गीता ज्ञान-उपसंहार

लीला कान्त झा
त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते। वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या
गोविन्द दामोदर माधवेति।।
(हे जिह्वे ❗ मैं तुझी से एक भिक्षा मांगता हूं, तू ही मुझे दे। वह यह कि जब दण्डपाणि यमराज इस शरीर का अंत करने आवे, तो बड़े प्रेम से गद्गद् स्वर में –
‘हे गोविन्द ❗ हे दामोदर ❗ हे माधव ❗’ इन मंजुल नामों का उच्चारण करती रहना।)
(गतांक से आगे)
इस भौतिक जगत् में जीव मोहवश सेवा कर रहा है। वह काम और इच्छाओं से बंधा हुआ है। यही मोह है कि वह अपने को ईश्वर मान लेता है। इसका हश्र क्या होता है, इनदिनों प्रत्यक्ष देखने को मिला रहा है कि कितने लोग जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं। जीव यह नहीं सोच पाता कि यदि वह ईश्वर होता तो इतना संशयग्रस्त क्यों रहता? यह मोह भगवत्कृपा से जीता जा सकता है।
बन्धुओं, हम आपको स्मरण कराते चलें कि महाभारत के युद्ध – मैदान में कौरव-पाण्डव सेनाओं के बीच रथपर सवार अर्जुन को उसके सारथि-श्रीकृष्ण गीता का उपदेश दे रहे हैं और आंखों देखा हाल महर्षि व्यास के परम शिष्य संजय अपने स्वामी महाराज धृतराष्ट्र (अंधे) को सुना रहे हैं। संजय महाराज धृतराष्ट्र का सचिव है। वह दिव्य दृष्टि से युद्ध के मैदान में क्या हो रहा है, सब कुछ देख रहा है और राजमहल में बैठकर धृतराष्ट्र को सुना रहा है। उसने अपनी आंखों से देखा है और सम्पूर्ण गीता को सुना है। अब संजय विह्वल हो जाते हैं और अंत में धृतराष्ट्र से कहते हैं कि हे राजन ❗ जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ परम धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं ऐश्वर्य, विजय, अलौकिक शक्ति तथा नीति भी निश्चित रूप से रहती है। इस प्रकार संजय ने धृतराष्ट्र को यह संकेत कर दिया कि आप अनीति पर चल रहे हैं और अनीति करने वालों को विजयश्री कहाँ? उन्हें तो हर हाल में पराजय है।
बन्धुओं, विगत छियालीस दिनों से मैंने बहुत ही अल्प में गीता जी को पढने और समझने की कोशिश की, परन्तु मैं तो कुछ भी नहीं समझ सका। तो भला आपको कैसे समझा सकता हूं। श्रीमद्भगवद्गीता का विस्तार कौन कर सकता है? गीता के माहात्म्य में कहा गया है – गीता सुगीता कर्त्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।। अर्थात् यह स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से निकली हुई है, इसलिए इसका विस्तार कोई नहीं कर सकता है। हमें केवल गीता का पाठ करना चाहिए, श्रवण करना चाहिए क्योंकि यह समस्त वैदिक ग्रन्थों का सार है। भगवद्गीता का प्रयोजन भौतिक संसार से उबारना है।
यद्यपि गीता का सार बाजार में छपा छपाया मिलता है, वह इस प्रकार है –
“जो हुआ अच्छा हुआ। जो हो रहा है अच्छा हो रहा है। जो होगा वह अच्छा ही होगा। तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था जो नष्ट हो गया। तुमने जो लिया यहीं से लिया। जो दिया यहीं पर दिया। जो आज तुम्हारा है, कल किसी का था, परसों किसी और का हो जायेगा। परिवर्तन संसार का नियम है।
यह पढने और सुनने-समझने में मन को जंचता है। परंतु मेरे समझ से गीता का सार यही नहीं है। “सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” गीता का सार यही है। अपनी ओर से मैं एक ही बात कह सकता हूँ कि भगवत् भजन ही गीता का सार है । रामचरितमानस की ‘कलियुग केवल नाम अधारा’, ‘रामनाम अवलम्बन एकू’, ‘रामहिं सुमिरिय गाइय रामहिं गाइय ‘ सभी समीचीन हैं। ज्यादा पढने लिखने की आवश्यकता नहीं है। केवल भगवद्नाम संकीर्तन करें।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता का प्रेषण मेरी ओर से विराम लेता है। अनेक त्रुटियाँ हुईं। इस पर न ध्यान देते हुए आप सब से अनुरोध है कि आप बार बार गीता का पाठ करें और इस लोक और परलोक को सुधारें। भगवद् इच्छा हुई तो कल से हम किसी नवीन विषय पर चर्चा करेंगे।
।। इति।।