यदि चुनाव आपके लिए पहेली है तो यह जरूर जानें

इंजीनियर हिमांशुधर द्विवेदी

चुनाव करना यानी अपनी पसंद की चीजों को चुनना। अगर इसी को लोकतंत्र के अर्थों में प्रयोग किया जाए तो कहा जा सकता है कि देश या राज्य का शासन चलाने के लिए कुछ लोगों के बीच से किसी योग्य व्यक्ति का चुनाव करना जिसे यह अधिकार मिल सके कि वह देश या राज्य के शासन को मजबूत और विकास में सहयोग करेगा। चुनाव या निर्वाचन लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके द्वारा जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है। चुनाव के द्वारा ही आधुनिक लोकतंत्रों के लोग विधायिका (और कभी-कभी न्यायपालिका एवं कार्यपालिका) के विभिन्न पदों पर आसीन होने के लिये व्यक्तियों को चुनते हैं। चुनाव के द्वारा ही क्षेत्रीय एवं स्थानीय निकायों के लिए भी व्यक्तिओं का चुनाव होता है।

वस्तुत: चुनाव का प्रयोग व्यापक स्तर पर होने लगा है और यह निजी संस्थानों, क्लबों, विश्वविद्यालयों, धार्मिक संस्थानों आदि में भी प्रयुक्त होता है। चुनाव के इतिहास पर गौर करें तो हमें काफी पीछे जाना होगा। उस समय जब दुनिया में कहीं भी लोकतंत्र नहीं था बल्कि सभी जगहों पर राजशाही शासन था। उस वक्त भी चुनाव होता था। लेकिन, उस चुनाव में और अब के चुनाव में काफी फर्क है।

प्राचीन काल में एक राजा अपने पुत्र को अपनी गद्ïदी सौंप देता था। अगर राजा के एक से अधिक पुत्र हुए तो सबसे बड़ा पुत्र राजा बनता था या फिर सभी पुत्रों में जो सबसे योग्य होता था, उनमें कई तरह के कौशल की परीक्षा होने के पश्चात किसी एक को राजा का उत्तराधिकारी चुना जाता था। लेकिन इस चुनाव में जनता से कोई लेना देना नहीं था। राजशाही के दौरान ही कई राजा ऐसे हुए जिन्होंने निरंकुशता की सीमा लांघ डाली और यहीं से लोकतंत्र यानी लोगों का शासन की पटकथा लिखी जाने लगी।

दुनिया में लोकतंत्र की स्थापना के लिए कई खूनी संघर्ष हुए और तत्पश्चात लोकतंत्र की स्थापना हुई। लोगों को यह अधिकार मिला कि वे सार्वजनिक रूप से अपने प्रशासक का चुनाव करेंगे।

भारतीय लोकतंत्र की चुनाव प्रक्रिया और चुनाव आयोग
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया के अलग-अलग स्तर हैं लेकिन मुख्य तौर पर संविधान में पूरे देश के लिए एक लोकसभा तथा पृथक-पृथक राज्यों के लिए अलग विधानसभा का प्रावधान है। भारतीय संविधान के भाग 15 में अनुच्छेद 324 से अनुच्छेद 329 तक निर्वाचन की व्याख्या की गई है। अनुच्छेद 324 निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित होना बताता है। संविधान ने अनुच्छेद 324 में ही निर्वाचन आयोग को चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी दी है। 1989 तक निर्वाचन आयोग केवल एक सदस्यीय संगठन था लेकिन 16 अक्टूबर 1989 को एक राष्ट्रपतीय अधिसूचना के द्वारा दो और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई। चुनाव की घोषणा होते ही सभी प्रशासनिक अधिकारी चुनाव आयोग के अनुसार कार्य करते हैं।

लोकसभा की कुल 543 सीटों में से विभिन्न राज्यों से अलग-अलग संख्या में प्रतिनिधि चुने जाते हैं। इसी प्रकार अलग-अलग राज्यों की विधानसभाओं के लिए अलग-अलग संख्या में विधायक चुने जाते हैं। नगरीय निकाय चुनावों का प्रबंध राज्य निर्वाचन आयोग करता है, जबकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव भारत निर्वाचन आयोग के नियंत्रण में होते हैं, जिनमें वयस्क मताधिकार प्राप्त मतदाता प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से सांसद एवं विधायक चुनते हैं। लोकसभा तथा विधानसभा दोनों का ही कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। इनके चुनाव के लिए सबसे पहले निर्वाचन आयोग अधिसूचना जारी करता है।

अधिसूचना जारी होने के बाद संपूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया के तीन भाग होते हैं- नामांकन, निर्वाचन तथा मतगणना। निर्वाचन की अधिसूचना जारी होने के बाद नामांकन पत्रों को दाखिल करने के लिए सात दिनों का समय मिलता है। उसके बाद एक दिन उनकी जांच पड़ताल के लिए रखा जाता है। इसमें अन्यान्य कारणों से नामांकन पत्र रद्ïद भी हो सकते हैं। उसके बाद दो दिन नाम वापसी के लिए दिए जाते हैं ताकि जिन्हे चुनाव नहीं लडऩा है, वे आवश्यक विचार विनिमय के बाद अपने नामांकन पत्र वापस ले सकें। कभी कभार किसी क्षेत्र में पुन: मतदान की स्थिति पैदा होने पर उसके लिए अलग से दिन तय किया जाता है। मतदान के लिए तय किये गए मतदान केंद्रों में मतदान का समय सामान्यत: सुबह 7 बजे से सायं 5 बजे तक रखा जाता है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन आने के बाद मतगणना के लिए सामान्यत: एक दिन का समय रखा जाता है। मतगणना लगातार चलती है तथा इसके लिए विशिष्ट मतगणना केंद्र तय किए जाते हैं जिसमें मतदान केंद्रों के समान ही अनाधिकृत व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित रहता है। सभी प्रत्याशियों, उनके प्रतिनिधियों तथा पत्रकारों आदि के लिए निर्वाचन अधिकारियों द्वारा प्रवेश पत्र जारी किए जाते हैं। वर्तमान में निर्वाचन क्षेत्रानुसार मतगणना की जाती है तथा उसके लिए उसके सभी मतदान केंद्रो के मत की गणना कर परिणाम घोषित किया जाता है। परिणाम के अनुसार जिस दल को बहुमत प्राप्त होता है, वह केंद्र या राज्य में अपनी सरकार का गठन करता है। भारत में वोट डालने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है और यह नागरिकों का अधिकार है, कर्तव्य नहीं। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा सदस्यों के चुनाव प्रत्यक्ष न होकर अप्रत्यक्ष रूप से होते हैं। इन्हें जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि चुनते हैं। चुनाव के वक्त पूरी प्रशासनिक मशीनरी चुनाव आयोग के नियंत्रण में कार्य करती है। चुनाव की घोषणा होने के पश्चात आचार संहिता लागू हो जाती है और हर राजनैतिक दल, उसके कार्यकर्ता और उम्मीदवार को इसका पालन करना होता है।

मतदाता सूची
चुनाव आयोग के रिकार्ड के अनुसार मतदाता सूची सभी पंजीकृत मतदाताओं की एक सूची है। यह चुनाव के दिन संदर्भित आधिकारिक दस्तावेज है जो तय करती है कि कौन वोट का हकदार है और कौन नहीं। जब आप मतदान के लिए पंजीकरण कराते हैं, तो आप अपना नाम अपने विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र (एसी) की मतदाता सूची में शामिल करवाते हैं। एक ही सूची संसदीय निर्वाचन क्षेत्र (पीसी) के लिए उसी रूप में मान्य है। प्रत्येक एसी के लिए मतदाता सूची मतदान केंद्रों के भागों में खंडित होती है। प्रत्येक मतदान केंद्र में औसतन 1000 से 1500 मतदाता होते हैं। यह सभी मतदाता सूची में क्रमानुसार (घर के नंबर अनुसार) सूचीबद्ध होते हैं। आप अपने निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) के कार्यालय में अपने मतदान बूथ के लिए नवीनतम मतदाता सूची पा सकते हैं। कई राज्यों के लिए, आप मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) की वेबसाइट पर ऑनलाइन मतदाता सूची पा सकते हैं।

मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट यानी आदर्श आचार संहिता
चुनाव आचार संहिता या आदर्श आचार संहिता या आचार संहिता का मतलब है चुनाव आयोग के वो निर्देश जिनका पालन चुनाव खत्म होने तक हर चुनाव लडऩे वाली पार्टी को करना होता है। जो इसका पालन नहीं करता है, उसे इसके लिए सजा सुनाई जाती है। राज्यों में चुनाव की तारीखों के एलान के साथ ही वहां चुनाव आचार संहिता भी लागू हो जाती हैं। चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारे, सभी सरकारें चुनाव आचार संहिता के दायरे में आती हैं। इसके अन्तर्गत: प्रदेश सरकार और प्रशासन पर कई अंकुश लगाए जाते हैं। आचार संहिता लगने के बाद मुख्यमंत्री या मंत्री अब न तो कोई घोषणा कर सकते हैं, न शिलान्यास  या भूमिपूजन कर सकते हैं।

  • सरकारी खर्च से ऐसा आयोजन नहीं होगा, जिससे किसी भी दल विशेष को लाभ पहुंचे।
  • प्रत्याशी और राजनीतिक पार्टी को रैली, जुलूस निकालने, मीटिंग करने के लिए इजाजत पुलिस से लेनी होती है।
  • कोई भी घटक दल वोट पाने के लिए जाति या धर्म आधारित अपील नहीं की कर सकता, अगर ऐसा कोई करता है तो उसे दंडित किया जा सकता है।
  • राजनीतिक पार्टियों को अपने कार्यकर्ताओं को आइडेंटी कार्ड देना होता है।
  • मतदान केंद्र पर गैर जरूरी भीड़ जमा नहींं हो सकती है अब। जिन्हें चुनाव आयोग ने परमिशन ना दी हो वो मतदान केंद्र पर नहीं जा सकते हैं।
  • राजनीतिक दलों की हरकत पर चुनाव आयोग पर्यवेक्षक नजर रखते हैं।
  • सरकारी गाड़ी या एयर क्राफ्ट का इस्तेमाल मंत्री नहीं कर सकते हैं।
  • सरकारी बंगले का या सरकारी पैसे का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के दौरान नहीं किया जा सकता है।