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Rohit Sardana : कद छोटा लेकिन बड़े-बड़े कद्दावरों से अपनी तर्कबुद्धि के बूते टकराने वाला योद्धा

Rohit Sardana: A tall but tall warrior who struggles with big arguments

राकेश उपाध्याय
         राकेश उपाध्याय

 

नई दिल्ली। कोरोना ने हिन्दी टेलीविजन जगत का एक लोकप्रिय चेहरा हमसे छीन लिया। रोहित सरदाना का अचानक चले जाना टीवी जगत में एक बड़ी रिक्तता छोड़ गया जिसकी पूर्ति असंभव है। मेरा रोहित जी से बीते 14 साल से गहरा संबंध रहा। दो रोटी और आबोदाने की तलाश करते करते वाराणसी से दिल्ली के सफर में जिंदगी पर जब बहुत सारी धूल जमा हो गई थी, तो जिन कुछ लोगों ने चेहरे पर से धूल साफ की, उसे टेलीविजन के लायक बनाया, उनमें रोहित सरदाना भी थे। इसलिए उनकी स्मृति सदैव मन पर चिरकाल तक अंकित रहेगी।

रोहित के दिलो-दिमाग में तर्कों का विशाल और गहरा समुद्र तैरता था, कद में छोटे थे लेकिन बड़े बड़े कद्दावरों से अपनी तर्कबुद्धि और लोगों की भावना को समझकर टकरा जाने से परहेज नहीं करते थे। ठेठ हरियाणवी अंदाज था उनके पास जो कुरुक्षेत्र की मिट्टी का स्पर्श पाकर बड़े बड़े सियासी महाभारत में जनता की ओर से मोर्चा संभालने के लिए उन्हें संजय जैसी सूक्ष्म और पारखी दृष्टि देता था। दूध का दूध और पानी का पानी कर डालते थे, छद्म सेक्युलर खांचे में फिट होकर जब भारत की टीवी पत्रकारिता अपना धर्म भूल गई थी, तब रोहित सरदाना ने मोर्चा संभालकर भारत की टीवी पत्रकारिता को भारत की आत्मा से जोड़ने का साहसपूर्ण कारनामा कर दिखाया।

एक निर्भीक चेहरा, एक स्कंधावर जंगजू, सियासत के दंगल का अप्रतिम अपराजेय अक्षर-सम्राट। असमय ही टीवी पत्रकारिता के भाल से यह अक्षर अक्षत झर गया। परमात्मा उन्हें शरण लेंगे, यही प्रार्थना है। हरियाणवी तेवर में रची-बसी उनकी खड़ी हिन्दी उनकी जिह्वा पर तलवार की तरह धारदार और कठोर तेवर में जब ऊपर चढ़ती थी, तो फिर बहस में सामने खड़े बड़े बड़े कद्दावरों का पानी उतारकर ही दम लेती थी।

वह पूरी तैयारी से अपने शो में उतरते थे। पूरा शोध, पूरे सवाल और मुकम्मल बहस की पूरी स्क्रिप्ट में अंतिम समय बोले जाने वाले प्रभावी शब्दों के चुटीले संदेश लेकर वह स्क्रीन पर उतरते थे। जी न्यूज में मैं इलेक्शन डेस्क संभालता था, और ज्यादातर चुनावी बहसों में संबंधित विषय का वह पूरा विश्लेषण और सवालों का चिट्ठा मुझसे ईमेल पर लेकर ही आगे बढ़ते थे। उन्हें सवाल थमाना मेरा काम था, सवालों को कब कहां और कैसे तीर-तलवार की तरह आजमाना है, ये उनकी तर्क और तेवर वाली विश्लेषणात्मक बुद्धि का कमाल था।

इसलिए दूसरा रोहित सरदाना मिलना असंभव है। जितना सवालों में चुटीले, उतनी ही धारदार पैनी लेखनी। वह पैकेज की स्क्रिप्ट के भी बड़े माहिर खिलाड़ी थे। कम्प्यूटर पर बिजली की गति से तड़-तड़ शब्दों की बरसात करते जाना उन्हें आता था। इसके लिए उन्होंने बहुत पहले से तपस्या की थी जिसका परिणाम था कि उनकी लेखनी मुद्दे पर केंद्रित, संतुलित और खबर के सबसे गहरे बिन्दु पर कम शब्दों में प्रबल वार करने में सक्षम थी। साल 2007 में आजतक से ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जब एक प्रशिक्षु के रूप में नया नया 2008 में मैं जी न्यूज गया था, तब उनकी बहुमुखी प्रतिभा से मेरा गहराई से परिचय आया। चमकीली आंखें, उज्जवल चेहरा, स्मार्ट और बिल्कुल फिट कदकाठी। मानो टेलीविजन स्क्रीन के लिए ही इस शरीर और तेजस्वी मुखमंंडल को ईश्वर ने गढ़ा हो।

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और उतने ही खुशमिजाज इंसान, चुटीले व्यंग्य और चुटकुलों से सबको हंसा देने वाले वह किसी भी न्यूज रूम को तनाव से मुक्त रखने वाले बेहतरीन इंसान थे। अपने काम के पक्के और अनुशासन में अव्वल। एक बार जीन्यूज के आउटपुट इंचार्ज किसी बात पर नाराज हुए, दोष जिसका भी रहा हो, मैंने अपनी आंखों से देखा, रोहित जी ने बगैर देरी किए दीप जी से धीमे स्वर में कहा-बॉस आप नहीं थे, मैं था यहां इस प्रोग्राम का इंचार्ज, इसलिए मैं जिम्मेदार हूं, किसी और को वह दोष देना पसंद नहीं करते थे, स्वयं मेहनत करते और स्वयं जिम्मेदारी लेते। यादों की पोटली आज एक एककर सामने आती है, कोई संकलित करेगा तो उसे विस्तार से लिखा जाएगा।

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आज दुख की इस घड़ी में एक सवाल मेरे मन में आता है, मेरा मित्र न्यूज रूम की छोटी सी गलती की जिम्मेदारी उठाने में कभी पीछे नहीं रहा, जो जिम्मेदारी उसे मिली, उसे निभाने में कभी पीछे नहीं रहा, किन्तु आज जब वह नहीं है तो उसके अचानक असमय बिछुड़ जाने और परिवार को बिलखता अकेला छोड़ जाने की जिम्मेदारी स्वीकार कर सकने वाला उत्तरदायी क्या कोई नहीं है? रोहित जी की स्मृति को शत नमन और शत श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

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