परिवारवादी पार्टियों के लिए सबक

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

परिवार आधारित पार्टियों के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा।उद्धव ठाकरे ने कुर्सी के लिए वैचारिक विरासत का परित्याग कर दिया था।जबकि भाजपा ने परिवारवाद से पृथक विचारधारा को सम्मान दिया। एकनाथ शिंदे की ताजपोशी इसका प्रमाण है। परिवार के उत्तराधिकारी देखते रहे,सत्ता का हस्तांतरण परिवार के बाहर हो गया।इसके साथ ही विरासत पर दावेदारी भी बदल गई। परिवार के लोगों पर विचारों की अवहेलना करने का आरोप है। इसके जबाब में उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है। जिन्हें बाहरी कहा गया,वह विचारधारा पर अमल का संदेश दे रहे है।महाराष्ट्र में बाल ठाकरे के अनुयायी एकनाथ शिंदे भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बने हैं। इस प्रकार भाजपा ने साबित किया कि उसके लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं बल्कि विचारधारा का महत्त्व है। एकनाथ शिंदे का प्रारंभिक बयान उल्लेखनीय है।उन्होंने बाल ठाकरे की विरासत पर अमल का मंसूबा दिखाया। जबकि उद्धव ठाकरे ने इसे पीछे छोड़ दिया था। उन्होने कहा कि हिंदुत्व की भूमिका और राज्य के विकास पर हिंदू हृदय सम्राट बालासाहेब ठाकरे की भूमिका के आधार पर राज्य के विकास के लिए वे काम करेंगे। कैबिनेट की बैठक में फसल पानी,मेट्रो परियोजना आदि मुद्दों पर चर्चा हुई है। समृद्धि हाइवे को राज्य की गेम चेंजर बताया गया। उन्होंने कहा कि देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री  काल  में शुरू किए गए जनहित कार्यों को आगे बढ़ाया जाएगा।

बाल ठाकरे की शिवसेना और भाजपा के बीच स्वाभाविक गठबंधन था। संस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दों पर परस्पर सहमति थी। लेकिन उनके उत्तराधिकारी उद्धव ठाकरे ने विचारों की जगह मुख्यमंत्री की कुर्सी को महत्त्व दिया। इसलिए वह एनसीपी और कांग्रेस की शरण में चले गए थे। उद्धव जानते थे कि कांग्रेस और एनसीपी का संख्याबल अधिक है। ऐसे में वह नाममात्र के ही मुख्यमन्त्री रहेंगे। गठबंधन की कमान शरद पवार के नियन्त्रण में थी। वही अघोषित रूप में सुपर सीएम थे। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष शरद पवार ने कहा कि भारती जनता पार्टी के नेता देवेंद्र फडणवीस में आरएसएस के संस्कार हैं, इसी वजह उन्होंने आज उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। आरएसएस तथा भाजपा में आदेश महत्वपूर्ण रहता है। केंद्रीय भाजपा से आदेश मिलने के बाद उन्होंने इसका पालन किया है। फडणवीस का यह कदम राजनीति में तथा अन्य दलों के लोगों के लिए सीखने जैसा ही है। दोपहर में देवेंद्र फडणवीस ने घोषणा की कि एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री के रूप में अकेले शपथ लेंगे। यह अपने आपमें आश्चर्यजनक था। उसके बाद भाजपा की केंद्रीय कमेटी के आदेश के मुताबिक देवेंद्र फडणवीस को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी पड़ी। फडणवीस पांच साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे।

इसके बाद उन्होंने ढाई साल तक विपक्ष के नेता के रूप में कार्य किया।भाजपा के एक सौ छह विधायकों का तथा शिंदे गुट के पचास विधायकों के समर्थन का दावा सरकार बनाने के लिए पेश किया। इसके बाद राज्यपाल भगतसिंह ने एकनाथ शिंदे को सरकार बनाने का न्योता दिया था। विधानसभा का चुनाव शिवसेना व भाजपा ने साथ मिलकर लड़ा था और राज्य के नागरिकों ने राज्य में शिवसेना भाजपा को ही सरकार बनाने के लिए मतदान किया था। लेकिन उद्धव ठाकरे ने जनादेश का अपमान किया था।ढाई वर्ष महाराष्ट्र में अराजकता का माहौल रहा। उस सरकार की विदाई महाराष्ट्र के हित में है।नई सरकार राज्य में रुके विकास कार्यों को पूरा करेगी। एकनाथ शिंदे ने पिछली सरकार की असलियत बतायी। कहा कि पिछली सरकार में वह नगर विकास मंत्री थे,लेकिन काम करने में मर्यादा थी। लेकिन उन पर अनावश्यक दबाब रहता था।भाजपा व शिवसेना ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन लगातार हमको कमजोर किया जा रहा था। इसी वजह से शिवसेना के करीब चालीस विधायकों ने नाराजगी जताई थी। इस समय संख्याबल देवेंद्र फडणवीस के साथ है और वे खुद मुख्यमंत्री बन सकते थे लेकिन उन्होंने बड़ा मन दिखाते हुए उन्हें मुख्यमंत्री का पद पेश किया था।

उद्धव ठाकरे को पता था कि उनकी सरकार अल्पमत में आ गई है। उन्होंने मुख्यमन्त्री का सरकारी आवास भी छोड़ दिया था।लेकिन ढाई वर्षो तक वह शरद पवार के दबाब में रहे थे। एक बार फिर पवार ने दबाब बनाया इस्तीफा देने से रोक दिया। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने उद्धव ठाकरे तथा महाराष्ट्र विधानमंडल सचिवालय को पत्र लिखकर गुरुवार को विशेष अधिवेशन बुलाए जाने का आदेश दिया था। शरद पवार के दबाब में राज्यपाल के इस आदेश को शिवसेना ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के निर्णय पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। इससे भी उद्धव ठाकरे की फजीहत हुई। इसके बाद उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी उन्होंने विधानपरिषद के सदस्य पद से इस्तीफा देने की घोषणा की।चलते चलते हिन्दुत्व की याद आई थी कैबिनेट की अंतिम बैठक में औरंगाबाद और उस्मानाबाद जिलों तथा नवी मुंबई विमानतल का नाम बदल कर क्रमश: संभाजी नगर और धाराशिव तथा डीबी पाटिल विमानतल किए जाने को मंजूरी दी गई लेकिन उद्धव ने बहुत देर कर दी दी। ढाई वर्ष तक वह शिवसेना के विचारों से दूर रहे। अब सत्ता के साथ ही वह अपनी विश्वसनीयता भी गँवा चुके हैं।

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