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आधुनिक भारत का वैज्ञानिक आर्किटेक्ट प्रोफेसर मेनन

Professor Menon, Scientific Architect of Modern India#Naya look news

एसडी मिश्र

नई दिल्ली। हिन्दुस्तान में एक से बढ़कर एक महारथी हुए हैं। चाहे जो भी क्षेत्र चाहे वह चिकित्सा, राजनीति, विज्ञान या फिर इंडस्ट्री और एजूकेशन हो हर क्षेत्र में भारतीयों ने पूरे विश्व में अपना परचम लहराया है। किसी ने भारत में रहकर तो किसी ने विदेशी धरती से भारत का नाम रोशन किया है। ऐसे ही एक वैज्ञानिक जो अब हमारे बीच नहीं हैं, ने देशसेवा के संकल्प के साथ विज्ञान के क्षेत्र में भारत को उस बिरादरी में लाकर खड़ा कर दिया जो असंभव तो नहीं लेकिन मुश्किल बहुत था। उन्ही के प्रयासों का फल रहा है कि भारत आज अमेरिका, चीन और रूस की भांति अंतरिक्ष में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराए हुए है। वह और कोई नहीं बल्कि हमारे देश के सुप्रसिद्घ वैज्ञानिक एमजीके मेनन थे। बीते दिनों २२ नवंबर को ८८ साल की अवस्था में नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।

२८ अगस्त १९२८ को गुलाम भारत के मैंगलौर में जन्मे विज्ञान के इस अद्ïभुत शहंशाह के बारे में किसी को उस समय खबर नहीं थी कि यह बच्चा एक दिन अपने हुनर से पूरी दुनिया को जीत लेगा। किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि लॉयर और जज की फैमिली में जन्म लेने वाला यह बच्चा अपने परिवार से इतर खुद अपना नया मुकाम हासिल कर लेगा लेकिन कहा जाता है कि होनहार वीरवान के होत चीकने पात। बचपन से सुख-सुविधाओं के बीच पले-बढ़े मेमन को क्या आवश्यकता थी कि वह अपने पिता के जज पेशे से इतर विज्ञान का क्षेत्र अपनाते। वह भी लॉ की पढ़ाई करते और किसी कोर्ट में प्रैक्टिस करके ग्लैमर और हनक की दुनिया में कदम रख सकते थे। उनके पिता किझेकापत मेमन उस समय डिस्ट्रिक जज थे। लेकिन वह तो हिन्दुस्तान का परचम विश्व पटल पर लहराने के लिए ही जन्मे थे।

बचपन से ही कुशाग्र बुद्घि के मामबिल्लीकालाथिल गोविंद मेमन यानी एमजीके मेमन ने १९४२ में पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिकुलेशन और जसवंत कॉलेज, जोधपुर से १९४६ में बीएससी की पढ़ाई पूरी की। वैज्ञानिक सीवी रमन को अपना गुरु मानने वाले मेनन ने मुंबई के रॉयल इंस्टीट्ïयूट ऑफ साइंस से एमएससी किया और फिर अपने आपको को विज्ञान के लिए समर्पित कर दिया। MSC करने के बाद उन्होंने ब्रिस्टल में सेसिल ग्रुप ज्वाइन किया और कॉस्मिक किरणों पर महत्वपूर्ण खोजें कीं। साल १९५५ में प्रसिद्घ वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा के बुलावे पर मेनन आजाद भारत में लौट आए तथा भाभा की संस्था टाटा इंस्टीट्ïयूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च को ज्वाइन कर लिया।

संस्था में वह उस टीम के मुख्य हिस्सा बन गए जो कॉस्मि किरणों पर रिसर्च कर रही थी। बाद में उन्होंने कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों में अपना योगदान दिया। भारत को आजादी के बाद वैज्ञानिक क्षेत्र में मजबूत स्थिति में खड़ा करने का श्रेय भी इन्ही को ही जाता है। उनके इसी योगदान के कारण पद्ïम विभूषण और पद्य पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से उन्हे सम्मानित किया गया। भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सबसे ज्यादा बढ़ावा तब मिला जब उन्हे वीपी सिंह की सरकार में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री के रूप में काम करने का अवसर मिला।

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उनकी कुशग्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह सिर्फ ३५ वर्ष की उम्र में ही टाटा इंस्टीट्ïयूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के निदेशक बना दिए गए। यही नहीं साल 1972 में वह भारतीय अंतरिक्ष शोध संगठन के अध्यक्ष भी बनाए गए। मेनन को साल १९८२ से १९८९ तक योजना आयोग के सदस्य के रूप में भी काम करने का अवसर मिला और इस दौरान उन्होंने देश में विज्ञान को बढ़ावा देने वाली कई योजनाओं को मूर्तरूप दिलाने में अपना अमूल्य योगदान दिया। वह १९८९ से १९९० तक प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे। १९९० से १९९६ तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे।

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