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साढ़े 7 करोड़ का घोड़ा खरीद कर  6 साल पहले चर्चा में आ चुके हैं अदार पूनावाला

Adar Poonawalla has come into the limelight 6 years ago by buying a horse worth 7 and a half crores # Naya Look News

रंजन कुमार सिंह


भारत में कोरोना वायरस की वैक्सीन को लेकर सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला चर्चा में हैं, उनकी कंपनी ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनिका की वैक्सीन ‘कोविशील्ड’ बना रही है, जिसे स्वदेशी भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के साथ आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी मिली है। भारत में  अभी भी अधिकतर लोग कोविशीलड का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि कोवैक्सीन और जापानी स्पूतनिक भी आ गया है, लेकिन कोविशिलड का डिमांड अभी भी बना हुआ है। सिरम इंस्टीट्यूट के मालिक अदार पूनावाला की जितनी चर्चा वैक्सीन को लेकर है उससे कहीं अधिक चर्चा उनके लग्जरियस और परिवारिक लाइफ को लेकर  है।

 पहली बार 2015 में आए थे चर्चा में

बात दो साल पहले की है, घोड़े के रेस के शौकीन पूनावाला को एक घोड़ा पेरिस में बेहद पसंद आया। उसकी बोली 7.5 करोड़ रु0 तक लगी और पूनावाला ने उसे खरीद लिया। उनका स्टड फार्म पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। वे विदेश में भी रेसिंग करते हैं, इसके लिए बाकायदा कंपनी बनाई, जिसके लिए रिजर्व बैंक से अनुमति भी ली गई।

कई होटल के मालिक भी हैं,

रेस के अलावा उनको होटल खरीदने का भी शौक है और वैक्सीन बनाने में देश में उनकी कंपनी अग्रणी है, उनकी सेरम इंस्टीट्यूट दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन बनाने वाली कंपनी है। योरप में वैक्सीन की मार्केटिंग के लिए उन्होंने सिप्ला के यूसुफ हामिद से हाथ मिलाया था। पुणे के रिट्ज कार्लटन और मालदीव के बलगारी होटल में उनका ही पैसा लगा हुआ है। लंदन की ग्रॉसवेनर होटल जो सुब्रत राय की है, उसके लिए भी पूनावाला ने बोली लगाई थी। अदार पुणावाला इस तरह की चीजों पर निगाह रखते हैं। लिंकन हाउस अमेरिकी महावाणिज्य दूतावास की संपत्ति है, जो उन्होंने अमेरिकी सरकार से खरीदा है, यह देश की सबसे बड़ी रीयल इस्टेट डील है।

1966 में शुरू हुआ था  सिरम इंस्टीट्यूट

बिल गेट्स जब 2013 में भारत आए थे तो पूनावाला के साथ उन्होंने डिनर किया था। बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन उनके सीरम इंस्टीट्यूट को पूरा समर्थन देता है। वे पोलियो के लिए भी इंजेक्टेबल वैक्सीन तैयार कर रहे हैं, क्योंकि ओरल ड्रॉप में वायरस होने का खतरा रहता है। साथ ही वे सस्ते वैक्सीन बनाने में विश्वास रखते हैं,उन्होंने स्पेसिफिक एंटी टॉक्सिन निर्माण पर पीएचडी की है,पूनावाला  के पिता ने ही सीरम को 1966 में बनाया था। वे कहते हैं कि जब वे 22 साल के थे, तभी से भाई जावरी के साथ वैक्सीन बनाने लगे थे। यह इंस्टीट्यूट संयुक्त राष्ट्र चिल्ड्रन फंड में अपने वैक्सीन की सप्लाई करता है। 2005 में पूनावाला ग्रुप 750 करोड़ रु0 का था। स्टड फार्म 1946 में उनके पिता ने शुरू किया था। एक और शौक उन्हें विंटेज कारों का है।

घोड़े के कारोबार से आए वैक्सीन व्यवसाय में

आज उन्हें पूरी दुनियां में वैक्सीन उद्योग के बादशाह के नाम से जाना जाता है। बीबीसी की खबर के अनुसार पूनावाला का परिवार ब्रिटिश राज के दौरान 19वीं शताब्दी में पुणे आया था। उस वक्त कई पारसी परिवार ब्रिटिशों के शासन के दौरान भारत में बसे और प्रशासन से लेकर कारोबार तक की दुनिया में स्थापित हुए। पारसी परिवार के नाम पर उनके रहने वाले शहरों के नाम झलकते हैं। जैसे अदार के परिवार का नाम पूनावाला पड़ा।

देश आजाद होने से पहले यह परिवार कंस्ट्रक्शन के कारोबार में था। लेकिन उससे ज्यादा इनका नाम घोड़ों के व्यापार से हुआ। आज भी लोग इन्हें घोड़ो के व्यापार के नाम से जानते हैं। यह घोड़ों का व्यापार अदार के दादा सोली पूनावाला ने शुरू किया था। उन्होंने घुड़साल बनाया जिसमें उन्नत किस्म के घोड़ो को रेस के लिए तैयार किया जाता था। ब्रिटिश अधिकारी बड़े उद्योगपतियों से इस परिवार का रिश्ता घोड़ो के व्यापार के जरिए ही बना था। पूनावाला साम्राज्य की नींव भी इसी कारोबार से बनी थी।

ऐसे हुई वैक्सीन कारोबार की शुरुआत

सवाल ये है कि घोड़ो के कारोबार के बाद आज यहां वैक्सीन बनाने वाली सीरम इंस्टीट्यूट की शुरुआत कैसे हुई? असल में इसके तार भी घोड़ों के व्यापार से ही जुड़े हुए हैं। अदार के पिता सायरस ने जब घोड़ों के व्यापार को बढ़ाने के बारे में सोचा तो उनका ध्यान एक ऐसी इंडस्ट्री पर गया जिसके बारे में ज्यादा जानकारी मौजूद नहीं थी और न ही इसके सफल होनी की जिम्मेदारी ले सकता था। बड़ा जोखिम होने के बाद भी सायरस ने यह कदम उठाया और वैक्सीन बनाने के कारोबार में कदम रखा। यह वह दौर था जब भारत में सीमित स्तर पर वैक्सीन का उत्पादन होता था। उसमें भी पहले सरकार की भूमिका ज्यादा होती थी। पूनावाला के घोड़े के व्यापार में जो बूढ़े घोड़े होते थे। उनका उपयोग सर्पदंश और टिटनेस का टीका बनाने में किया जाता था।

 एक डॉक्टर की सलाह पर आए वैक्सीन इंडस्ट्री में

सायरस पूनावाला ने एक इंटरव्यू में बताया कि हमलोग अपने घोड़ों को मुंबई के हाफकिन इंस्टीट्यूट को दिया करते थे। वहां के एक डॉक्टर ने मुझे बताया कि आपके पास घोड़े है, जमीन है। अगर आप वैक्सीन उत्पादन में आना चाहते हैं तो आपको केवल एक प्लांट स्थापित करना पड़ेगा। इस सलाह में उन्होंने नई इंडस्ट्री के लिए अवसर देखा और 1966 में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की स्थापना कर दी।

यह उस वक्त की बात है जब भारत सहित दुनिया भर में संक्रमण बीमारियों के खिलाफ सरकारें टीकाकरण अभियान चला रही थी। जल्द ही सीरम इंस्टीट्यूट ने कई बीमारियों के लिए वैक्सीन का उत्पादन शुरू कर दिया। सामाजिक स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रम, मसलन टीकाकरण भी सरकार के हाथों में है। ऐसे में सरकारी प्रवधानों और अवरोधों का सामना सीरम को भी करना पड़ा। सायरस पूनावाला ने एक इंटरव्यू में बताया कि कई तरह के परमिट हासिल करने होते थे।

उसमें महीनों और सालों लगते थे। पहले 25 साल तो काफी मुश्किल भरे रहे। इसके बाद हमारी आर्थिक स्थिति बेहतर हुई।सायरस के समय में ही सीरम इंस्टीट्यूट का वैक्सीन उत्पादन में प्रभुत्व स्थापित हो गया। वह उस वक्त से ही दुनिया के कई देशो में वैक्सीन की मांग को पूरा करने लगे। जिसके कारण सायरस पूनावाला की गिनती दुनिया के अमीर लोगों में होने लगी। सायरस पूनावाला ने सीरम इंस्टीट्यूट की शुरुआत पांच लाख रुपये से की थी। वहीं फोर्ब्स की लिस्ट के अनुसार दुनिया के 165 वें और भारत के छठवें सबसे अमीर आदमी हैं अदार पूनावाला।

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