Analysis

सौ सुनार की एक लोहार की भाग-10


‘ तीन में न तेरह में ‘


बात सम्राट विक्रमादित्य के कालखण्ड की है।अवंतिका राज्य के सुरभूप पुर नगर में एक धनाढ्य स्वर्णकार रहा करते थे। पूरे सुरभूप पुर में उनके पास सबसे अधिक धन-संपदा थी। बड़ा कारोबार था सैकड़ों नौकर चाकर थे। व्यवसाय का लेखाजोखा और आय-व्यय की सारी ज़िम्मेदारी सेठ जी के विश्वासपात्र सेवक गोविंद सेन सम्हालते थे। गोविंद सेन न सिर्फ़ हिसाब किताब में निपुण थे बल्कि इस बात का भी पूरा ध्यान रखते थे कि सेठ जी का धन सुरक्षित रहे,किसी दशा में उसका अपव्यय न होने पाए। नगर के विभिन्न आयोजनों में सेठ जी को बड़े आदर सम्मान के साथ आमंत्रित किया जाता था।

एक बार किसी आयोजन में सेठ जी की भेंट पुष्पसेना नाम की नगर-वधू से हो गई। उस ज़माने में नगर की सबसे सुंदर और आकर्षक वेश्या को नगर-वधू कहकर ही बुलाया जाता था। पुष्पसेना को आयोजन में नगरसेठ के पधारने की सूचना थी। उसने मन ही मन इस धनाढ्य सेठ को अपने मोहजाल में फाँसने की ठान ली थी। अपने मंतव्य को साधने के लिए पुष्पसेना को कुछ ख़ास नहीं करना पड़ा क्योंकि सेठ जी स्वयं उसे देखते ही उसकी सुंदरता और भाव-भंगिमा पर लट्टू हो गए। मेल-मुलाकात का सिलसिला चल निकला। सेठ जी प्रायः नगरवधू के घर आने-जाने लगे। नगरवधू उनका भरपूर स्वागत सत्कार करती। बदले में सेठ जी दोनो हाथों से पुष्पसेना पर धनवर्षा करने लगे।

धीरे धीरे सेठ जी पुष्पसेना के मोहपाश में ऐसा फँसे कि उन्हें लगने लगा पुष्पसेना उनसे बहुत प्रेम करती है। यह उपक्रम नित्यप्रति का व्यवहार हो जाने के कारण सेठ जी व्यवसाय प्रभावित होने लगा। धन संचय भी तेज़ी से घटने लगा। सेठ जी का सच्चा हितैषी होने के कारण यह सब देख गोविंदसेन बहुत चिंतित हो उठा। वह सेठ जी को इस झूठे मोह के मकड़जाल से मुक्त कराने की युक्ति के बारे में सोचने लगा।

इसी बीच सेठ जी कुछ अस्वस्थ हो गए। कुछ दिन बीतते स्थिति इतनी बिगड़ी कि उनका उठना-बैठना चलना-फिरना तक दुरूह हो गया। नगरवधू ने सोचा सेठ के पास अब देने को कुछ न बचा होगा इसलिए आना छोड़ दिया। वो सेठ जी को भूल अपने अन्य ‘असामियों’ पर ध्यान देने लगी। इधर सेठ जी नगरवधू से मिलने को बेचैन होने लगे।

उन्होंने गोविंद सेन को बुलाकर अपनी व्यथा बताते हुए कहा तुम जाकर पुष्पसेना को बस ये सन्देश दो कि तुम जिसे सबसे अधिक प्रेम करती हो वो तुमसे मिलने को आतुर है,वो फौरन मुझसे मिलने दौड़ी चली आएगी। गोविंद सेन ने उन्हें समझाते हुए कहा ” सेठ जी ये नगर बधुएँ किसी की नहीं होती, वो तो आप को कब का विस्मृत कर चुकी होगी। आप पुष्पसेना का विचार त्याग अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दीजिए।” किंतु सेठ जी पर गोविंद सेन की बात का कोई असर नहीं हुआ। उनके सिर तो पुष्पसेना के प्रेम का भूत सवार था।

उन्होंने गोविंद सेन से पुष्पसेना तक संदेश पंहुचाने की ज़िद की,साथ ही निर्देश दिया कि उनकी तरफ़ से पुष्पसेना के लिए उपहार स्वरूप रत्नजड़ित स्वर्णाभूषण अवश्य ले जायँ। गोविंद सेन ने कहा ” सेठ जी आप मेरे दाता हैं, पालनकर्ता हैं आपके आदेश का पालन करना मेरा धर्म है। मैं पुष्पलता के पास अवश्य जाऊँगा और आपके निर्देशानुसार उपहार भी ले जाऊँगा, किंतु मेरी एक शर्त आपको माननी पड़ेगी। आपको लगता है कि पुष्पसेना आपसे ही सर्वाधिक प्रेम करती है तो शर्त यह है कि मैं पुष्पसेना को आपका नाम नहीं बताऊंगा।

बल्कि कहूँगा कि यह उपहार उन महानुभाव की तरफ़ से है जिन्हें आप सबसे अधिक प्रेम करती हैं। इस संकेत से यदि पुष्पसेना ने आपको पहचान लिया तो न केवल यह उपहार उन्हें सौंप दूँगा बल्कि सम्मान के साथ उन्हें यहाँ लाने का प्रबंध भी करूँगा। किंतु इस संकेत के बाद भी यदि वो आपकी पहचान न कर पाई तो बिना उन्हें कुछ दिए वापस आ जाऊँगा।” सेठ जी को तो अपने प्रति पुष्पसेना के अगाध प्रेम का भरोसा या भ्रम था। उन्होंने बिना कोई देर लगाए गोविंद सेन की शर्त मंज़ूर कर ली।

गोविंद सेन खिन्न भाव से रत्नजड़ित स्वर्णाभूषण की पोटली ले पुष्पसेना के घर जा पँहुचे। पुष्पसेना के सामने पोटली खोलते हुए उन्होंने कहा “आपके लिए यह उपहार उन महानुभाव की तरफ़ से है जिनसे आप सबसे अधिक प्रेम करती हैं।” सामने रत्नजड़ित स्वर्णाभूषण का ढेर देख पुष्पसेना की आँखे चमक उठीं। उसने जैसे ही उन्हें उठाने के लिए हाथ बढ़ाया गोविंद सेन ने पोटली पीछे खींचते हुए कहा “क्षमा कीजिये देवि, इन आभूषणों को प्राप्त करने के लिए पहले आपको उन महानुभाव का नाम बताना होगा जिन्हें ये विश्वास है कि आप उन्ही से सबसे अधिक प्रेम करती हैं।”

यह सुन पुष्पसेना असमंजस में पड़ गई। किंतु सामने रखी स्वर्णाभूषणों की पोटली वो अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी। उसने हड़बड़ाहट में एक बाद एक तीन नाम लिए। उन तीनों ही नामों में  अपने सेठ जी का नाम शामिल न देख गोविंद सेन को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। निर्विकार भाव से पोटली बाँधते हुए उन्होंने कहा ” क्षमा कीजिए देवि आपके बताए गए इन तीनों नामों में उपहार भेजने वाले महानुभाव का नाम शामिल नहीं है,अतः आप इसे प्राप्त करने की अधिकारिणी नहीं।” सामने रखे इतने स्वर्णाभूषण इस तरह हाथ से निकलते देख पुष्पसेना परेशान हो उठी। गोविंद सेन को पोटली वापस बाँधने से रोकते हुए बोली ” नहीं नहीं ऐसा नहीं है मैं भूल गई थी मैं अब जो नाम लूँगी वो पक्का उन्ही महानुभाव का होगा जिन्हें मैं बहुत प्रेम करती हूँ। ”

पुष्पसेना ने चौथा नाम लिया वो भी कोई अन्य था। स्वर्णाभूषण प्राप्त करने की अकुलाहट में पुष्पसेना ने एक के बाद एक कुल दस और नाम गिना डाले। किंतु अफ़सोस सेठ का नाम न पहले तीन में शामिल था न कुल तेरह की सूची में। यह देख रोष में आ चुके गोविंद सेन ने पुष्पसेना पर उपेक्षापूर्ण निगाह डालते हुए उसे लताड़ लगाई और स्वर्णाभूषणों की पोटली समेट वापस चल दिए। व्याकुलता से पुष्पसेना के आने की प्रतीक्षा कर रहे सेठ जी ने गोविंद सेन को देखते ही कहा ” तुम आ गए गोविंद सेन। मुझे पता है उपहार देखते ही पुष्पसेना ने जान लिया होगा,कि वो मैंने ही उसके लिए भेजा है। तुम्हारे संकेत देते ही उसने सिर्फ़ मेरा ही नाम लिया होगा। कहाँ है मेरी प्रेयसी पुष्पसेना ?”

धैर्यपूर्वक सेठ जी की पूरी बात सुनने के बाद गोविंद सेन बोले ” सेठ जी इन नगर-वधुओं को कभी किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं होता। वो प्रेम करती हैं मात्र व्यक्ति के धन से उसकी संपत्ति से। लीजिये ये सम्हालिये रत्नजड़ित स्वर्णाभूषणों की अपनी पोटली। आपको भ्रम था कि पुष्पसेना आपसे सबसे अधिक प्रेम करती है ! अरे सबसे अधिक की बात तो छोड़िए सेठ जी आप तो उसके लिए ‘ न तीन में हैं न तेरह में !” सारी बात सुन सेठ जी को ठेस तो लगी किंतु मन का भ्रम जाता रहा उनकी आँख अब खुल चुकी थी। पुष्पसेना का विचार मन से निकाल फेंक उन्होंने अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना शुरू कर दिया। शीघ्र ही वो पूर्ण स्वस्थ हो गए,व्यापार भी पुनः व्यवस्थित हो गया। गोविंद सेन की सच्ची स्वामिभक्ति और सूझबूझ से वो पुष्पसेना के मोहजाल से पूर्णतया मुक्त हो चुके थे। ये थी कथा ‘ तीन में न तेरह में ‘ कहावत की,अगले अंक में किसी अन्य कहावत की कथा के साथ पुनः उपस्थित होंगे, तब तक के लिए शुभमस्तु।

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