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अफसोस : जलवायु परिवर्तन से बहाली को दूर करने में नाकाम रही दुनिया

जलवायु परिवर्तन इस इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी हकीकत बन चुका है और इसपर शक उठाने वालों के मुंह भी अब सच के सामने बंद हो चुके हैं । औद्योगिक क्रांति के बाद पृथ्वी का औसत तापमान 1.1 डिग्री बढ़ चुका है। जिसका लोगों के जीवन पर व्यापक असर हुआ है, और अगर मौजूदा रुझान इसी तरह से जारी रहे तो इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में  बढ़ोत्तरी 3.4 से 3.9 डिग्री सेल्सियस तक हो सकती है. मानवता के लिए इसके विनाशकारी नतीजे होंगे ।

स्पेन के मैड्रिड शहर में 2 दिसंबर से शुरू हुए वार्षिक यूएन जलवायु सम्मेलन (कॉप-25) से ठीक पहले यह चेतावनी जारी की गई थी। लगातार गर्म हो रही धरती के साथ  टिक-टिक करती घड़ी लगातार हमें विनाश लीला की ओर ले जा  रही है। फिर भी  विश्व नेता यह तय नहीं कर पा रहे कि वह इस संकट से कैसे निबटें। आधुनिकता की दौड़ में फंसी दुनिया शायद अपने एशो-आराम को त्यागना नहीं चाहती लेकिन यह एक विरोधाभास ही है कि ग्लोबल वॉर्मिंग पर विश्व मंच में विकासशील देशों के लिये वकालत करता भारत वायु प्रदूषण की समस्या पर देश के भीतर आंख चुरा रहा है।

फिर भी स्पेन के मेड्रिड में जलवायु परिवर्तन वार्ता (COP-25) के पहले हफ्ते कुछ खास हासिल नहीं हो सका । भारत जैसे देशों के लिये जहां इस सम्मेलन में अपने हितों के लिये लड़ने की ज़िम्मेदारी है खासतौर से तब जब देश के भीतर सूखे, बाढ़ और लू के थपेड़ों से उपजी समस्याओं के साथ बदहाल जीडीपी का  संकट छाया हो। भारत वैसे उन देशों में गिना जाता है जहां जलवायु परिवर्तन की मार सबसे अधिक पड़नी है। यह अब साफ दिख भी रहा है और जर्जर अर्थव्यवस्था इस संकट से और बदहाल होगी।

इस बीच दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि उबलती धरती पर प्रलय वक़्त से पहले आ सकता है। इसकी वजह यह है कि तापमान वृद्धि को रोकने के लिये जो लक्ष्मण रेखा सुझायी गई है लगता है मानवता उस संकट की और दौड़ लगा रही है। चूंकि सभी विकसित और बड़े विकासशील देश सुधरने को तैयार नहीं हैं और बढ़ते कार्बन इमीशन से तापमान बढ़ता ही जा रहा है इसलिये प्राकृतिक आपदाओं का सैलाब अनुमानित समय से पहले ही आ सकता है।

पिछले एक साल में संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ पैनल IPCC ने कम से कम तीन बड़ी चेतावनियां दी और उसके साथ अन्य संस्थानों के प्रकाशित शोध बताते हैं कि तापमान वृद्धि पर ज़रूरी लगाम नहीं लग रही। अब साइंस पत्रिका नेचर का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर 9 विनाशकारी संकेत दिख रहे हैं। यह संकेत ग्लेशियरों के पिघलने से लेकर, समुद्र सतह में वृद्धि और ध्रुवों में पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने जैसे हैं। लेकिन अब जो नया ख़तरा मंडरा रहा है वह जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी परिणामों का है। हाल ही में जाने माने मेडिकल जर्नल लांसेट ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर पर केन्द्रित किया  है।

इस रिपोर्ट से पता चलता है कि दुनिया भर में 9-10 साल के बच्चों में साल 2000 से डेंगू बुखार का पैटर्न बढ़ रहा है। डायरिया जैसी बीमारियां दोगुनी हो गई हैं। ज़ाहिर है कि बढ़ती उम्र में, अपने विकास के दौरान बच्चों का इम्यून सिस्टम कमज़ोर होता है जो संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए पूरी तरह मज़बूत नहीं होता ऐसे में बढ़ते संक्रामक रोगों की वृद्धि से बच्चे सबसे अधिक पीड़ित होंगे। गौरतलब है कि हैजा की बीमारी के लिए ज़िम्मेदार विब्रियो बैक्टीरिया बढ़ते तापमान के साथ और अधिक पनपने के कारण 1980 के दशक  से भारत में प्रत्येक वर्ष 3% की दर से हैजा की बीमारी बढ़ रही हैं। बदलती जलवायु में डायरिया या हैजे जैसी बीमारियों के बैक्टीरिया आसानी से पनप रहे हैं।

और ज़िन्दा रहते हैं। ठन्डे देश भी अब गर्मी के मज़े चख कर इन गर्म देशों के रोगों से दोचार होने को मजबूर हैं।  भारत के मामले में साफ है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही सूखे की घटनाओं से महंगाई बच्चों के पोषण के लिये एक समस्या बन रहा है। उनको अनाज मिलना मुश्किल हो रहा है। महत्वपूर्ण है कि 5 साल से कम उम्र के बच्चों की कुल मौतों की दो-तिहाई कुपोषण के कारण होती हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि किशोरावस्था के दौरान प्रदूषण का सेहत पर प्रभाव बढ़ता है। जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं पर भी लांसेट रिपोर्ट में चिन्ता जताई गई है और कहा गया है कि जंगलों का जलना वायु प्रदूषण के साथ- साथ तापमान वृद्धि में बढ़ा रोल अदा करता है।

अमेरिका, रूस और सऊदी अरब जैसे देश पहले ही संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ पैनल (IPCC) – दुनिया भर के जाने माने वैज्ञानिक जिसका हिस्सा हैं – की रिपोर्ट के निष्कर्ष और सिफारिशों से खुश नहीं है। संयुक्त राष्ट्र का यह विशेषज्ञ पैनल अमेरिका और कई अमीर देशों की आंखों में खटकता है क्योंकि इसकी रिपोर्ट्स आम तौर पर कार्बन इमीशन(उत्सर्जन) कर रहे देशों की ज़िम्मेदारी तय करती है और उनसे क्लाइमेट चेंज से लड़ने के लिये पैसा खर्च करने को कहती है।

विश्व मौसम संगठन (WMO) ने कहा है कि 2019 के साथ अब तक का सबसे गर्म दशक खत्म हो रहा है। स्पेन के मेड्रिड सम्मेलन में स्टेट ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट – 2019, नाम से जारी रिपोर्ट में WMO ने कहा है कि मानव जनित ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन ही धरती के अंधाधुंध बढ़ रहे तापमान का कारण है जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है। WMO के महासचिव पैट्री तालस ने कहा, “अगर अभी कड़े कदम नहीं उठाये जाते हैं को सदी के अंत तक धरती की तापमान वृद्धि 3 डिग्री तक पहुंच जायेगी जिससे मानवता के लिये कहीं बड़े ख़तरे पैदा हो जायेंगे।” उनके मुताबिक अभी की जा रही कोशिशें पेरिस समझौते के तहत किये वादों को पूरा करने के लिये काफी नहीं हैं। WMO के मुताबिक 31 दिसंबर 2019 तक मौसमी आपदाओं के कारण करीब 2.2 करोड़ लोग विस्थापित हो चुके होंगे।

पेरिस समझौते के वादों के मुताबिक अगर दुनिया के देश धरती की तापमान-वृद्धि 2 डिग्री से कम रखने में कामयाब होते हैं तो आज पैदा होने वाला बच्चा 31 साल की उम्र में कार्बन न्यूट्रल दुनिया में सांस लेगा लेकिन बदकिस्मती यह है कि वर्तमान हालात में से ऐसा होता नहीं दिख रहा।  दुनिया ने पूर्व-औद्योगिक काल के बाद 1°C तापमान की वृद्धि देखी है । पिछले दशक में दस में से आठ वर्ष सबसे गर्म वर्षों में गिने गए जो कि एक रिकॉर्ड है। परिणामस्वरूप उत्तरी पश्चिमी कनाडा में 3°C की आश्चर्य जनक वृद्धि दर्ज हुई है।

कार्बन इमीशन कटौती को लेकर विकसित देशों के साथ गरीब और कासशील देशों के बीच ठन गई।  अगले साल पेरिस डील को लागू होना है और उससे पहले सारी लड़ाई इस बात की है कि कार्बन इमीशन कम करने के लिये अमेरिका, रूस और यूरोपीय यूनियन जैसे देशों ने अब तक क्या किया है। सम्मेलन में जब यह बात उठी की कार्बन इमीशन कटौती के लक्ष्य बढ़ाये जायें तो विकासशील देशों ने साफ कहा कि पहले अमीर देश प्री-2020 यानी 2020 तक के वादों का हिसाब दें। एक कड़े बयान में बेसिक समूह ( ब्राज़ील, चीन भारत और दक्षिण अफ्रीका  का ग्रुप) ने कहा कि विकसित देशों को हर हाल में अपने वादे पूरे करने चाहिये। इस गर्मा-गर्मी के बीच यूरोपियन यूनियन एक ग्रीन डील का प्रस्ताव रखा है जिसमें साल 2050 तक नेट कार्बन इमीशन ज़ीरो करने का वादा है।

लेखिका : सीमा जावेद ( पर्यावरणविद, स्वतंत्र पत्रकार )

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