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LOCK DOWN की LIVE REPORT: खाकी के दो चेहरे कहीं जालिम कहीं फरिश्ता

  • छाले भरे पाँवऔर मीलो दूर ठाँव
  • भूखे जिस्मों पर पुलिस बरसा रही लाठियां

दीपक पांडेय ‘प्रदीप’

लखनऊ। बाहर तपती धूप, भीतर पेट की आग। भूख और प्यास से तड़पते मासूमऔर बेबस माएं। एक अनजाने डर से बच्चों को अपनी उंगली का सहारा भी नहीं देने में असमर्थ । दो से तीन मीटर आगे या पीछे चलने की मजबूरी। कुछ माओं की गोद में भूख से दुधमुहे बच्चों की किलकारियां बंद हो गई है। कातर आंखे बस एक दूसरे को बेबस देखने को अभिशप्त हैं। ये वो अभागे भारत के संप्रभु नागरिक हैं जो रोजी रोटी की तलाश में जलावतन है। लॉक डाउन की अचानक घोषणा इन पर वज्रपात बन कर टूटी है। इनका यह हाल उन लोगों की वजह से हो गया है जिनपर इनके देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी गई है। अपने ही वतन में इनकी हालत घुसपैठियों से भी बदतर हो गई है। कोई महाराष्ट्र से साइकिल या स्कूटी उठाकर चल पड़ा है तो कोई राजस्थान से अपने डेरे के लिए कदमों से सड़क नाप रहा है। बहुतेरे दिल्ली से पैदल चलकर जल्द से जल्द बिहार स्थित अपने गांव पहुंचना चाह रहे हैं तो कई दिल्ली से सिद्धार्थनगर की यात्रा पैदल ही पूरी कर रहे हैं। पैरों में छाले पड़ गए है मगर हौसला कायम है। कई की साईकल पंचर हो चुकी हैं। बनाने के लिए कोसों-कोसों दूर कोई साधन नहीं है। इनके चेहरे पर कोरोना का खौफ कम भूख से तड़प साफ दिख रही है। बच्चे की पीड़ा देख मां की छाती फटी जा रही है। होंठ खुलने से पहले ही आंखें आंसू दर्द बयां कर दे रही हैं।

हद तो तब हो रही है जब इनके भूखे प्यासे जिस्म पर पुलिस का डंडा बरसने लगता है। शायद किसी गरीब की भूख मिटाने का यह उचित पुलिसिया तरीका हो। जो बच्चा कुछ देर पहले पानी-पानी की रट लगा रहा होता है, पिता की पिटाई देख उसकी घिग्घी बंध जाती है। कतर ब्यौंत कर रखा गया पैसा एम्बुलेंस चालक 200 किमी की यात्रा में ही पूरा मार ले गया। कहीं-कहीं बहुतेरों के लिए पुलिस देवदूत की तरह भी पेश आ रही है, लेकिन उनकी संख्या कम है। यूं कहें, उन्हें आप उंगलियों पर गिन सकते हैं। सोचिए किसी प्रांत के मुखिया (CM) को यह कहना पड़ जाए कि लाठी चलाने से पहले उससे बात करो। अब मुझे कोई ये समझा सकता है कि सरकार पुलिस के ऊपर है या पुलिस सरकार से ऊपर?

यूपी की राजधानी लखनऊ में पॉलीटेक्निक से सफेदाबाद (बाराबंकी) की कुल 16 किमी की यात्रा में लोगों ने इतना दर्द बयां कर दिया कि सुनने वालों की आंखें सावन की तरह बरस रही थीं। सोचिए पिता के जिस कंधे पर बैठकर वह नन्हीं सी जान उंचाइयों को छूने का प्रयास करता था, आज उसी कंधों और बांहों पर पुलिसिया प्रहार हो रहा है। इसके पहले हमें यही लगता था कि यह पुलिस वाले भी हमारे-आपके बीच से ही होते हैं। लेकिन अब सारी बातें दिवास्वप्न लगने लगी हैं। इनकी हरकतें देखकर लगता है कि ये अंग्रेजों के साम्राज्यवादी दौर की पुलिस है जिसे इंसानों से जानवरों जैसा बर्ताव करने की ही ट्रेनिंग दी गई है।

सरकारी आदेश को ठेंगा दिखाते हुये असहायों पर लाठियां भांज रहे, इन पुलिस जवानों को जैसे यही ट्रेनिंग दी गई हो। अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है छत्तीसगढ़ से यूपी आकर मजदूरी कर रहे दो लेबर ठेकेदारों बहस हो जाती है। एक ने 112 पर कॉल किया, पुलिस देवदूत की तरह आई और गाली-गलौच के बीच दोनों को मामला सुलझाने का दबाव बनाने लगी। बात बनती न देख देवदूतों ने दूसरे पर थाने का धौंस दिखाया। बाइक में दो के बीच में तीसरी सवारी बिठाई और 200 मीटर दूर जाते ही महज पांच हजार में मामला सेट कर दिया। वायदा किया कि जब दोनों के बीच में पैसे का लेन-देन होगा तब यह पांच हजार उसके पैसे से वसूल कर लेना। अब उऩ प्रेस रिलीजों का क्या करें, जो 112 का गुणगान करती कभी-कभी हमारे मेल आईडी पर आ जाया करती हैं।

ठेले वालों, सब्जी वालों, फल वालों को बीच में रोककर नगदी वसूल लेना, न मिलने पर लाठी से ठुंकाई करना इनकी आदत में शुमार है। मुझे तो लगता है कि इन लोगों को इसी तरह की शपथ ही दिलाई जाती है। यह हाल केवल उत्तर प्रदेश का नहीं है। उत्तर भारत के तमाम राज्यों की पुलिस गरीबों, मजलूमों और बेबसों से यही सद्व्यवहार कर रही है। इनके बीच पुलिस के कुछ ऐसे भी चेहरे हैं, जो गरीबों को खाने का सामान अपने हाथों से दे रहे हैं। हमें लगता है ऐसे ही लोगों की वजह से वर्दी के प्रति अभी विश्वास जिंदा है। एसीपी हजरतगंज अभय मिश्र अपनी लाव-लश्कर (इंसपेक्टर अंजनी पांडेय व कमलेश राय) के साथ गरीबों, बेसहारों को भोजन व खाने-पीने की सामग्री बांटते देखे गए। लेकिन एक चेहरा वह भी, बिस्कोहर (सिद्धार्थनगर) का राजन कहता है पुलिसिया जुल्म का इतना भयावह चेहरा है देखकर कोरोना आक्रमण से पहले ही मर जाने का मन है। भले ही नगरपालिका लावारिस समझकर गटर में ही क्यों न फेंक दे।

देवरिया के हमारे संवाददाता लालबाबू गौतम ने सोशल डिस्टेंसिंग और गरीबों को भोजन देने का एक नायाब तरीका अपनाने की खबर भेजी थी। मारवाड़ी समिति के लोगों ने गरीबों की मदद के लिए पहले दो मीटर की दूरी पर गोला बनाया, फिर उसमें सबको बिठाया और एक साथ भोजन परोसकर सबको खिला दिया। करीब 70 लोगों ने उनके साथ भोजन किया। खिलाने में प्यार इतना परोसा कि डीएम अमित किशोर को खुद कहना पड़ा कि यह तरीका ठीक है और यह सिलसिला थमना नहीं चाहिए। अब कोरोना को बड़ा खौफ माना जाए, या भूख को या उन पुलिस वालों को जो अपने ठौर वापस जा रहे मजलूमों पर कहर बनकर टूट रहे हैं। तय आपको करना है। हां, एक खुशखबरी यह कि यूपी सरकार छह रूट पर उन लोगों के लिए सरकारी बस सेवा मुहैया करा रही है जो अपना अड्डा छोड़ अपनी घर की ओर बैरंग लौट रहे हैं।

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