यह शिव मंत्र है कल्याणकारी, जानें कैसे

भगवान शिव के इन मंत्र से होता हैं कल्याण

 नम: शिवाय..पयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवधज़्नम्।
उवारज़्कमिव बन्धनान मृत्योमुज़्क्षीय मामृतात्॥

 हौं जूं स:  भूभुज़्व: स्व: ? पयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवद्धज़्नम्?।
उवारज़्कमिव बन्धनान्मृत्योमुज़्क्षीय मामृतात्? ? स्व: भुव: ? स: जूं हौं ? 

 तत्पुरुषाय विदमहे, महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।

 

 

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री

शिवरात्रि व्रत पर ऐसे करें पूजन एवम अभिषेक 

01.– मिट्टी के लोटे में पानी या दूध भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक-धतूरे के फूल, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए। अगर आस-पास कोई शिव मंदिर नहीं है, तो घर में ही मिट्टी का शिवलिंग बनाकर उनका पूजन किया जाना चाहिए।

02. – शिव पुराण का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र या शिव के पंचाक्षर मंत्र ? नम: शिवाय का जाप इस दिन करना चाहिए। साथ ही महाशिवरात्रि के दिन रात्रि जागरण का भी विधान है।

03.– शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार शिवरात्रि का पूजन ‘निशीथ काल में करना सवज़्श्रेष्ठ रहता है। हालांकि भक्त रात्रि के चारों प्रहरों में से अपनी सुविधानुसार यह पूजन कर सकते है।

जानिए महिलाओं के लिए महाशिवरात्रि का महत्व

केवल पुरुषों ही नहीं बल्कि महिलाओं के लिए भी इस महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है। महिलाएं अगर इस पूरा दिन व्रत कर के शिव जी और पार्वती की पूजा करती हैं। तो शिव जी उन्हें सुखी वैवाहिक जीवन के साथ-साथ सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद भी देते हैं। शिव जी और पार्वती के जोड़े को सबसे आदर्श माना जाता है। ऐसे में उनका आशीर्वाद मिलना जीवन की हर खुशी मिलने के बराबर है। यही नहीं अगर कुंवारी कन्या महाशिवरात्रि का व्रत रखती है। तो उसे शिव जी के समान जीवन साथी प्राप्त होता है। विवाह के बाद उनका जीवन खुशियों से भर जाता है।

समझें महाशिवरात्रि का महत्व को 

हमारे पुराणों में ऐसा उल्लेख मिलता हैं कि इस दिन यानी महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और पावज़्ती का विवाह हुआ था। इसी कारण इस दिन को महाशिरात्रि के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है और इस दिन का इतना महत्व है। शिवरात्रि के महत्व के बारे में एक अन्य प्रचलित कथा से भी पता चलता है और वो कथा है समुद्र मंथन की। ऐसा माना जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन समुद्र मंथन के दौरान विष निकला था। पूरी दुनिया के लिए शिव जी ने विष को पी लिया था ताकि सृष्टि इस भयानक विष से बची रहे। इसके बाद से ही शिव जी को नीलकंठ के नाम का नाम मिला था।

 

महाशिवरात्रि का महत्व के लिए इमेज नतीजे

हिन्दू धमज़् में शिवरात्रि का विशेष महत्व है। हिन्दू शास्त्रों में इस बात का भी वणज़्न मिलता है कि फाल्गुन महीने का 14वां दिन भगवान शिव का बेहद पसंद है। इसलिए इस दिन शिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। हमारे ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि ऐसा स्वयं शिव जी ने देवी पावज़्ती को बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि इस दिन वो अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करेंगे। जिसे भी भगवान शिव का आशीवाज़्द चाहिए वो महाशिवरात्रि 2020 को शिवजी का भजन करे, उनका व्रत करे और आराधना करे। उस पर शिव जी अपनी कृपा अवश्य बरसायेंगे।

यह हैैं महाशिवरात्रि व्रत कथा-

एक बार. ‘एक गाँव में एक शिकारी रहता था. पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था. वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका. क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया. संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी. शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धामिज़्क बातें सुनता रहा. चतुदज़्शी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी. संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की. शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।

अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था. शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा. बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था. शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं. इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।

एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गभिज़्णी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची. शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, ‘मैं गभिज़्णी हूँ. शीघ्र ही प्रसव करूँगी. तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है. मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना. शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाडिय़ों में लुप्त हो गई।

शिकार को खोकर उसका माथा ठनका. वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था. तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वणिज़्म अवसर था. उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोडऩे ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी. इस समय मुझे मत मार।

शिकारी हँसा और बोला, ‘सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूखज़् नहीं. इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ. मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।उत्तर में मृगी ने फिर कहा, ‘जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिफज़् बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ. हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।

महाशिवरात्रि का महत्व के लिए इमेज नतीजे

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई. उसने उस मृगी को भी जाने दिया. शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था. पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया. शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूवज़् आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दु:ख न सहना पड़े, मैं उन मृगियों का पति हूँ. यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो. मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया. उसने सारी कथा मृग को सुना दी. तब मृग ने कहा, ‘मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धमज़् का पालन नहीं कर पाएँगी. अत: जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो. मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ। उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निमज़्ल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए. भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया. वह अपने अतीत के कमोज़्ं को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई. उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई. उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वषाज़् की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।