अखबार बिना कार्टून के? शादी बिना शहनाई के!!

के. विक्रम राव
के. विक्रम राव

एक रिपोर्टर के नाते यह मेरी ह्ढ़तर बल्कि अकाट्य अवधारणा है कि हम जैसे रिपोर्टरों के हजार शब्दोंवाली खबर के सामने एक कार्टूनिस्ट द्वारा झटके-लटके से खींची गईं चंद लकीरें अधिक कारगर अभिव्यक्ति होती हैं। प्रसंग है आज (26 दिसंबर 2022) का। महान कार्टूनिस्ट शंकर की 33वीं पुण्यतिथि का। आचार्य कृपलानी और इंदिरा गांधी की टेढ़ी नाक तथा लोहिया के बिखरे बाल शंकर की खास पेशकश होती थी। ठीक जैसे “नेशनल हेरल्ड” के कार्टूनिस्ट स्व. राम उग्र द्वारा यादव पिता-पुत्र (मुलायम सिंह-अखिलेश) विषयक चित्रण। इन मुख्यमंत्री-द्वय की नाक ही खबर बनती रही। केशव शंकर पिल्लाई उर्फ “शंकर” के “कार्टून साप्ताहिक” का दौर यादगार रहा। बड़ा प्रभावी था। चर्चित भी।

शंकर लखनऊ एक बार आए थे। “नेशनल हेरल्ड” के तत्कालीन संपादक एम. चलपति राव ने उन्हें लखनऊ की सैर का काम मुझे सौंपा था। उन्हें सचिवालय का भवन उम्दा लगा। काफी पसंद आया। मगर इससे वे इलाहाबाद को बेहतर राजधानी मानते थे। यूं 1907 में फ्रांसीसी एमिल कोहल ने पहली बार सियासी कार्टून (व्यंगचित्र) की शैली शुरू की थी। तभी चलचित्र भी शुरू रहे थे। मुझे आज तक लंदन की कार्टून पत्रिका “दि पंच” का वह रेखाचित्र याद है जो बड़ा दिलचस्प था। एक व्यक्ति पुराने टाइप वाला काले टेलीफोन का चोगा कान से सटाये अपनी पत्नी पर चीख रहा है : “इस टेबल पर की धूल किसने साफ की ? उस पर मैंने एक फोन नंबर लिखा था। अमूमन कार्टूनिस्ट की फितरत होती है कि राजनेता की फर्जी, निराधार अहंभावना को पंचर करें। यही उनका पेशा है। यह काम भी बड़ी सफलता से किया जाता है। “टाइम्स ऑफ इंडिया” में हमारे वर्षों तक साथी रहे आर. के. लक्ष्मण का “आम आदमी” (तब केजरीवाल की पार्टी नहीं हुई थी) बड़ा लोकप्रिय था। यूं लक्ष्मण ने मुंबई में दैनिक “फ्री प्रेस जर्नल” में कार्टूनिंग सीखी थी। उनके सहयोगी थे बाल ठाकरे जिन्होंने बाद में शिवसेना की स्थापना की। ठाकरे की कार्टून पत्रिका मराठी में प्रकाशित होती थी, नाम था “मार्मिक।”

अपनी लखनऊ यात्रा के दौरान वार्तालाप में लक्ष्मण ने राज खोला। वे नेहरू पर कार्टून बड़ी कठिनाई से बना पाते थे। एक बार बिना टोपी के नेहरू का खाका खींचा। बड़ा माकूल और सटीक लगा। तब से लक्ष्मण के हर कार्टून में गंजे सिर वाले नेहरू ही दिखते थे। लक्ष्मण को मैं लखनऊ लाया था एक कार्यक्रम में। सभागार में अतिरिक्त कुर्सियां लगानी पड़ी थी। क्या संयोग रहा कि बेंगलुरु का एक सामान्य छात्र राशिपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण एकदा मशहूर जे जे स्कूल आफ आर्ट (मुंबई में “टाइम्स” भवन के पास) पढ़ने गए। उसे प्रवेश नहीं दिया गया। वर्षों बाद यही लक्ष्मण उस महान कला संस्थान में दीक्षांत भाषण देने गए थे। कैसा इत्तेफाक रहा। राजनेता पर चुटकी वे खूब लेते थे। एक कार्टून में उन्होंने दर्शाया कि मंत्री महोदय मंच से भाषण दे रहे थे। दो थके हुये श्रोता बतिया रहे थे कि नेता जी का भाषण सिर्फ पांच मिनट का होना था। मगर चलता गया, चलता गया। दो घंटे बीते। ऐसी बात तो हुआ ही करती है।

अपने समय के महान हस्ताक्षर बाबूजी

मैं ने स्वयं यूपी के राज्यपाल स्व. मोतीलाल वोरा को हमारी एक सभा में नौ बार कहते सुना था : “और अंत में,” मगर वाकई वह अंत एक घंटे बाद ही आया। यूं बहुधा ऐसे लोग भी हुए जो कार्टून पर दंगे कराते हैं। खासकर सांप्रदायिक मामलों पर। कई घटनाएं हुई हैं। ताजातरीन रही दो वर्ष पूर्व (मार्च 2020) की जब कोरोना पर कार्टून बना था। चेन्नई दैनिक “दि हिंदु” में। कोरोना रूपी किटाणु को अरब देश का जामा पहनाया गया था।परिधान इस्लामी लगा। संपादक को मारने की धमकी मिली थी। क्षमा याचना पर ही जान बची। डेनमार्क मे तो पैगंबरे इस्लाम पर कार्टून बना तो व्यापक दंगे हुए थे। मेरी यह मान्यता है कि रूखे सूखे खबरों वाले अखबार को चमकाता है तो वह कार्टून ही है। व्यंग सटीक गद्य होता है। उसी भांति कार्टून भी नीरस समाचारपत्र को रसवंती बना देता है।

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