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मनीष हत्याकांड: दागी पुलिसकर्मी ही कर रहे महकमे को बदनाम तो कैसे रुके वारदात

Manish murder case: If only the tainted policemen are defaming the department, then how did the incident stop? #NayaLook

ए अहमद सौदागर

लखनऊ। मुख्यमंत्री से लेकर पुलिस महानिदेशक मुकुल गोयल के तमाम दावों के बावजूद अधीनस्थ बेलगाम साबित हो रहे हैं।
नतीजतन पुलिस विभाग के दागी ही उसके लिए मुसीबत बने हुए हैं। कोई फर्जी एनकाउंटर कर अपनी वाहवाही लूटने की होड़ में रहा तो कोई कारोबारी के यहां करोड़ों की डकैती डाल बहुत जल्द करोड़पति बनने की चाहत की तो किसी ने कानून की बलि चढ़ाते हुए कारोबारी को ही पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया। यही नहीं अपनी प्रेमिका की चाहत में मासूम बच्चे को भी नहीं बख्शा और भाड़े के शूटरों से मरवा दिया।

पुलिसिया हनक और खनक पर एक नजर

27 सितंबर 2021 की रात कानपुर निवासी कारोबारी मनीष गुप्ता की गोरखपुर जिले में स्थित होटल कृष्ण पैलेस में पीट-पीटकर बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। होटल में कारोबारी की मौत होने की खबर दूसरे दिन आग की तरह फैली गई। बाद में लोगों को जानकारी हुई कि मनीष गुप्ता की जान किसी पेशेवर अपराधी नहीं बल्कि गोरखपुर में तैनात इंस्पेक्टर जगत नारायण सिंह, दरोगा अक्षय कुमार मिश्रा, दरोगा विजय यादव, दरोगा राहुल दुबे, हेड कांस्टेबल कमलेश सिंह यादव और कांस्टेबल प्रशांत सिंह ने मारा। इस मामले की जांच एसआईटी टीम ने गहनता से छानबीन की तो आतंक का पर्याय बने दागी पुलिसकर्मियों के कारनामों की परतें खुलती गई और वे गुनाहगार में शामिल हो गए।

मनीष गुप्ता हत्याकांड में जैसे ही खबर में दर्शाए गए पुलिसकर्मियों का नाम उजागर हुआ तो मानो एक सूचीबद्ध अपराधी की तरह सलाखों के जाने का डर सताने लगा और वे भाग निकले। मनीष गुप्ता की हत्या के आरोपी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस अफसरों ने पहले 25 – 25 हजार रुपए इनाम घोषित किया गया था। कानपुर जनपद की पुलिस की टीमें फरार चल रहे दागी पुलिसकर्मियों की खोज में कई तरह के हथकंडे अपनाए, लेकिन वे खुद की बिरादरी के हाथ नहीं लग सके। जब दागी पुलिसकर्मी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ पाए तो शनिवार को पुलिस कमिश्नर ने इनाम की राशि बढ़ाकर एक- एक लाख रुपए कर दी। वहीं फरार दागी पुलिसकर्मियों के बारे में जानकारी देने की भी अपील करते हुए कहा गया कि सूचना देने वाले शख्स का नाम गोपनीय रखा जायेगा।

इससे पहले भी कई पुलिसकर्मी खाकी वर्दी पर दाग लगा चुके हैं

करीब चार दशक पहले मूड़ कर नज़र डालें तो गोंडा जिले के माधवपुर में 12 मार्च 1982 की रात्रि में एक घटना हुई, जहां पर फर्जी मुठभेड़ दिखाकर सीओ व 12 ग्रामीणों की हत्या कर दी गई थी। उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई ने 24 फरवरी 1984 को मुकदमा दर्ज कर 19 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध 28 दिसंबर 1989 को अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था। सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा कि ग्रामीणों की आरबी सरोज व दीवान राम नायक पांडेय एवं सिपाही राम करन यादव ने की है। इसी आधार को मानते हुए अदालत ने तीनों आरोपियों को मृत्युदंड दिया। सीबीआई की जांच में पता चला कि सीओ केपी सिंह की हत्या एसओ कौड़िया ने की थी। कहने का तात्पर्य यह है कि मनीष गुप्ता हत्याकांड में ही नहीं बहुत पहले से दागी पुलिसकर्मी पुलिस महकमे को बदनाम करते चले आ रहे हैं।

किसी अपनी वाहवाही लूटने के लिए अपने ही अफसर को मार डाला तो किसी ने चंद रुपयों के खातिर कारोबारी को मौत की नींद सुला दिया। कहावत नहीं बल्कि हकीकत है कि चाहे गुनाह कोई कितना भी कर ले उसे एक न एक दिन सजा जरूर मिलेगी। ऐसा ही हुआ 31 साल बाद गोंडा जिले के माधवपुर गांव में फर्जी पुलिस मुठभेड़ दिखाकर सीओ केपी सिंह एवं 12 निर्दोष ग्रामीणों की हत्या करने के आरोप में दोषी ठहराए गए तत्कालीन थानाध्यक्ष कौड़िया आरबी सिंह सरोज, सिपाही राम करन यादव व दीवान राम नायक पांडेय को अदालत ने फांसी की सज़ा सुनाई थी। कानपुर निवासी कारोबारी मनीष गुप्ता हत्याकांड ने एक बार फिर पुराने जख्मों को ताजा कर दिया। चंद रुपयों की लालच में आकर अवैध वसूली और मारपीट कर मौत की नींद सुलाने का चलन फिलहाल बड़ा पुराना है।

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