हर शहरी निकाय में वहां की स्थितियों को देखते हुए यह कम या ज्यादा हो सकता है। यह सारी कवायद पूरी होने के बाद ही निकाय चुनाव कराने की कार्रवाई की जाएगी, जिसमें वक्त लगेगा।

अब नहीं रहा सूबे में OBC आरक्षण

कोर्ट के इस आदेश के बाद अब प्रदेश में किसी भी तरह का OBC आरक्षण नहीं रह गया है। यानी सरकार द्वारा जारी किया गया OBC आरक्षण नोटिफिकेशन रद्द हो गया है। अगर सरकार या निर्वाचन आयोग अभी चुनाव कराता है तो OBC के लिए आरक्षित सीटों को जनरल मानकर चुनाव होगा। वहीं दूसरी तरफ एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटें यथावत रहेंगी, इसमें कोई बदलाव नहीं होगा।

विपक्षी दलों को मिला बोलने का मौका

फिलहाल हाई कोर्ट के फैसले के बाद विपक्षी दलों को योगी सरकार पर हमला बोलने का मौका मिल गया है और योगी सरकार के पास विपक्षी दलों के आरोपों का कोई उत्तर नहीं है। समाजवादी पार्टी के मुखिया और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए ट्वीट किया है, “आज आरक्षण विरोधी भाजपा निकाय चुनाव में OBC आरक्षण के विषय पर घड़ियाली सहानुभूति दिखा रही है।

आज भाजपा ने पिछड़ों के आरक्षण का हक़ छीना है, कल भाजपा बाबा साहब द्वारा दिए गए दलितों का आरक्षण भी छीन लेगी।” मायावतीः बसपा प्रमुख ने कहा, ’’यूपी में बहुप्रतीक्षित निकाय चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग को संवैधानिक अधिकार के तहत मिलने वाले आरक्षण को लेकर सरकार की कारगुजारी का संज्ञान लेने सम्बंधी माननीय हाईकोर्ट का फैसला सही मायने में भाजपा व उनकी सरकार की OBC एवं आरक्षण-विरोधी सोच व मानसिकता को प्रकट करता है। ’’मायावती ने कहा,’’ यूपी सरकार को मा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पूरी निष्ठा व ईमानदारी से अनुपालन करते हुए ट्रिपल टेस्ट द्वारा OBC आरक्षण की व्यवस्था को समय से निर्धारित करके चुनाव की प्रक्रिया को अन्तिम रूप दिया जाना था, जो सही से नहीं हुआ। इस गलती की सजा OBC समाज बीजेपी को जरूर देगा।’ आप के सांसद संजय सिंह ने भी ट्वीट किया है, “मोदी , योगी , केशव मौर्य ने कहां छिपे हो सामने आओ। पिछड़ों का हक क्यों मारा? ये साफ़ बताओ। नौकरी में आरक्षण छीना, चुनाव में आरक्षण छीना, बस चले तो पिछड़ो के जीने का हक भी छीन लेगी भाजपा।”

सरकार कर सकती है कमीशन गठित

कोर्ट के इस फैसले के बाद अगर सरकार को OBC आरक्षण लागू करना है, तो कमीशन गठित करना होगा। ये कमीशन पिछड़ा वर्ग की स्थिति पर अपनी रिपोर्ट देगा। इसके आधार पर आरक्षण लागू होगा। आरक्षण देने के लिए ट्रिपल टेस्ट यानी 3 स्तर पर मानक रखे जाते हैं। इसे ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला कहा गया है। अब इस टेस्ट में देखना होगा कि राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग की आर्थिक-शैक्षणिक स्थिति कैसी है? उनको आरक्षण देने की जरूरत है या नहीं? उनको आरक्षण दिया जा सकता है या नहीं? आरक्षण सिस्टम लागू करने के लिए सरकार जनगणना के आंकड़ें देखती है। इसमें उस वार्ड में वर्तमान जनगणना के अनुसार क्या आबादी है। अगर OBC और एससी की संख्या जनगणना में ज्यादा है तो उसके हिसाब से उनको आरक्षित किया जाता है। कोविड की वजह से साल 2021 में जनगणना नहीं हो पाई थी, इसकी वजह से साल 2011 के जनगणना पर ही आरक्षण व्यवस्था तय किया गया है। इसमें यह देखना होता है कि वार्ड के परिसिमन के अंदर जो इलाका आता है, उसमें लेटेस्ट जनगणना में कौन सी आबादी लीड कर रही है। उसके आधार पर ही आरक्षण व्यवस्था तय की जाती है।

ट्रिपल टेस्ट फार्मूला

दरअसल, विकास किशनराव गवली के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निकाय चुनावों के लिए OBC आरक्षण तय करने के लिए एक फॉर्म्यूला दिया था। इसे ट्रिपल टेस्ट फार्मूला कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि निकाय चुनाव में राज्य सरकार ट्रिपल टेस्ट फार्मूले का पालन करने के बाद ही OBC आरक्षण तय कर सकती है। इस ट्रिपल टेस्ट फार्मूले में सबसे पहले स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति को लेकर अनुभवजन्य जांच के लिए एक आयोग की स्थापना की जाए। यह आयोग निकायों में पिछ़ड़पेन की प्रकृति का आकलन करेगा और सीटों के लिए आरक्षण प्रस्तावित करेगा। आयोग की सिफारिशों के आलोक में स्थानीय निकायों द्वारा OBC की संख्या का परीक्षण कराया जाए और उसका सत्यापन किया जाए। इसके बाद OBC आरक्षण तय करने से पहले यह ध्यान रखा जाए। कि SC-ST और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए कुल आरक्षित सीटें 50 फीसदी से ज्यादा न हों।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार की चुनौती

OBC आरक्षण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले को यूपी सरकार चुनौती दे सकती है। दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा कि राज्य में इस बार निकाय चुनाव बिना OBC आरक्षण के होगा। राज्य सरकार ने इस महीने की शुरुआत में त्रिस्तरीय नगर निकाय चुनाव में 17 नगर निगमों के महापौर, 200 नगर पालिका परिषदों के अध्यक्षों और 545 नगर पंचायतों के लिए आरक्षित सीटों की अनंतिम सूची जारी करते हुए सात दिनों के भीतर सुझाव, आपत्तियां मांगी थी और कहा था कि सुझाव आपत्तियां मिलने के दो दिन बाद अंतिम सूची जारी की जाएगी। राज्य सरकार ने पांच दिसंबर के अपने मसौदे में नगर निगमों की चार महापौर सीटें OBC के लिए आरक्षित की थीं, जिसमें अलीगढ़ और मथुरा-वृंदावन OBC महिलाओं के लिए और मेरठ एवं प्रयागराज OBC उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थे। दो सौ नगर पालिका परिषदों में अध्यक्ष पद पर पिछड़ा वर्ग के लिए कुल 54 सीटें आरक्षित की गयी थीं। जिसमें पिछड़ा वर्ग की महिला के लिए 18 सीटें आरक्षित थीं। राज्य की 545 नगर पंचायतों में पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित की गयी 147 सीटों में इस वर्ग की महिलाओं के लिए अध्यक्ष की 49 सीटें आरक्षित की गयी थीं।

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