सुशासन पथ के महारथी

डॉ दिलीप अग्निहोत्र


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक प्रेरणा से जनसंघ की स्थापना हुई थी। इसमें साँस्कृतिक राष्ट्रवाद और सुशासन का संकल्प समाहित था।जनसंघ के सभी मुद्दे इन्हीं विचारों पर आधारित थे। संगठन की प्रारंभिक इकाई से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अनगिनत लोग निस्वार्थ राष्ट्र सेवा की भावना से कार्य किया। मात्र सत्ता प्राप्त करना ही इसका उद्देश्य नहीं था। भारतीय जनता पार्टी ने भी इस वैचारिक यात्रा को जारी रखा। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाने का जनादेश भी मिला। छह वर्षों का यह कार्यकाल सुशासन युग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। समय के साथ नेतृत्व में परिवर्तन होते रहे। परिवार आधारित पार्टियों में परिवर्तन राजतंत्र की व्यवस्था के अनुरूप होता है। पुत्र या पुत्री ही पार्टी के उत्तराधिकारी बनते हैं। यदि इसमें कभी कठिनाई हुई तब किसी अन्य वफादार की ताजपोशी होती है।

लेकिन कमान परिवार के अधीन ही रहती है। यूपीए सरकार और कांग्रेस के वर्तमान संगठन के मुखिया इसके उदाहरण हैं। दूसरी तरफ भाजपा विचार आधारित पार्टी है। इसलिए इसमें नेतृत्व की कई श्रेणियां एक साथ तैय्यार होती है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। भाजपा में परिवर्तन परिवार नहीं बल्कि विचार पर आधारित होते हैं। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय ने विचार यात्रा का शुभारंभ किया था। अटल बिहारी बाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा केंद्र की सत्ता तक पहुंची थी। समय के साथ नेतृत्व में फिर विचार आधारित परिवर्तन हुआ। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को लगातर दूसरी बार केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर मिला। अनेक राज्यों में भाजपा की सरकार है। उत्तर प्रदेश में पहली बार योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा को लगातर दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफ़लता मिली। सुशासन और साँस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति समर्पण को मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है।

भारतीय जनसंघ की स्थापना राष्ट्र प्रथम की विचारधारा के आधार पर हुई थी। उस समय देश में कांग्रेस का वर्चस्व था। यह माना जाता था कि जनसंघ को विपक्ष की ही भूमिका का निर्वाह करना है। तब सदन में इसका संख्याबल कम होता था, लेकिन वैचारिक ओज प्रबल था। भारी बहुमत की सरकारें भी नाम मात्र के संख्याबल के विचारों से परेशान होती थीं। अटल बिहारी वाजपेयी और फिर लाल कृष्ण आडवाणी जब संसद में बोलते थे, तब लोग ध्यान से सुनते थे। सरकार को भी कई मसलों को सुधारने संभालने की प्रेरणा मिलती थी। जनसंघ और भाजपा की यात्रा में अटल आडवाणी की जोड़ी का योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा है। जनसंघ के दौर में हिन्दुत्व के मुद्दों को मुखर होकर उठाया जाता था। लेकिन उस समय की परिस्थितियां अलग थी। इन मुद्दों ने जनसंघ को हिन्दी भाषी राज्यों तक सीमित रखा। यहां भी जनसंघ सत्ता से बहुत दूर रही। गैर कांग्रेसवाद अभियान के समय कुछ प्रांतों में संविद सरकारें बनी थी।जनसंघ उसमें शामिल थी। यह विचार यात्रा का दूसरा पड़ाव था। जनता पार्टी में जनसंघ के विलय एक नया पड़ाव था। आपातकाल के बाद की परिस्थिति में यह विलय अपरिहार्य हो गया था। अन्य पार्टियों के साथ चलने की विवशता थी। लेकिन जनसंघ घटक के लोग अपनी मूल विचार धारा से कभी विमुख नहीं हुये थे। उसी समय अटल बिहारी वाजपेयी को नेहरू की भांति दिखाने संबन्धी चर्चा शुरू हुई थी।

किन्तु जनता पार्टी का प्रयोग ढाई वर्ष तक भी नहीं चला। इसके बाद जनसंघ घटक ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की थी। इसमें गांधीवादी समाजवाद की अवधारणा समाहित थी। यह भी विचार यात्रा का एक पड़ाव था। इसमें भी भाजपा ने जनसंघ के समय के अपने मुद्दों का परित्याग नहीं किया था।अयोध्या में श्री राम मन्दिर निर्माण आंदोलन ने भाजपा को नए पड़ाव पर पहुंचाया था। इसके बाद भी उसे अपनी दम पर बहुत नहीं मिला था। ऐसे में कुछ कशमकश था। गठबंधन की सरकार बनाने या फिर विपक्ष में ही बैठने का विकल्प था। भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनाने का व्यवहारिक निर्णय हुआ। यदि ऐसा ना होता तो उन मतदाताओं को निराशा होती जिन्होंने शायद पहली बार भाजपा को इतना बड़ा समर्थन दिया था। अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार करीब दो दर्जन पार्टियों के समर्थन पर आधारित थी।ऐसे में वैचारिक मुद्दों पर अमल सम्भव नहीं था। फिर भी छह वर्षों तक चली इस सरकार ने सुशासन की मिसाल कायम की। विकसित भारत की मजबूत बुनियाद का निर्माण किया गया।

अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी की राजनीति भी बेमिसाल रही है। करीब आधी शताब्दी तक अटल बिहारी आगे चलते रहे। आडवाणी स्वेच्छा से पीछे रहे। संगठन के कार्य में संलग्न रहे। यह राजनीति की बेमिसाल जोड़ी थी। वह पार्टी को मजबूत बनाने और सरकार को अपेक्षित सहयोग करने की दिशा में सतत प्रयत्नशील रहे। आडवाणी की रथयात्राओं ने भाजपा को नए मुकाम पर पहुंचाया।वस्तुतः भाजपा की यात्रा एक विचार की यात्रा रही है, जिसके आधार पर भाजपा का ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ का दावा एकदम सही लगता है। आज यह देश का सबसे लोकप्रिय दल है और इसकी विचारधारा जन-जन तक पहुँच चुकी है। भाजपा वर्तमान राजनीति में एक मात्र पार्टी है जो व्यक्ति या परिवार पर आधारित नहीं है। यह पूरी तरह विचारधारा पर आधारित पार्टी है। इस विचारधारा के आधार पर ही  ऐसे अनेक मसलों का समाधान हुआ है, जिसकी कल्पना करना भी असंभव था।

भाजपा की सरकारें सुशासन के प्रति समर्पित रहती हैं क्योंकि यही उनकी विचारधारा है। भाजपा इसी विचारधारा पर आधारित पार्टी है। दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को साकार करने का काम भाजपा ने ही किया। उसकी सरकारें अनवरत इस दिशा में प्रयास कर रही हैं। भाजपा समाज के आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति के विकास की बात करती है। उनको मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास करती है। इसके लिए अनेक योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित किया गया है। कांग्रेस के लोग जब रिवोल्यूएशन की बात करते थे, भाजपा इवेल्यूएशन की बात करती थी। वामपंथी पेट की भूख को बड़ा बताते हैं। वह मानते हैं कि भूख मिटने से संतुष्टि मिलती है लेकिन जहां शरीर, मन, बुद्धि एकात्म के साथ आगे बढ़ते हैं, वहीं सम्पूर्ण संतुष्टि मिलती है। यही एकात्म मानववाद है।

संगठन संरचना की दृष्टि से भी भाजपा अलग दिखाई देती है। उसका विरोध करने वाली पार्टियां परिवार आधारित थीं। वामपंथी अवश्य परिवार आधारित नहीं थे। लेकिन जनभावना को समझने और भारतीयता की दृष्टि को अपनाने में नाकाम रहे। इसलिए इनकी प्रासंगिकता समाप्त होती जा रही है। प्रारंभ में भाजपा का संख्या बल बहुत कमजोर हुआ करता था। एक बार उसके मात्र दो सदस्य ही लोक सभा पहुंच सके थे। उस समय एक पत्रकार वार्ता में लाल कृष्ण आडवाणी ने एक रोचक प्रसंग सुनाया था। एक बार विदेशी पत्रकारों की टीम उनसे मिलने आई। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय विषयों पर भाजपा के विचारों पर खूब बात हुई। अंत्योदय से लेकर एकात्म मानव वाद तक चर्चा हुई। लालकृष्ण आडवाणी ने बताया कि उन पत्रकारों ने एक ऐसा प्रश्न पूंछा,जिससे वह संकोच में पड़ गए। ऐसा नहीं कि इसका उत्तर उन्हें पता नहीं था,लेकिन इतनी बातों के बाद उक्त प्रश्न अटपटा लगा।

विदेशी पत्रकार ने पूंछा था कि जहां से सरकार बनती है उस लोक सभा में आपकी पार्टी के कितने सदस्य है। शायद उच्च स्तर की वैचारिक बातों के बाद लाल कृष्ण आडवाणी इस प्रश्न से बचना चाहते थे। फिर जबाब तो देना ही था। उन्होंने बताया कि लोक सभा में इस समय हमारी पार्टी के दो सदस्य है। लेकिन एक सन्तोष अवश्य था कि संख्याबल कम होने के बाद भी भाजपा का देश विदेश तक वैचारिक आधार पर महत्व था। आज भाजपा सत्ता में है, लेकिन वैचारिक आधार पर सभी विपक्षी मिल कर भी उसका मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है। देश में सेक्युलिरिज्म का मतलब कुछ लोगों के लिए योजनाएं,वोटबैंक के लिए नीतियां बना दिया गया है। भाजपा सबके हित में कार्य कर रही है,इसलिए उसे साम्प्रदायिक कहा जाता है। नरेंद्र मोदी ने कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी,दीनदयाल उपाध्याय से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी ने बीजेपी को राह दिखाई, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने बीजेपी को आगे बढ़ाया है। हमारे यहां व्यक्ति से बड़ा दल और दल से बड़ा देश है।

एक वक्त था जब अटल जी ने एक वोट से सरकार गिरने दी,लेकिन नियमों से समझौता नहीं किया। देश में राजनीतिक स्वार्थ के लिए दल टूटे हैं,लेकिन बीजेपी में कभी ऐसा नहीं हुआ। इमरजेंसी के वक्त बीजेपी के कई नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। कोरोना काल में बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने सेवा की, केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारें आत्मनिर्भर भारत अभियान को आगे बढ़ा रही हैं। 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई और इसका प्रथम अधिवेशन मुम्बई में आयोजित किया गया। इस अधिवेशन में पार्टी के अध्यक्ष के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण ऐतिहासिक था। इसमें उन्होंने जो भविष्यवाणी की थी, वो आज सत्य सिद्ध हो चुकी है। उन्होंने कहा था- ‘भारत के पश्चिमी घाट को मंडित करने वाले महासागर के किनारे खड़े होकर मैं ये भविष्यवाणी करने का साहस करता हूं कि अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा। फिर वह समय आया जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ। छह वर्षों तक इस सरकार ने देश की बेहतरीन सेवा की। अटल जी ने कहा था कि मैं तीन सौ कमल देख रहा हूँ। यह सपना भी साकार हुआ। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

इस विचारधारा के आधार पर ही  ऐसे अनेक मसलों का समाधान हुआ है, जिसकी कल्पना करना भी असंभव था। लगभग पांच सौ वर्षों के बाद आज अयोध्या में राममंदिर निर्माण का सपना साकार हो रहा है। भूमि पूजन के बाद मंदिर निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया है। भव्य काशी विश्वनाथ धाम और उज्जैन महाकाल लोक का लोकार्पण हुआ। तीन तलाक, अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों को छूने का साहस कोई सरकार नहीं दिखा पाई थी। नरेंद्र मोदी ने इच्छाशक्ति दिखाई। तीन तलाक पर प्रतिबंध लगा, अनुच्छेद 370 समाप्त किया गया। इसी प्रकार नागरिकता संशोधन कानून भी लागू किया गया, जिससे पाकिस्तान, बांग्लादेश अफगानिस्तान के उत्पीड़ित बन्धुओं को नागरिकता मिलने का रास्ता साफ हुआ। इसके अलावा दीनदयाल उपाध्याय के अन्त्योदय पर आधारित गरीब-कल्याण की योजनाओं के द्वारा करोड़ों गरीब लोगों के जीवन में परिवर्तन लाने का काम भी हुआ है। दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को साकार करने का काम भाजपा ने ही किया। उसकी सरकारें अनवरत इस दिशा में प्रयास कर रही हैं।

भाजपा समाज के आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति के विकास की बात करती है। उनको मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास करती है। इसके लिए अनेक योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित किया गया है। नरेंद्र मोदी सरकार ने चालीस करोड़ लोगों के जनधन खाते खुलवाए। पहले ये लोग बैंकिंग सेवा से वंचित थे। आयुष्मान, उज्ज्वला और निर्धन आवास योजनाएं संचालित की गई। देश खुले में शौच से मुक्त हो गया। भाजपा सरकार ने घर घर बिजली पहुंचाई। आठ करोड़ गैस कनेक्शन दिए। राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए कहा था कि योजनाओं के एक रुपये में पन्द्रह पैसा गरीबों तक पहुंचता था। लेकिन वे बस कहकर ही रह गए, समाधान की दिशा में कुछ नहीं किया। समाधान नरेंद्र मोदी ने किया है। आज पूरा पैसा सीधे लोगों के खातों में पहुंच रहा है।

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