Analysis

किसानों और कम्युनिस्टों की जालसाजी

Fraud of peasants and communists

नरेश मिश्र

आज महाभारत की एक कहानी सुनिए। जुए में हारकर पांचों पांडव पहले बारह बरस का वनवास झेल चुके थे। उन्हें एक वर्ष का अज्ञातवास काटना था। वे हिमालय के घने जंगलों में जा छिपे। दुर्योधन अपने गुप्तचरों और सेनापतियों के साथ उनकी तलाश में हिमालय क्षेत्र गया। हिमालय की उत्तरी सीमा से सटे डाकुओं ने दुर्योधन को अचानक पकड़ लिया। भीम तालाब से पानी लेने जा रहे थे। उन्होंने दुर्योधन की दुर्गति अपनी आंखों देखी। वे छिपकर किसी तरह अपने भाइयों के पास पहुंचे। उन्होंने कहा बड़े भइया आज प्रसन्नता का समाचार सुनाता हूं। दुर्योधन को डाकुओं के गिरोह ने पकड़ लिया है। हमारा शत्रु तो बिना मारे ही मर गया। युद्धिष्ठिर ने भीम को फटकारते हुए कहा। तुम्हें ऐसा कलुषित विचार क्यों आया।

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कौरवों के खिलाफ हम पांच भाई हैं। लेकिन विदेशी शत्रुओं के खिलाफ हम 105 हैं। हमें जल्दी से जल्दी दुर्योधन को दस्युओं के पंजे से छुड़ाना चाहिए। पांचों पांडवों ने दस्युओं से लड़कर दुर्योधन को छुड़ा लिया। यह कहानी सुनने में बहुत अच्छी लगती है। लेकिन आज मुल्क की बदहाली देखिए। ताजातरीन खबर यह है कि किसान आंदोलन की साजिश पाकिस्तान में रची जा रही है। पाकिस्तान में रहने वाले खालिस्तानी इस साजिश के सूत्रधार हैं। उसमें पश्चिमी देशों यहां तक कि चीन के करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। अब इन तथाकथित किसान आंदोलनजीवियों को मीठे वचनों से खुश नहीं किया जा सकता। जो साफ नजर आता है उसे खुलकर कहने का वक्त आ गया है।

जो खालिस्तानियों पाकिस्तानियों और चीनियों से मदद लेता है वह गद्दार है। हम उन्हें अन्नदाता नहीं मृत्युदाता कहेंगे। एक कहावत याद आती है। ईश्वर मुझे दोस्तों से बचाए। दुश्मनों से तो मैं खुद ही निपट लूंगा। इस कहावत के समानांतर कहा जा सकता है ईश्वर मुझे देश में मौजूद गद्दारों से बचाए। दुश्मनों से तो मैं खुद ही निपट लूंगा। अब साम्यवादियों का हाल सुनिए। लद्दाख, भूटान और अरुणाचल में चीनी सेनाओं की हलचल बढ़ गई है। चीनी फौज का यह जमावड़ा साम्यवादियों को ठीक लगता है। खबरिया चैनलों पर बैठे कम्युनिस्ट प्रवक्ताओं की बात सुनिए। एक हैं सुनीत चोपड़ा। दूसरे हैं विवेक श्रीवास्तव। दोनों ने कल की बहस में खुलकर चीन का समर्थन किया।

वे अपने बयानों के जरिए दिगंबर हो गए। उन्होंने कपड़े उतार दिए और खुलकर चीन की तरफदारी करते रहे। हमें दूसरे महायुद्ध के दौरान बंगाल के अकाल की याद आती है। एक वामपंथी कवि ने कविता लिखी थी। उसकी कुछ लाइनें मुझे अब भी याद हैं। आप भी सुनिए। प्राची का वह सिंहद्वार सूरज पहले जिस ओर निकलता है। वह आज भूख की ज्वाला से बंगाल चिता सा जलता है। साथी 44 बार जहां भीषण जापानी बम बरसे। हो गए जहां टकराकर कुंठित फासिस्टों के फरसे।। भूख गरीबी, किसान, मजदूर कम्युनिस्टों के नारे हैं। इनके जरिए वे सत्ता की कुर्सी हासिल करते हैं। दूसरे महायुद्ध का इतिहास पलटिए। हिटलर जब तक योरप के देशों को रौंदता रहा तब तक स्टालिन खामोश रहे।

हमारे देश के साम्यवादी नेता भी गांधी के आंदोलन का समर्थन करते रहे। जैसे ही हिटलर ने रूस पर हमला किया हमारे मुल्क के कम्युनिस्ट नेताओं का स्वर बदल गया। वे आंदोलन से दूर होकर ब्रिटिश सरकार की दी सुविधाओं का उपयोग करने लगे और हिटलर को गरियाने लगे। वे रेलवे के वीआईपी सैलूनों में सफर करते और आजादी के आंदोलन का विरोध करते थे। कम्युनिस्टों के लिए धर्म अफीम है। उसे यूं समझना चाहिए कि साम्यवादियों के लिए साम्यवाद जहरीली शराब है। इसका नशा कभी नहीं उतरता। पहले कम्युनिस्टों ने स्टालिन और लेनिन को अपना गुरु बनाया था। अब वे माओ और जिनपिंग के चेले बन गए हैं।  उनकी हुकूमत घने जंगलों और केरल तक सीमित हो गई है। कम्युनिस्टों और किसान आंदोलनजीवियों की करनी देखकर मुल्क भौंचक है।

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