डॉक्टरी की पढ़ाई हिंदी में लेकिन जोखिम…?

डॉ. ओ.पी  मिश्र


पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भोपाल में MBBS  की पढ़ाई से जुड़ी तीन विषयों की हिंदी किताबें जारी की थी। हिंदी भाषी प्रांत उत्तर प्रदेश का निवासी होने के कारण हमें भी गर्व की अनुभूति हुई कि चलो देर से ही सही अब कम से कम डॉक्टरी की पढ़ाई हिंदी में तो होगी। लेकिन मेडिकल प्रोफेशनल के नाते जब मैं इसकी मेरिट और डिमैरिट पर सोचता हूं तो पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि यह निर्णय कहीं कुछ जल्दबाजी में तो नहीं हो गया? क्योंकि ‘हिंदी’ सरकारी कागज में तो हमारी ‘मातृभाषा’ बनी हुई है लेकिन वास्तव में आज भी हिंदी पूरे देश की मातृभाषा नहीं बन पाई है। और जब तक हिंदी पूरे देश की मातृभाषा नहीं बनती इस तरह के निर्णय अपनी पीठ थपथपा ने से आगे नहीं जा सकते।

कल्पना कीजिए किसी मेडिकल कान्फ्रेंस में अगर तमिलनाडु का डॉक्टर जो अपनी क्षेत्रीय भाषा में डॉक्टरी पढ़ कर आया है । उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश के डॉक्टर को किस भाषा में ‘अपडेट’ करेगा। यह प्रश्न बहुत ही जटिल है। इसके अलावा मेडिकल साइंस में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो नित नयी रिसर्च होती रहती है। उसे हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाले छात्रों के बीच कैसे साझा किया जाएगा? हिंदुस्तान में या भारत या इंडिया में हिंदी के सम्मान से किसी को कोई गुरेज नहीं। लेकिन मेडिकल इंजीनियरिंग तथा लॉ की पढ़ाई करने वाले छात्रों के सामने दिक्कत ही दिक्कत है।

रोहिंगिया को बांग्लादेश भी बोझ मानता है !!

वैसे यह फैसला नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के अंतर्गत लिया गया है, जिसके अनुसार तकनीकी विषयों की उच्च शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने की बात है। आने वाले समय में मेडिकल की पढ़ाई अन्य भारतीय भाषाओं में भी शुरू होगी। यानी तमिलनाडु के लोग तमिल में पड़ेंगे, हिंदी भाषी प्रदेश के लोग हिंदी में , पंजाब के लोग गुरुमुखी में, असम के लोग असमी में? फिर तारतम्य कैसे बैठेगा? यह एक ऐसा सवाल है जो सभी को परेशान किए हुए है। क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह द्वारा जो पुस्तके जारी की गई उन पुस्तकों पर ही अगर गौर किया जाए तो एक पुस्तक पर हिंदी में ‘एनाटामी’ लिखा है। एनाटामी का मतलब होता है मानव शरीर विज्ञान तो क्या लिपि बदलना ही भाषा बदलने की श्रेणी में आता है।

अगर अनुवाद ही करना था तो उसका सही अनुवाद किया जाना चाहिए। वैसे एक मेडिकल प्रोफेशनल के नाते मेरा तो मत यही है कि टर्म को ज्यों का त्यों रखकर चलाने में ज्यादा फायदा है। इतना ही नहीं हिंदी में डॉक्टरी पढ़कर विदेश जाने वालों के सामने भी विकट समस्या उत्पन्न होगी। वे वहां न तो आगे की पढ़ाई कर पाएंगे, न ही रिसर्च कर पाएंगे और ना ही जॉब कर पाएंगे। इस और भी सरकार को ध्यान देना चाहिए। हां इतना अवश्य है कि देश की प्रतिभा देश में ही रहेगी। इसीलिए मैंने शुरू में कहा था कि केंद्र सरकार का यह निर्णय जल्दबाजी में लिया गया निर्णय है जो तमाम दिक्कतें पैदा कर सकता है।

 

Analysis

डॉ. त्रिपाठी की मदर-इन-लॉ का देहांत

लखनऊ। राष्ट्रपति के पूर्व ओएसडी डॉ. कन्हैया त्रिपाठी की मदर-इन-लॉ ऊषा शुक्ला का देहांत एक दिसम्बर को हो गया है। वह 60 वर्ष की थीं और लंबे समय से बीमार थीं। उनका निधन गुजरात के सूरत में हुआ। डॉ. त्रिपाठी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। अपने शोक संदेश में कहा है […]

Read More
Analysis

फुटबॉल का उद्दाम पक्ष! रोनाल्डो प्रकरण!!

के. विक्रम राव एक पैगाम, बल्कि चेतावनी, आज (7 दिसंबर 2022) फिर आई है। “घमंडी का सर नीचा” वाली पुरानी कहावत को चरितार्थ करती हुई। तीन हजार किलोमीटर दूर कतर की लुसैल फुटबॉल स्टेडियम में पुर्तगाल ने स्विजरलैंड को आज तड़के भोर में पांच गोल से पीट दिया। उसके शीर्षतम खिलाड़ी क्रिश्चियानो रोनाल्डो नही खेले। […]

Read More
Analysis

Mahaparinirvan Day Special : स्व-मूल्यांकन की मांग करते बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर

हमारे देश में बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का जो स्थान है वह आज़ादी के बाद कदाचित उस कालखंड में जन्म लेने वालों को नहीं मिला। वह हमेशा सम्मान की नज़र से प्रतिष्ठित हैं और जब तक भारत रहेगा उनका वह स्थान सुरक्षित है, ऐसा कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । सबसे बड़ी बात […]

Read More