Delhi

गो-हत्या कानून के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट सख्त, सीतापुर पुलिस को लगायी फटकार SP से मांगा जवाब

High court strict on misuse of cow slaughter law, reprimanded Sitapur police, sought reply from SP#naya look news#naya look news

मांस की फॉरेंसिक जांच कराए बिना पुलिस बता देती है गोमांस

बरामद मांस का कोई रिकवरी मेमो तक तैयार नहीं करती पुलिस

नई दिल्ली। क्या पुलिस किसी के खिलाफ भी गो हत्या पर महज इस आधार पर FIR दर्ज करा सकती है कि उसने आरोपियों से ऐसी बात सुनी है? सीतापुर पुलिस ने ऐसा ही हैरान करने वाला काम किया है। इस पर गो-हत्या कानून के मनमाने इस्तेमाल को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने ऐसे ही एक मामले में सुनवाई के दौरान सीतापुर पुलिस को जमकर फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने सीतापुर पुलिस अधीक्षक से दो हफ्तों के भीतर जवाब मांगा कि आखिर क्यों इस मामले में गोहत्या कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है? इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक जस्टिस अब्दुल मोई की पीठ सूरज नामक एक व्यक्ति की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

उसके खिलाफ 25 फरवरी को सीतापुर पुलिस ने उत्तर प्रदेश गोहत्या संरक्षण कानून की धारा तीन और आठ के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस ने इस मामले में तीन अन्य इब्राहिम, अनीश और शहजाद के खिलाफ भी इसी मामले में FIR दर्ज की थी। यहां सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि पुलिस के खिलाफ गाय की हत्या करने का कोई साक्ष्य नहीं है। पुलिस ने यह FIR महज इस आधार इस आधार पर FIR दायर की गई थी कि पुलिस ने आरोपियों को ये कहते हुए सुना है कि उन्होंने गाय के तीन बच्चों को मारा है। पुलिस की थ्योरी है कि इस मामले की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने उन्हें झाड़ियों में आपस में बात करते हुए सुना था कि उन्होंने तीन बछड़ों को मार डाला है। पुलिन ने यह भी सुना कि इसके एवज भी उन्हें बहुत पैसा भी मिला है, अब दो बैलों को भी मारने की योजना बनाई गई है।

द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस FIR के बाद सीतापुर पुलिस के वरिष्ठ सब इंस्पेक्टर दीपक कुमार पांडे ने चार लोगों को गिरफ्तार किया और दो बैल, एक रस्सी का एक बंडल, एक हथौड़ा, एक गंड़ासा (छोटा), एक गंड़ासा (बड़ा), एक कील और 5-5 किलो के 12 खाली पैकेट आरोपी के कब्जे से बरामद किया गया है। इस मामले में सूरज के वकील ने कहा कि ‘महज इस तरह के सामान प्राप्त करने से गोहत्या कानून के तहत मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। इसके जवाब मे पुलिस की दलील थी कि चूंकि इस तरह के सामान बरामद किए गए, इसलिए इस बात की आशंका थी कि आरोपी बैल को काटने की तैयारी में थे। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर को पढ़ने से ये स्पष्ट हो जाता है कि न तो बैल की हत्या की गई थी और न ही उसे किसी तरह की चोट पहुंचाई गई है।

हाईकोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा कि पुलिस ने सिर्फ इस आधार पर एफआईआर दर्ज कर लिया कि उन्होंने आरोपियों के बीच कथित तौर पर गोहत्या के बारे में बातचीत सुना था। कोर्ट ने कहा कि आरोपियों के पास से सिर्फ दो बैल और अन्य सामान प्राप्त करने से गोहत्या कानून के तहत मामला नहीं बनता है। याचिकाकर्ता को ढाई महीने से भी ज्यादा वक्त तक उस आरोप में जेल में रहना पड़ा है, जो प्रथम दृष्टया उन्होंने किया ही नहीं था। इन दलीलों के आधार पर कोर्ट ने आरोपी को जमानत दे दी और सीतापुर पुलिस से अधीक्षक से दो हफ्तों के भीतर जवाब मांगा कि आखिर क्यों इस मामले में गोहत्या कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है? इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के गोहत्या संरक्षण कानून के मामलों में पुलिस द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इस कानून का दुरपयोग राज्य में निर्दोष लोगों के खिलाफ किया जा रहा है।

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अदालत ने कहा था कि जब भी कोई मांस बरामद होता है तो फॉरेंसिक लैब में जांच कराए बिना उसे गोमांस करार दे दिया जाता है। अधिकतर मामलों में बरामद मांस को जांच के लिए लैब नहीं भेजा जाता। इस दौरान आरोपी को उस अपराध के लिए जेल में जाना होता है, जो उसने नहीं किया होता और जिसमें सात साल तक की सजा है। इस पर प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट को विचार किया द्वारा किया जाता है। अदालत ने यह भी जोड़ा था, ‘जब भी कोई मांस बरामद होता है, उसका कोई रिकवरी मेमो तैयार नहीं किया जाता और किसी को पता नहीं होता कि बरामदगी के बाद उसे कहां ले जाया जाएगा। बता दें कि उत्तर प्रदेश गोहत्या संरक्षण कानून के तहत राज्य में गोवंश हत्या निषेध है। इसका उल्लंघन करने पर दस साल सश्रम कारावास और पांच लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है।

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