Raj Dharm UP

चुनावी आंच में खुलेंगी किसान आंदोलन की गांठें !

The knots of the farmer's movement will open in the election flame!#naya look news

अनिल उपाध्याय

लखनऊ। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 जनवरी 2021 को किसान संगठनों से कहा था कि केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर अगर किसान नेता चर्चा करना चाहते हैं तो मैं बस एक फोन कॉल दूर हूँ। सवाल यहीं पर फंसा है कि पहले फोन उठाकर कॉल कौन करेगा? सरकार की तरफ से अब तक ऐसी कोई पहल नहीं हो रही है और ऐसे में किसान भी डटे हुए हैं। यह स्थिति तब है जब किसान आंदोलन यूपी के पंचायत चुनाव में बीजेपी का बड़ा नुकसान दे चुका है। सिर्फ यूपी में ही नहीं बल्कि किसान आंदोलन की वजह से ही बीजेपी को पंजाब और हरियाणा में भी बड़ा राजनीतिक नुक़सान उठाना पड़ा है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या सरकार किसानों की नाराजगी दूर कर पाएगी ।

चुनावी वक्त में नतीजे की उम्मीद

बहरहाल पं बंगाल में बीजेपी की हार से भी आंदोलित किसान उत्साहित है। सरकार पर दबाव बनाने के लिए किसान आंदोलन तेज करने की बात कही जा रही है। किसान सरकार की नब्ज जानने लगा है। वह समझ गया है कि जिस दिन सरकार को किसान आंदोलन से सत्ता दरकने का खतरा लग जाएगा उस दिन इस समस्या का समाधान निकल जाएगा। शायद यही कारण है किसानों ने साफ-साफ कह दिया है कि उनकी तैयारी 2024 तक की। ऐसे में अब देखने वाली तो यह है कि सरकार किसान मुद्दे पर करती क्या है ।

सरकार की कोशिशें

ये सवाल इसलिए भी प्रासंगिक हो गया है क्योकि पिछले दिनों सरकार ने खरीफ़ सत्र की फ़सलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का एलान किया है। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके यह भी कहा कि फ़सलों का दाम बढ़ने से किसानों की आमदनी बढ़ेगी और जीवन स्तर बेहतर होगा। इसके अलावा दालों, तिलहन और मक्का के रेट भी बढ़ाए हैं। कपास की एमएसपी में 211 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है। सबसे कम बढ़ोतरी मक्का के लिए 1.08 प्रतिशत की है तो सबसे अधिक वृद्धि तिल की फ़सल के लिए की गई है जो 6.5 प्रतिशत है।

अगर प्रतिशत के लिहाज़ से देखें तो कपास के लिए एमएसपी 3.8 प्रतिशत जबकि धान के लिए 3.85 प्रतिशत बढ़ाई गई है। ऐसे में इसे एक बेहतर शुरूआत कहा जा रहा है पर किसान इसको लेकर बहुत उत्साहित नहीं है। किसान संगठन इसे किसानों के साथ मज़ाक़ बता रहे हैं। बीबीसी के मुताबिक कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि ये हर साल होने वाली सामान्य एक बढोत्तरी है और यह किसानों की ज़रूरतों के हिसाब से बहुत कम है।

चाहिए फसलों बिकने की गारंटी

किसान आंदोलन के नेता भी एमएसपी में इस बढ़ोतरी को किसानों के साथ मज़ाक़ बता रहे हैं। किसानों का कहना है कि पिछले एक साल की महंगाई दर को ही देखें तो वो सात प्रतिशत के आसपास है। ऐसे में फ़सलों के दाम तीन-साढ़े तीन प्रतिशत बढ़ाना अगर मज़ाक़ नहीं है तो क्या है? बीबीसी के मुताबिक कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का मानना है कि बढ़ाई गई एमएसपी से किसानों को कोई वास्तविक लाभ नहीं होना है। वह कहते हैं एक तो यह बढ़ोत्तरी बहुत कम है और दूसरी तरफ़ किसानों के पास एमएसपी पर फ़सल बेचने की गारंटी नहीं है।

किसानों को साधने की कवायद

किसान नेता राजिंदर सिंह का कहना कि आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार दबाव में है क्योंकि इस आंदोलन ने कारण उसे राजनीतिक नुक़सान पहुंचना शुरू हो गया है। वे तर्क देते हुए कहते हैं कि उदाहरण के तौर पर सरकार ने डीएपी की बोरी पर सरकार ने 700 रुपये क़ीमत बढ़ाई थी। किसानों आंदोलन कारण ही सरकार को ये बढ़ोतरी वापस लेनी पड़ी। ये आंदोलन का दबाव ही था कि कॉर्पोरेट के साथ खड़ी सरकार को पौने पंद्रह सौ करोड़ रुपये की सब्सिडी और देनी पड़ी।

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वे कहते हैं ये किसान आंदोलन की ही ताकत थी कि बीजेपी को किसान आंदोलन की वजह से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में राजनीतिक नुक़सान उठाना पड़ा है। वहीं सुधीर पंवार कहते हैं, किसान आंदोलन का ही असर है कि इस साल सरकार ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एमएसपी पर गेहूं की फ़सल की अच्छी ख़रीद की है। एमएसपी बढ़ाने को सरकार की किसानों को साधने की कोशिश के तौर पर भी देखा जाता है। चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में किसान बड़ा वोट बैंक हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार किसानों को रिझाने के प्रयास कर सकती है।

यूपी में गन्ना बकाया बड़ा मुद्दा

वहीं किसानों का कहना है कि पंचायत चुनाव में करारी हार मिलने के बाद भी यूपी सरकार गन्ना बकाए भुगतान की बात नही कर रही है। लगता है कि योगी सरकार ने सोच लिया है कि किसानों से किसी दूसरे मुद्दे पर वोट लिया जाएगा। शायद यही कारण हैं कि सरकार ने गन्ना का किसानों का तेरह हज़ार करोड़ रुपये अभी तक नहीं चुकाए हैं। साफ है कि राजनैतिक नुकसान के बाद है कि किसानों को साधने की सरकार की नीति में किसानों को लाभ पहुंचाना नहीं है। शायद सरकार किसानों का वोट हासिल करने के लिए किसी और रणनीति पर काम कर रही होगी।

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