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राजतंत्र और लोकतंत्र की खिचड़ी

बीकेमणि

जो अनीति कहुं भाषौ भाई। तौ मोहिं बरजेउ भय बिसराई।।

रामराज की कल्पना ही सुशासन की कल्पना है। जिसमे राजा प्रजा को भगवान समझती थी और प्रजा राजा को श्रद्धा प्रदान करती थी । उसका राजा के न्याय पर पूर्ण भरोसा होता था। राजा स्वयं विद्वानों से और समाज के हर वर्ग के लोगों से राय मशविरा करके ही निर्णय लेता था। चाटुकारों से घिरा राजा कभी लोकप्रिय नही़ रहा,यह इतिहास का अवलोकन कर देख लें। संत विनोबा भावे बहुमत के पक्ष में कभी नहीं रहे। उनका सर्वसम्मति को ही मानने का पक्ष रहा।

उनका कहना था कि निन्यानबे अंधे यदि हाथी को सफेद कहें तो एक ही व्यक्ति आंख वाला हो तो वह हाथी को काला कहेगा, क्योंकि सिर्फ उसने हाथी को देखा है। यही एक व्यक्ति सच का सार्थवाह हुआ। सत्य कभी मरता नहीं और असत्य कभी टिकता नहीं । राजा भोज हों या राजा राम… प्रजा की मंशा जानने का हमेशा प्रयत्न करते थे,भले इसके गुप्त रूप से नागरिक भेषभूषा मे उन्हें नगर भ्रमण करना पड़ा हो। वे सभा बुला कर सभी प्रजाजनों से राम मशविरा करते थै और उनका स्पष्ट कथन था कि राजा भी अनीति की बाते़ करे तो उसका विरोध भयमुक्त होकर करना चाहिए।

लोकतंत्र राजतंत्र से पृथक है, लोकतंत्र को इस मामले मे स्वीकारा गया कि राजतंत्र की खामियां दूर होंगी । समाज का छोटा बड़ा हर तबके का आदमी, गैर पढ़ा लिखा और विद्वान ,लेखक पत्रकार ,मालिक और मजदूर ,बड़ा या छोटा काश्तकर ,निर्धन और धनवान सभी प्रतिनिधि बनेंगे तो हर वर्ग की पीड़ा का उन्हें अहसास होगा और उस वर्ग की व्यथा दूर करने की हर संभव कोशिश होगी।

दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति यह हुई की ये प्रतिनिधि समाज के बीच से नहीं दिल्ली की गद्दी से तय होने लगे। जातिगत समीकरणों पर इनका भविष्य तय होने लगा और टिकट बांटने वाले बीच मे अलग गुल खिलाने लगे। ये प्रतिनिधि जनता के होकर भी जनता के नहीं होसके । सबने अपने को राजा समझ लिया। पहले खुद का पेट भरने मे लग गए‌ इन्हों ने न अपनों की सोचा और न जन सामान्य का ही।

यह सिर्फ जीत की गोटी बैठाने लगे। निधियों का स्वार्थ मे उपयोग करने लगे और राजाओं की हूबहू नकल करते हुए सत्ता का इन्होंने भरपूर उपभोग किया। जाते जाते अपने बीबी बच्चों को‌ विरासत सौंपने लगे। और तो और जिनके बीबी बच्चे नही़ थे वह औरस संतानों को उत्तराधिकारी बना कर खूब आर्थिक शोषण करने लगे। लोकतंत्र न राज तंत्र बन सका और लोकतंत्र ही सही मायने मे होसका।

यह तो लोकतंत्र और राजतंत्र की खिचड़ी बन कर रह गया। अब ये ही तथा कथित राजनीतिक सत्ताधारी नया नया कानून बनाने लगे। आरक्षण के महाजाल मे सबको फंसा दिया और अब दूसरों को गालियां देकर उपहास करके स्वय़ को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने लगे और चिरकाल तक सत्ता का स्वप्न देखने लग गए। सत्ता संघर्ष का यह खेल जो आजादी के बाद कुछ ही वर्षों बाद विकृति होकर सामने आया। हमे वृहद् मायाजाल मे उलझाता गया।आज सबसे बड़े लौकतांत्रिक देश की प्रमुख समस्या भ्रष्टाचार बन कर सामने है। जिससे निजात कराने की बजाय… हम नस नस तक उसमे आकंठ डूब चुके है। जिसका विकृत रूप सबके सामने हैं।

 

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